दिल्ली में पिछले एक सप्ताह से वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 200 से 300 के बीच बना हुआ है, जो आमतौर पर सर्दियों में देखा जाता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों से आने वाली धूलभरी हवाएं इसका मुख्य कारण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला पहले इन हवाओं और धूल को रोकने का प्राकृतिक अवरोध का काम करती थी, लेकिन खनन, पत्थर खदानों और अतिक्रमण के कारण इसकी क्षमता कमजोर हो गई है।
खासकर अलवर और भरतपुर क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पहाड़ियों को नुकसान पहुंचा है।
एक हालिया अध्ययन के अनुसार, 2017 से 2024 के बीच अरावली क्षेत्र में निर्माण क्षेत्र 53 प्रतिशत बढ़ा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वनस्पति खत्म होने और मिट्टी ढीली पड़ने से धूल अब सीधे दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच रही है, जिससे प्रदूषण और ‘डेजर्टिफिकेशन’ यानी भूमि के रेगिस्तान में बदलने का खतरा बढ़ रहा है।
नर्मदा में दूध चढ़ाने पर एनजीटी ने मांगी रिपोर्ट
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने नर्मदा नदी में धार्मिक अनुष्ठान के दौरान 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियां चढ़ाने के मामले में केंद्रीय और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जवाब मांगा है। एनजीटी में दायर एक याचिका में आरोप लगाया गया है कि 8 अप्रैल को सीहोर जिले के सतदेव गांव में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान यह सामग्री नदी में प्रवाहित की गई, जिससे जल और जलीय जीवों पर असर पड़ सकता है।
एनजीटी ने कहा कि फिलहाल दूध से प्रदूषण के वैज्ञानिक प्रमाण पेश नहीं किए गए हैं, लेकिन जल प्रदूषण रोकथाम कानून के तहत नदियों में प्रदूषण फैलाने वाली चीजें डालना प्रतिबंधित है। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।
प्लास्टिक खाद्य और पेय पैकेजिंग दुनिया के तटीय क्षेत्रों में सबसे आम कचरा: अध्ययन
एक नए अध्ययन में पाया गया है कि प्लास्टिक के फूड बॉक्स, बोतलें, ढक्कन और कैप दुनिया भर के समुद्री तटों पर पाए जाने वाले सबसे आम कचरे में शामिल हैं। गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार शोधकर्ताओं ने तटीय कचरे पर किए गए 5,300 से अधिक सर्वेक्षणों के आंकड़ों का विश्लेषण कर इस तरह का पहला वैश्विक अध्ययन तैयार किया। इसके लिए विषय से संबंधित 355 पूर्व अध्ययनों के आंकड़ों का उपयोग किया गया।
रिचर्ड थामसन, जो प्लाइमोथ विश्वविद्यालय (University of Plymouth) की अंतरराष्ट्रीय समुद्री कचरा अनुसंधान इकाई के संस्थापक हैं, ने कहा कि “ऐसे देशों में भी, जहां कचरा प्रबंधन की व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर है, तटों पर सबसे अधिक यही वस्तुएं पाई जाती हैं।” उन्होंने कहा कि सातों महाद्वीपों के समुद्री तटों पर इन वस्तुओं का इतनी लगातार मौजूद होना उनके लिए भी आश्चर्यजनक था।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि केवल प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाने से जरूरी नहीं कि किसी देश में प्लास्टिक कचरा कम हो जाए। इसके पीछे नीतियों के कमजोर क्रियान्वयन या अन्य देशों से कचरे के आयात जैसे कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।
शोध में माइक्रोप्लास्टिक या ऐसे प्लास्टिक कणों को शामिल नहीं किया गया जिन्हें पहचानना संभव नहीं था। हालांकि अध्ययन के लेखकों ने कहा कि इस तरह के अधिकांश सूक्ष्म प्लास्टिक बड़े और पहचान योग्य प्लास्टिक कचरे से ही उत्पन्न होते हैं।
एनजीटी ने राज्यों से प्रदूषण क्षतिपूर्ति फंड के उपयोग का ब्योरा मांगा
नेशनल ग्रीन ट्राईब्यूनल (एनजीटी) ने देशभर के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों को पर्यावरण क्षतिपूर्ति फंड के उपयोग का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में मिले फंड के खर्च और उसके ऑडिट की स्थिति की जानकारी दी जानी चाहिए। यह निर्देश 14 मई को पारित आदेश में दिया गया।
कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (केएसपीसीबी) ने हाल ही में एनजीटी को बताया था कि फंड का उपयोग नियमों के अनुसार किया जा रहा है, लेकिन खर्च का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया। बोर्ड ने अपने हलफनामे में कहा कि उसे पिछले पांच वर्षों में पर्यावरण मुआवजे के रूप में 13.6 करोड़ रुपए से अधिक प्राप्त हुए हैं।
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