भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इस साल जून से सितंबर के दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है। विभाग के अनुसार देश में इस बार दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का 90 प्रतिशत वर्षा हो सकती है। एलपीए का मतलब किसी क्षेत्र में 30 से 50 वर्षों के दौरान हुई औसत बारिश से होता है। भारत के लिए यह औसत 87 सेंटीमीटर है।
आईएमडी के मुताबिक पूर्वोत्तर भारत में सामान्य बारिश होने की संभावना है, जबकि बाकी हिस्सों में कम वर्षा हो सकती है।
मौसम विभाग ने कहा कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति विकसित हो रही है। अल नीनो एक जलवायु पैटर्न है, जिसमें समुद्र का तापमान बढ़ने से भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों को कम बारिश और मौसम संबंधी चुनौतियों के लिए तैयार रहने को कहा है।
आंधी-बारिश से कई राज्यों में तबाही, तापमान में गिरावट
मानसून से पहले देश के कई राज्यों में तेज आंधी, बारिश और ओलावृष्टि ने मौसम का मिजाज बदल दिया है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में तापमान में बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जबकि राजस्थान में भी बारिश और धूलभरी आंधी की गतिविधियां बढ़ने लगी हैं।
पश्चिम बंगाल में कोलकाता और दक्षिण बंगाल के कई जिलों में भारी बारिश और तेज हवाओं के कारण सात लोगों की मौत हो गई। कई जगह पेड़ उखड़ गए, सड़कें जलमग्न हो गईं और हवाई व रेल सेवाएं प्रभावित रहीं।
उत्तराखंड के धनोल्टी में भीषण तूफान से ईको पार्क और कई इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा। वहीं, उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में आंधी के दौरान निर्माणाधीन पुल का हिस्सा गिरने से छह मजदूरों की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में लू से 100 से अधिक मौतें, बिजली आपूर्ति और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ा दबाव
भीषण गर्मी और लू के कारण आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। खलीज टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार आंध्र प्रदेश के एक दर्जन से अधिक जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया, जबकि पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी क्षेत्रों में पारा 48 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया। ईटीवी भारत की रिपोर्ट में कहा गया कि तेलंगाना के वारंगल में 23 लोगों की मौत दर्ज की गई, जो क्षेत्र में सबसे अधिक है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मध्य भारत के छत्तीसगढ़ में रायपुर एयरपोर्ट पर काम कर रहे इलेक्ट्रीशियन कुबेर चंद्र साहू गर्मी के कारण बेहोश होकर छत से गिर पड़े और उनकी मौत हो गई।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2024 में तेलंगाना में हीट स्ट्रोक और सनस्ट्रोक से 116 मौतें दर्ज की गईं। हालांकि, राज्य की ‘हीटवेव एक्शन प्लान 2026’ रिपोर्ट में इसी अवधि के लिए केवल 10 मौतों का उल्लेख किया गया है। अखबार ने कहा कि 106 मौतों का यह अंतर चरम गर्मी से होने वाली मौतों की निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समान व्यवस्था की कमी को उजागर करता है। रिपोर्ट के मुताबिक अत्यधिक गर्मी से होने वाली मौतों का वास्तविक आंकड़ा आधिकारिक रिकॉर्ड में ‘अदृश्य’ रह सकता है।
आंध्र प्रदेश के ऊर्जा मंत्री गोट्टिपाटी रवि कुमार ने कहा कि राज्य में बिजली की मांग में तेज़ बढ़ोतरी का मुख्य कारण बढ़ता तापमान है, जहां कई क्षेत्रों में तापमान लगभग 49 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि कुछ जगहों पर बिजली कटौती इसलिए हो रही है क्योंकि अभूतपूर्व मांग के कारण ट्रांसमिशन लाइनें क्षतिग्रस्त हो रही हैं और ट्रांसफॉर्मर ओवरहीट हो रहे हैं, न कि बिजली की कमी की वजह से।
द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के अनुसार रिकॉर्ड स्तर के रात के तापमान के कारण स्वास्थ्य पर असर और गंभीर होता जा रहा है। इस सप्ताह दिल्ली में पिछले लगभग 14 वर्षों की सबसे गर्म मई की रात दर्ज की गई हालांकि बीते शुक्रवार रात को तापमान में गिरावट दर्ज की गई। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक राजधानी में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचने के बीच अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत के बड़े हिस्सों में लू की स्थिति बनी रहेगी।
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार कई क्षेत्रों में घरों को ठंडा रखने के लिए बिजली की मांग अब उद्योगों की बिजली मांग से भी अधिक हो गई है, जिससे भारत का पावर ग्रिड “अनचाहे और अनजाने क्षेत्र” में पहुंच रहा है। वहीं हिंदुस्तान टाइम्स ने कहा कि कूलिंग सुविधाओं की कमी और ‘इंफ्रास्ट्रक्चर डिजाइन की विफलता’ भी गर्मी से होने वाली मौतों को बढ़ा रही है।
उत्तराखंड में आग की 375 घटनाएं, हिमाचल में आग को काबू करने के लिए सेना लगाई
