26 साल तक सरकारी तेल कंपनी में काम कर चुके मुख्तार बाबायेव अब क्लाइमेट वार्ता की अध्यक्षता करेंगे। फोटो: World Economic Forum/ Faruk Pinjo/Flickr

क्लाइमेट वार्ता की कमान एक बार फिर तेल कंपनी के दिग्गज़ के हाथ

दिसंबर में संपन्न हुई दुबई क्लाइमेट वार्ता (कॉप – 28) की अध्यक्षता जहां आबूधाबी की तेल कंपनी  एडनॉक के सीईओ अल जबेर ने की थी वहीं इस साल अज़रबेजान में होने वाली वार्ता की कमान एक बार फिर तेल कंपनी के दिग्गज़ के ही हाथ में होगी। अज़रबेजान के मंत्री और 26 साल तक सरकारी तेल कंपनी में काम कर चुके मुख्तार बाबायेव अब क्लाइमेट वार्ता की अध्यक्षता करेंगे। 

अज़रबेजान के पास गैस का करीब 2.5 लाख करोड़ घन मीटर भंडार है और वह दुनिया के सबसे बड़े गैस निर्यातकों में है। अज़रबेजान का इरादा 2027 तक अपना निर्यात दुगना करने का है। पर्यावरण कार्यकर्ता और क्लाइमेट साइंटिस्ट जलवायु परिवर्तन वार्ता में तेल और गैस कंपनियों के दबदबे से चिंतित हैं। पिछले साल दुबई क्लाइमेट वार्ता में जीवाश्म ईंधन कंपनियों के करीब ढाई हज़ार लॉबीकर्ता थे जो 2022 में शर्म-अल-शेख में हुई क्लाइमेट वार्ता में शामिल लॉबीकर्ताओं का चार गुना थी।

पर्यावरणीय मंजूरी से पहले प्रोजेक्ट शुरू करने की अनुमति से जुड़े आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय के 2022 के एक मेमोरेंडम पर रोक लगा दी है जिसमें परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी मिलने से पहले कामकाज शुरू करने की अनुमति देने की बात कही गई थी।

वनशक्ति नामक एनजीओ की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय को नोटिस भेजकर चार हफ़्तों के अंदर जवाब देने के लिए कहा है। इससे पहले जनवरी 2022 में मंत्रालय ने एक मेमोरेंडम में कहा था कि परियोजनाओं को पर्यावरण पर पड़नेवाले प्रभावों का आकलन करने के पहले ही काम शुरू करने की मंजूरी दी जा सकती है और एनवायरमेंटल क्लीयरेंस के लिए वह बाद में आवेदन कर सकते हैं।

वनशक्ति की दलील थी कि एनवायरमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट के तहत किसी भी गतिविधि के शुरू होने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी लेना अनिवार्य है और यदि परियोजना शुरू होने के बाद यह अनुमति दी जाती है तो यह पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के लिए घातक सिद्ध होगा।        

हाइड्रोपावर परियोजनाओं को मिल सकती है सैद्धांतिक मंजूरी

पर्यावरण मंत्रालय ने राज्यों को जारी किए गए एक नोट में कहा है कि नदी के बेसिन की वहन क्षमता और संचयी प्रभाव का मूल्यांकन किए जाने से पहले भी हाइड्रोपॉवर परियोजनाओं को सैद्धांतिक मंजूरी दी जा सकती है।

पर्यावरण विशेषज्ञों ने मंत्रालय के इस रुख पर चिंता जताई है।

राज्य सरकारों को जारी किए गए नोट में मंत्रालय ने कहा है कि वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत मंजूरी प्रदान करने में समय लगता है, इसलिए वन संरक्षण प्रभाग एक उचित प्रक्रिया के तहत सैद्धांतिक मंजूरी देने पर विचार कर सकता है। केंद्र ने कहा है कि रिवर बेसिन की वहन क्षमता और संचयी प्रभाव का अध्ययन बाद में किया जा सकता है जिसके आधार पर बाद में निर्णायक मंजूरी दी जा सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि एक बार सैद्धांतिक मंजूरी मिल जाने के बाद उसे वापस लेना संभव नहीं होगा।

