नज़रिया: भारत में बढ़ती गर्मी अब ‘मौसम’ नहीं, एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट

भारत इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है, और यह संकट अब केवल तापमान के आंकड़ों तक सीमित नहीं रह गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के लगातार अलर्ट के बीच उत्तर भारत — दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान — सहित कई राज्यों में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है।

स्थिति की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि अब हीटवेव किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से एक साथ इसकी चपेट में हैं। कई जगह तापमान सामान्य से 4-5 डिग्री ज्यादा दर्ज किया जा रहा है — जो मानव शरीर पर अत्यधिक ‘हीट स्ट्रेस’ डालता है।

सबसे चिंताजनक बदलाव ‘गर्म रातों’ (Warm Nights) का है। पहले जहां रातें राहत देती थीं, अब रात का न्यूनतम तापमान भी ऊंचा बना रहता है, जिससे शरीर को राहत ( रिकवरी)  का समय नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है — डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक, किडनी पर दबाव और हृदय संबंधी जोखिम तेजी से बढ़ रहे हैं।

इस संकट का सबसे बड़ा बोझ गरीब और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर पड़ रहा है। दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, निर्माण श्रमिक और सड़क किनारे काम करने वाले लोग घंटों धूप में रहने को मजबूर हैं। काम बंद करने का मतलब आय का खत्म होना है, इसलिए वे जान जोखिम में डालकर काम जारी रखते हैं।

हीटवेव का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। उत्पादकता में गिरावट, श्रम घंटों में कमी और बढ़ते चिकित्सा खर्च — ये सब मिलकर गरीब परिवारों को और गहरे आर्थिक संकट में धकेल रहे हैं।

सरकार और कई शहरों में ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू किए गए हैं, लेकिन तेजी से बदलती जलवायु परिस्थितियों के सामने ये प्रयास अभी अपर्याप्त दिखते हैं।

स्पष्ट है — भारत में हीटवेव अब एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि एक उभरती हुई ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ है, जिसे गंभीर नीति, डेटा और स्वास्थ्य ढांचे के साथ तत्काल संबोधित करने की जरूरत है।

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