उत्तराखंड में इस साल आग की 375 घटनाएं हुईं जिनमें चमोली ज़िला सर्वाधिक प्रभावित रहा। इस ज़िले में 133 घटनायें दर्ज की गईं और 62 हेक्टेयर से अधिक जंगल जले। ये आंकड़े 15 फरवरी और 24 मई के बीच के हैं। फरवरी मध्य से सालाना फायर सीज़न की शुरुआत मानी जाती है। जहां चमोली में 133 की घटनायें हुईं वहीं कुमाऊं के पिथौरागढ़ में अब तक 32 और नैनीताल में 13 घटनायें ही दर्ज की गईं। गढ़वाल के अन्य ज़िलों को देखें तो पौड़ी और टिहरी में 42-42 और रुद्रप्रयाग में 37 घटनायें हुईं हैं।
जंगलों आग मानवजनित ही होती है, ज़ाहिर तौर पर लोगों में जागरूकता और सख्त मॉनिटरिंग ज़रूरी है। उत्तराखंड में कुमाऊं डिवीज़न के वन अधिकारी ने कहा कि इस साल फायर सीज़न से पहले लोगों में सघन जागरूकता अभियान चलाया गया जिसका असर आग की घटनाओं में कमी के रूप में दिख रहा है।
उधर हिमाचल प्रदेश के कसौली क्षेत्र में लगी भीषण जंगल की आग पर भारतीय सेना और वायुसेना ने करीब 15 घंटे के संयुक्त अभियान के बाद काबू पा लिया। तेज हवाओं, सूखी चीड़ की पत्तियों और भीषण गर्मी के कारण आग तेजी से फैली थी, जिससे वायुसेना स्टेशन और आसपास के जंगलों को खतरा पैदा हो गया। आग बुझाने के लिए वायुसेना के Mi-17 और चिनूक हेलीकॉप्टरों ने सुखना झील से पानी भरकर ‘बांबी बकेट’ अभियान चलाया। घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।
वनाग्नि नियंत्रण के लिए उत्तराखंड में 1,438 क्रू स्टेशन और 40 कंट्रोल रूम सक्रिय
उत्तराखंड सरकार का कहना है कि राज्य में आग की घटनाओं को रोकने के लिए व्यापक प्रबंध किये गया हैं। मुख्य वन संरक्षक और नोडल अधिकारी (वनाग्नि) सुशांत पटनायक ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि संसाधनों और तकनीक के एकीकरण से वन विभाग की आग बुझाने की क्षमता मजबूत हुई है।
पटनायक ने बताया कि वन सर्वेक्षण विभाग (Forest Survey of India) द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े आग बुझाने के अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि एजेंसी सक्रिय आग की सैटेलाइट तस्वीरें हासिल कर जानकारी वन विभाग के फायर सेल को भेजती है, जिसके बाद संबंधित वन प्रभागों को लोकेशन और निर्देशांक सत्यापन के लिए भेजे जाते हैं। इससे फील्ड टीमें लक्षित तरीके से आग बुझाने का अभियान चला पाती हैं।
जमीनी स्तर पर स्थिति से निपटने के लिए विभाग ने राज्यभर में 1,438 क्रू स्टेशन और 40 कंट्रोल रूम सक्रिय किए हैं। इसके अलावा वन मुख्यालय में एकीकृत कंट्रोल और कमांड सेंटर भी स्थापित किया गया है। पटनायक ने बताया कि 5,600 फायर वॉचर्स की भी तैनाती की गई है।
पटनायक ने कहा कि सूखी चीड़ की पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में “पिरुल” कहा जाता है, उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने का बड़ा कारण बनी हुई हैं। उन्होंने बताया कि पिछले फायर सीजन में 5,600 टन “पिरुल” एकत्र किया गया था, जबकि इस वर्ष विभाग ने इसका लक्ष्य बढ़ाकर 8,500 टन कर दिया है।
गीर में संदिग्ध बेबेसिया संक्रमण से एशियाई शेरों के 8 शावक मरे
गुजरात के जूनागढ़ ज़िले में गिर क्षेत्र में अब तक एशियाई शेरों के 8 शावकों (lion cubs) की मौत हो गई है।
गुजरात के वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने शुक्रवार को कहा कि शावकों की मौत संदिग्ध ‘बेबेसिया’ संक्रमण के कारण हुई है। ‘बेबेसिया’ (Babesia) संक्रमण टिक (किलनी) से फैलने वाला परजीवी संक्रमण है।
मोढवाडिया ने कहा कि पशु चिकित्सकों की एक टीम ने सैंपल एकत्र किए हैं जिन्हें परीक्षण के लिए गुजरात जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र में भेजा गया है। उन्होंने कहा कि अगले तीन से चार दिनों के भीतर रिपोर्ट आने की उम्मीद है, जिससे पुष्टि हो जाएगी कि मौतें बेबेसिया संक्रमण के कारण हुई हैं या नहीं।
संभावित संक्रमण को रोकने के लिए अधिकारियों ने आस-पास के इलाकों के 10 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले शेरों को अलग कर दिया है। मोढवाडिया ने कहा कि गिर अभयारण्य और आसपास के क्षेत्रों में टिक हटाने का अभियान शुरू किया गया है।
इससे पहले भी गीर के जंगलों और अन्य अभयारण्यों में बड़े मांसाहारी वन्यजीवों में गंभीर बीमारियों के मामले सामने आ चुके हैं। वर्ष 2018 में गुजरात के गिर नेशनल पार्क में बड़ी संख्या में एशियाई शेरों की मौत हुई थी। जांच में कई शेरों में “कैनाइन डिस्टेंपर वायरस” (CDV) और बाबेसिया संक्रमण की पुष्टि हुई थी। शुरुआती दो हफ्तों में करीब 28 शेरों की मौत दर्ज की गई थी।हालिया एशियाई शेर गणना (2025) के अनुसार, वर्तमान में गीर लैंडस्केप और आसपास के क्षेत्रों में कुल 891 एशियाई शेर हैं। यह संख्या 2020 में दर्ज 674 शेरों की तुलना में लगभग 32% अधिक है। इनमें से लगभग 394 शेर गीर नेशनल पार्क, गीर वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी और उससे जुड़े संरक्षित क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि 500 से अधिक शेर अब सौराष्ट्र के अन्य इलाकों, तटीय क्षेत्रों और सैटेलाइट हैबिटैट में फैल चुके हैं।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
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