एनसीएपी: 7 साल बाद भी लक्ष्य से दूर अधिकांश शहर

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के सात वर्ष बाद भी देश में साफ हवा का लक्ष्य दूर बना हुआ है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (क्रिया) के 1 अप्रैल, 2025 से 31 मार्च, 2026 तक 96 शहरों के पीएम10 आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि बहुत कम शहर तय मानकों तक पहुंचे। उत्तर भारत में स्थिति सबसे खराब रही — गाजियाबाद में पीएम10 औसत 215 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ, जो राष्ट्रीय मानक 60 से तीन गुना अधिक है, जबकि दिल्ली (201) और नोएडा (195) भी गंभीर स्तर पर रहे।

हालांकि 2017-18 के मुकाबले 79 शहरों में सुधार हुआ, 27 शहरों में 40% से अधिक कमी आई, जिसमें उत्तर प्रदेश के नौ शहर शामिल हैं। देहरादून में 75% गिरावट दर्ज हुई, जबकि विशाखापट्टनम में 73% वृद्धि हुई। मार्च 2026 में पीएम2.5 के मामले में केवल तीन शहर ही डब्ल्यूएचओ मानकों पर खरे उतरे, गुरुग्राम सबसे प्रदूषित रहा।

विशेषज्ञों ने सख्त और वैज्ञानिक कदमों की जरूरत बताई है।

बैटरी रीसाइक्लिंग इकाइयों के पास ज़हर बनी मिट्टी, कई राज्यों में मिला सीसे का खतरनाक स्तर

भारत के कई हिस्सों में बैटरी रीसाइक्लिंग इकाइयों के आसपास की मिट्टी में सीसा (लेड) का खतरनाक स्तर पाया गया है, जो लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। पर्यावरण अनुसंधान संस्था टॉक्सिक्स लिंक की ओर से किए गए अध्ययन ‘सॉइल्ड विथ लेड: फ्रॉम बैटरी रीसाइक्लिंग‘ में यह खुलासा हुआ है।

अध्ययन के तहत दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों की मिट्टी से 23 नमूने लिए गए। इनमें से कई स्थान रिहायशी क्षेत्रों और स्कूलों के पास भी थे। सभी नमूनों में 100 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) से लेकर 43,800 पीपीएम तक सीसे का स्तर पाया गया, जो व्यापक प्रदूषण की ओर इशारा करता है।

रिपोर्ट के अनुसार, 52 प्रतिशत नमूनों में सीसे की मात्रा 5,000 पीपीएम की सीमा से अधिक थी। सीसे की इतनी मात्रा जिस स्थान पर हो उसे खतरनाक प्रदूषित स्थल माना जाता है। वहीं 31 प्रतिशत नमूने औद्योगिक क्षेत्रों के तय मानकों से भी ऊपर पाए गए।

चौंकाने वाली बात यह रही कि अधिकृत (फॉर्मल) रीसाइक्लिंग इकाइयों के आसपास औसतन ज्यादा सीसा पाया गया, जबकि अनधिकृत इकाइयों में भी प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रहा।

विशेषज्ञों के मुताबिक, सीसा एक अत्यंत विषैला धातु है, जो हवा, पानी और मिट्टी के जरिए मानव शरीर में पहुंचकर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

यमुना में प्रदूषण बढ़ा, कोलिफॉर्म और बीओडी स्तर चिंताजनक

दिल्ली में यमुना नदी का प्रदूषण मार्च में और बढ़ गया है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की रिपोर्ट के अनुसार, फीकल कोलिफॉर्म और बीओडी स्तर में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। असगरपुर में कोलिफॉर्म स्तर 4 लाख एमपीएन/100 मिली तक पहुंच गया, जो तय सीमा से कई गुना अधिक है। अन्य स्थानों पर भी फरवरी के मुकाबले बढ़ोतरी देखी गई।

बीओडी स्तर 2 से 60 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच रहा, जबकि मानक 3 मिलीग्राम प्रति लीटर है। अधिक बीओडी से पानी में ऑक्सीजन की कमी होती है, जिससे जलीय जीवन प्रभावित होता है। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि बड़ी मात्रा में अनट्रीटेड सीवेज नदी में जा रहा है।

यमुना प्रदूषण: गुरुग्राम के नालों में बंद होगा सीवेज प्रवाह

हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम में यमुना में प्रदूषण कम करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अधिकारियों के अनुसार, शहर के लेग-1, लेग-2 और लेग-3 स्टॉर्म वॉटर ड्रेनों में हो रहे अवैध सीवेज डिस्चार्ज को जून के अंत तक चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाएगा। अनुमान है कि फिलहाल करीब 150 मिलियन लीटर अनट्रीटेड सीवेज प्रतिदिन इन नालों में जा रहा है, जिसे अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) की ओर मोड़ा जाएगा। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा कि भूमि उपयोग परिवर्तन की मंजूरी के दौरान परियोजनाओं में सीईटीपी लगाना भी जरूरी किया जा सकता है।

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