ऊर्जा बदलाव की तीसरी कड़ी में हृदयेश जोशी बात कर रहे हैं दिल्ली की अम्बेडकर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर अस्मिता काबरा और ओड़िशा की सामाजिक कार्यकर्ता स्वप्ना सारंगी से।
इस बातचीत में यह जानने की कोशिश है कि खनन और जीवाश्म ईंधन पर आधारित ऊर्जा क्षेत्र में जस्ट ट्रांजिशन का वहां पर रहने वाले लोगों की आजीविका और नौकरियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
क्या ऐसे क्षेत्रों में रहने वालों को दूसरे गांवों और शहरों की ओर पलायन करना पड़ेगा। दोनों विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर भी चर्चा की कि कैसे सरकारों को प्रभावित होने वाले लोगों के लिए रोज़गार के नए साधन खोजने होंगे या फिर कैसे उन्हें नए कौशल सिखाए जा सकते हैं।
सुनिए इस कड़ी का तीसरा पॉडकास्ट।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
कार्बनकॉपी हिंदी में आपका स्वागत है।
आपको यह भी पसंद आ सकता हैं
-
इस साल मानसून रहेगा कमजोर, सामान्य से कम होगी वर्षा; एल नीनो की संभावना
-
बैटरी रीसाइक्लिंग इकाइयों के पास ज़हर बनी मिट्टी, कई राज्यों में मिला सीसे का खतरनाक स्तर
-
ईरान युद्ध से वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया, भारत पर भी बढ़ा दबाव
-
जलवायु आपदाएं और मानसिक स्वास्थ्य: भारत में बढ़ता एक ‘मौन संकट’
-
ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच क्या किसानों की आय बढ़ा सकता है हाइब्रिड मॉडल?