हाइड्रोपॉवर परियोजनाओं को पर्यावरण और वन मंजूरी 2013 के एक आदेश के अनुसार दी जाती है, जिसमें कहा गया था कि किसी रिवर बेसिन में एक से अधिक परियोजनाओं की स्थिति में संचयी प्रभाव और वहन क्षमता का अध्ययन किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने शिमला डेवलपमेंट प्लान को दी अनुमति, एनजीटी द्वारा लगे प्रतिबंध हटे 

सुप्रीम कोर्ट ने बीते गुरुवार शिमला डेवलपमेंट प्लान (एसडीपी) 2041 को अनुमति दे दी जिसके तहत हिमाचल प्रदेश की राजधानी में भवन निर्माण को रेग्युलेट किया जाएगा। राज्य सरकार ने वहां फिलहाल निर्माण पर रोक लगाने वाले एनजीटी के स्टे के खिलाफ याचिका लगाई थी जिसे हटाकर कोर्ट ने यह अनुमति दी है। एनजीटी ने यह देखते हुए कई निर्देश दिए थे कि शिमला में कोर, नॉन कोर के साथ हरित और ग्रामीण क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण के कारण गंभीर पर्यावरणीय और पारिस्थितिक चिंताएं पैदा कर दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि एसडीपी में विकास के लिए (निर्माण कार्य) की ज़रूरतों और पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सेफगार्ड हैं। 

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक अपने 100 पेज के आदेश में उच्चतम न्यायालय ने 20 जून 2023 को प्रकाशित किए गए डेवलपमेंट प्लान पर काम करने की अनुमति दे दी। द प्लान – “विज़न 2041” के लागू होने पर कुछ प्रतिबंधों के साथ 17 ग्रीन बेल्ट निर्मित की जाएंगी और उस कोर ज़ोन में भी निर्माण कार्य होगा जहां एनजीटी ने प्रतिबंध लगाया था। 

बाघों के हमलों में 5 साल में 302 लोगों की मौत

केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में देश में बाघों के हमलों में कुल 302 लोग मारे गए, जिनमें से 55 प्रतिशत से अधिक मौतें महाराष्ट्र में हुईं। जहां 2022 में बाघों के हमलों में 112 लोगों की मौत हुई, वहीं 2021 में 59, 2020 में 51, 2019 में 49 और 2018 में 31 लोगों की मौत हुई।

अकेले महाराष्ट्र में ऐसी 170 मौतें दर्ज की गईं, जबकि उत्तर प्रदेश में 39 मौतें हुईं। पश्चिम बंगाल में 29 लोग मारे गए। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में यह संख्या लगातार कम हुई है, 2018 में 15 से घटकर 2022 में सिर्फ एक हो गई। वहीं बिहार में बाघों के हमलों से संबंधित मौतों में वृद्धि हुई है — 2019 में शून्य से बढ़कर 2022 में यह आंकड़ा नौ तक पहुंच गया।

इसी बीच गैर-लाभकारी लाभकारी संस्था वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया (डब्ल्यूपीएसआई) ने पिछले साल देश में बाघों की मौतों के आंकड़े जारी किए हैं, जो बताते हैं कि 2023 में 204 बाघों की मौत हुई जो पिछले एक दशक में सबसे अधिक है।

महाराष्ट्र में 52, मध्य प्रदेश में 45, उत्तराखंड में 26, तमिल नाडु और केरल में 15-15, कर्नाटक में 13, और असम और राजस्थान में 10-10 बाघों की मौत हुई। उत्तर प्रदेश में 7, बिहार और छत्तीसगढ़ में तीन-तीन, जबकि ओडिशा और आंध्र प्रदेश में दो-दो बाघों की मौत हुई। तेलंगाना में 2023 में एक बाघ की मौत दर्ज की गई।

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