जीवाश्म ईंधन के प्रयोग के लिए दुबई संधि में छेद न ढूंढें सरकारें: संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि दुनिया की सरकारों को जीवाश्म ईंधन के प्रयोग के लिए पिछले साल दिसंबर में हुई वैश्विक संधि में कमज़ोरियां नहीं ढूंढनी चाहिए। इस चेतावनी के साथ संयुक्त राष्ट्र के जलवायु वार्ता प्रमुख ने अमीर देशों से अपील की कि जलवायु संकट से लड़ रहे गरीब देशों पर धन की ‘बरसात’ होनी चाहिए। कुछ देशों ने दुबई वार्ता के समापन पर हुई संधि के महत्व को हल्का दिखाने की कोशिश की है जिसमें पहली बार दुनिया के सभी देशों ने आइल और गैस पर शपथ ली। सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान ने पिछले महीने कहा था कि जीवाश्म ईंधन से ‘ट्रांजिशन अवे’ दिए गए अलग अलग विकल्पों में से एक विकल्प है। बहुत सारे देशों ने संधि की इस व्याख्या का विरोध किया था। 

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के कंवेन्शन (UNFCCC) के  कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने किसी एक सदस्य का नाम लेने से इनकार कर दिया पर चेतावन दी कि संधि की भाषा में कमज़ोरियां ढूंढना या अब तक किये गये परिश्रम को बेकार करना पूरी तरह से आत्मघाती होगा क्योंकि जलनायु परिवर्तन के कारण हर देश की अर्थव्यवस्था और वहां के नागरिकों पर असर पड़ेगा। 

जीवाश्म ईंधन को ‘खलनायक’ बनाए बिना हो ‘व्यवस्थित बदलाव’: हरदीप पुरी

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि भारत स्वच्छ ईंधन की ओर एक ‘व्यवस्थित बदलाव’ (ओडर्ली ट्रांजिशन) के पक्ष में है। पुरी के मुताबिक इस प्रक्रिया में ट्रांजिशन फ्यूल इस्तेमाल करना शामिल है और यह कार्य जीवाश्म ईंधन को ‘खलनायक’ के रूप में दिखाए बिना होना चाहिए। पुरी ने यह बात गोवा में इंडिया एनर्जी वीक के दौरान कही।    

ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देते हुए यह तर्क दिया जाता है कि तेल और गैस का बाज़ार पर निवेश कम होने का संकट है। कई विशेषज्ञ कहते हैं कि जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से भरपूर वर्तमान एनर्जी सिस्टन को बनाये रखा जाए ताकि इकोनोमी और उपभोक्ताओं को कीमतों और बाज़ार के हिचकोलों से बचाया जा सके। भारत कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और उसकी 85 प्रतिशत ज़रूरत आयात से पूरी होती है। इस कारण अंतर्राष्ट्रीय तेल-गैस बाज़ार में उथलपुथल का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस कारण ग्रीन एनर्जी की ओर रफ्तार को बढ़ाने के साथ भारत तेल और गैस के क्षेत्र में ज़रूरी निवेश के पक्ष में वकालत करता रहा है।

कोयला भारत की ऊर्जा ज़रूरतों में अहम बना रहेगा: आईईए

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का ताजा अनुमान है कि साल 2026 तक पावर डिमांड के मामले में भारत चीन को पीछे छोड़ देगा और उसकी विकास दर दुनिया में सबसे अधिक होगी। एजेंसी का कहना है कि 2026 में भारत में बिजली मांग का 68% कोयले से ही पूरा किया जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2021 में ग्लासगो सम्मेलन में घोषणा की थी कि भारत 2070 तक नेट ज़ीरो दर्जा हासिल कर लेगा। 

आईईए के नई रिपोर्ट “इलैक्ट्रिसिटी – 2024” के मुताबिक 2026 के बाद भी कोयला भारत में पावर सेक्टर में अहम रोल अदा करता रहेगा हालांकि 2023 में जहां बिजली उत्पादन में इसका योगदान 74 प्रतिशत है वहीं यह 2026 में यह आंकड़ा कम होने की संभावना है।  

ब्रिटिश वैश्विक बैंक का नए तेल और गैस फील्ड को सीधा फाइनेंस न करने का फैसला 

ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय यूनिवर्सल बैंक बार्कलेज ने घोषणा की है कि वह किसी नये तेल और गैस फील्ड को सीधा फाइनेंस नहीं देगा। बैंक ने कहा है कि वह ऊर्जा क्षेत्र के उन कारोबारों को भी कर्ज रोकेगा जो जीवाश्म ईंधन के क्षेत्र में विस्तार कर रहे हैं। बीबीसी के मुताबिक बार्कलेज – जो कि जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में बड़े कर्ज देता रहा है – पर इस बात का जबाव लगातार बढ़ रहा है कि वह इस सेक्टर को मदद करना बन्द करे। पर्यावरण समूहों ने इसका स्वागत किया है  लेकिन यह भी कहा कि इतना कहना काफी नहीं है। 
पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था रेनफॉरेस्ट एक्शन नेटवर्क के मुताबिक 2016 से 2021 के बीच यूरोप में जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में बार्कलेज सबसे बड़ी कर्ज़दाता थी। साल 2022 में इसने $ 16,500 करोड़ का कर्ज़ दिया हालांकि यह राशि 2019 और 2020 से काफी कम थी जब करीब $ 30,000 के बराबर रकम दी गई।

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