मथुरा-वृंदावन में यमुना प्रदूषण पर एनजीटी सख्त, केंद्र और यूपी सरकार को नोटिस

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मथुरा और वृंदावन में यमुना नदी के बढ़ते प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।याचिका में दावा किया गया है कि नदी का पानी ‘बेहद खराब’ श्रेणी D में पहुंच चुका है, जो न तो स्नान के लिए उपयुक्त है और न ही पीने के लिए।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि बिना उपचारित (ट्रीटेड) सीवेज सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है और बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) पर अवैध निर्माण बिना रोक-टोक जारी है। ट्रिब्यूनल ने संबंधित प्राधिकरणों से सीवेज ट्रीटमेंट और अतिक्रमण हटाने को लेकर अपने पहले के आदेशों के अनुपालन पर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।

गर्भावस्था में वायु प्रदूषण का असर, बच्चों के बोलना सीखने में होती देरी: शोध

एक नए शोध में पाया गया है कि गर्भावस्था के शुरुआती चरण में अधिक वायु प्रदूषण के संपर्क में आने वाले शिशु, कम प्रदूषण के संपर्क वाले बच्चों की तुलना में बोलना सीखने में ज्यादा समय लेते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, गर्भावस्था की पहली तिमाही में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म व अति-सूक्ष्म कणों (पार्टिकुलेट मैटर) के संपर्क से 18 महीने की उम्र तक बच्चों के भाषाई विकास में देरी देखी गई।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि समय से पहले जन्मे (प्रीमैच्योर) बच्चों पर इसका असर और गंभीर होता है। इनमें न केवल बोलने की क्षमता में देरी होती है, बल्कि मोटर स्किल्स (शारीरिक गतिविधियों से जुड़ी क्षमताएं) भी प्रभावित होती हैं।

वार ऑन वॉन्ट के कैंपेन प्रमुख टायरोन स्कॉट ने कहा, “यह शोध एक चेतावनी है कि वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन की शुरुआत से ही न्याय और समानता का सवाल है।”

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह लंदन में गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों के भाषाई व मोटर विकास पर प्रदूषण के प्रभाव का पहला अध्ययन है, लेकिन इसके निष्कर्ष वैश्विक स्तर पर लागू होते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रदूषण फैलाने वाले कई उद्योग अब विकसित देशों से हटकर विकासशील देशों में चले गए हैं, जिससे कम और मध्यम आय वाले देशों में रहने वाले लोगों पर इसका अधिक असर पड़ रहा है। वहीं, समृद्ध देशों में भी गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदाय इस बोझ को असमान रूप से झेल रहे हैं।

मुंबई और सिकंदराबाद के लैंडफिल दुनिया के बड़े मीथेन उत्सर्जक, वैश्विक अध्ययन में खुलासा

एक वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि 2025 में मुंबई और सिकंदराबाद दुनिया के सबसे बड़े मीथेन उत्सर्जन करने वाले लैंडफिल साइट्स में शामिल हैं। सैटेलाइट डेटा के आधार पर किए गए इस अध्ययन में दुनियाभर के 707 कचरा स्थलों से निकलने वाले 2,994 मीथेन प्लूम्स का विश्लेषण किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में तेलंगाना के सिकंदराबाद और महाराष्ट्र के मुंबई स्थित लैंडफिल दुनिया के शीर्ष 25 सबसे बड़े मीथेन उत्सर्जक स्थलों में शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने 18 देशों में ऐसे 25 ‘सुपर-एमिटिंग’ लैंडफिल चिन्हित किए हैं, जिनसे होने वाला उत्सर्जन इतना अधिक है कि इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।

ये लैंडफिल साइट्स ब्राजील, चिली, सऊदी अरब, अमेरिका समेत कई देशों में फैली हुई हैं।

मीथेन एक ग्रीनहाउस गैस है, जो अल्पावधि में कार्बन डाइऑक्साइड से 80 गुना अधिक प्रभावी रूप से गर्मी बढ़ाती है। रिपोर्ट के अनुसार, एक लैंडफिल से प्रति घंटे 5 टन मीथेन उत्सर्जन लगभग 10 लाख एसयूवी के बराबर ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव डाल सकता है।

हैदराबाद का जवाहर नगर लैंडफिल और मुंबई का कांजुरमार्ग लैंडफिल इस सूची में क्रमशः चौथे और बारहवें स्थान पर हैं, जो वैश्विक ताप वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

ध्वनि प्रदूषण पर सख्त गुजरात हाईकोर्ट, अहमदाबाद म्युनिसिपल कमिश्नर और गृह सचिव तलब

गुजरात हाईकोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण पर अपने निर्देशों के पालन न होने को लेकर अहमदाबाद नगर निगम आयुक्त, राज्य के गृह सचिव और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष से जवाब मांगा है।

रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने शीर्ष अधिकारियों से पूछा कि ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के लिए दिए गए निर्देशों को अब तक लागू क्यों नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि यह ‘बेहद पीड़ादायक’ है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 साल पहले जारी दिशा-निर्देशों के बावजूद गुजरात आज भी ध्वनि प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित प्राधिकरणों ने शीर्ष अदालत के निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 18 जून को तय की गई है।

Website |  + posts

दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
कार्बनकॉपी हिंदी में आपका स्वागत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

कार्बन कॉपी
Privacy Overview

This website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. Cookie information is stored in your browser and performs functions such as recognising you when you return to our website and helping our team to understand which sections of the website you find most interesting and useful.