विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली रिज में 'थीम पार्क' बनने से पशु-पक्षियों के प्राकृतिक हैबिटैट संकुचित हो जाएंगे और इकोसिस्टम को नुकसान होगा। फोटो: Wikimedia Commons

सेंट्रल रिज में ‘थीम पार्क’ योजना पर विवाद, दिल्ली के ‘ग्रीन लंग्स’ पर खतरे की चेतावनी

दिल्ली के सेंट्रल रिज क्षेत्र में ‘थीम-आधारित स्पेशल फॉरेस्ट’ विकसित करने की योजना के तहत वन विभाग द्वारा जारी टेंडर पर विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने गंभीर आपत्ति जताई है। टेंडर में दीमकों छुटकारा पाने के लिए प्रतिबंधित कीटनाशक लिंडेन के उपयोग का उल्लेख किया गया है, जो विवाद का बड़ा कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि दीमक जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करते हैं।

हालांकि वन विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि लिंडेन का उल्लेख टेंडर में गलती से हुआ है, और इसकी जगह सीमित मात्रा में क्लोरपाइरीफॉस के नियंत्रित उपयोग किया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञ इसे भी खतरनाक मान रहे हैं।

पर्यावरण के जानकारों ने स्पेशल फॉरेस्ट की योजना पर भी चेतावनी दी है और कहा है कि थीम-आधारित वनरोपण से सेंट्रल रिज की इकोलॉजी को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा कीटनाशकों के उपयोग से पशु-पक्षियों और मानव जीवन को भी खतरा हो सकता है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि सेंट्रल रिज एक प्राकृतिक वन है, इसलिए कृत्रिम वनरोपण की जगह इसे प्राकृतिक रूप से बहाल किया जाना चाहिए। 

पर्यावरण कार्यकर्ता भावरीन कंधारी ने रिज में भूमि-उपयोग बदलने पर एक शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि यह टेंडर प्राकृतिक वन संरक्षण से हटकर कृत्रिम लैंडस्केपिंग की ओर संकेत करता है। उनके अनुसार, 40,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में थीम पार्क बनाने की योजना शहर के ‘ग्रीन लंग्स’ को नष्ट कर देगी और जैव-विविधता को गंभीर नुकसान पहुंचाएगी। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में प्राकृतिक इकोसिस्टम को बदलकर कृत्रिम संरचनाएं खड़ी की जा रही हैं। फेंसिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास द्वारा वन्यजीवों का हैबिटैट भी संकुचित हो जाएगा। 

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसे प्रोजेक्ट न केवल वन संरक्षण कानून का उल्लंघन कर सकते हैं, बल्कि मिट्टी, जल और वन्यजीवों पर भी दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव डालेंगे। लेखक अंकुर बिसेन ने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी में कहा कि “रिज के बीचों-बीच ‘थीम पार्क’ बनाने का विचार दरअसल राष्ट्रवाद की राजनीति को रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में बदल देता है। यह कल्पित उद्देश्यों के लिए जीवित प्रकृति को भी नहीं बख्शेगा और अंततः मॉल व रिसॉर्ट जैसे ढांचों का रास्ता खोल सकता है।”

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