दिल्ली की एयर क्वॉलिटी 161 दिनों बाद ‘संतोषजनक’ स्तर पर लौटी

Editorial Team17 मार्च. 2025
दिल्ली की एयर क्वॉलिटी 161 दिनों बाद ‘संतोषजनक’ स्तर पर लौटी

पिछले साल 29 सितंबर, 2024 के बाद पहली बार शनिवार को दिल्ली की वायु गुणवत्ता “संतोषजनक” श्रेणी में आईसुधरी। राजधानी में 161 दिन बाद आये इस बदलाव में शुक्रवार से क्षेत्र में छिटपुट बारिश और कभी-कभी चली तेज हवाओं ने मदद की। इस कारण वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान के चरण 1 की पाबंदियों को हटा लिया।  

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दैनिक राष्ट्रीय बुलेटिन के अनुसार, शनिवार को शाम 4 बजे दिल्ली का 24 घंटे का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 85 (संतोषजनक) था, जो शुक्रवार के 198 (मध्यम) से काफी बेहतर है। गुरुवार को यह 179 (मध्यम) और बुधवार को 228 (खराब) था। पिछले साल 29 सितंबर को दिल्ली का AQI 76 (संतोषजनक) रहा था।

यमुना के 23 मॉनिटरिंग स्थल जल गुणवत्ता परीक्षण में फ़ेल हुए: संसदीय समिति की रिपोर्ट

एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि  दिल्ली क्षेत्र में यमुना नदी की जीवनदायिनी क्षमता लगभग नगण्य पाई गई है। यमुना दिल्ली में 40 किलोमीटर रास्ता तय करती है। यमुना के बहाव क्षेत्र में कुल 33 मॉनीटरिंग स्थलों में से जिन 23 क्षेत्रों की जांच की गई उनमें राष्ट्रीय राजधानी के छह स्थल शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि वे सभी प्राथमिक जल गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल रहे।

जल संसाधन पर संसद की स्थायी समिति ने मंगलवार को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि नदी में घुली ऑक्सीजन (डीओ) का स्तर, जो नदी की जीवन को बनाए रखने की क्षमता को दर्शाता है, दिल्ली क्षेत्र में लगभग नगण्य पाया गया।

ऊपरी यमुना नदी सफाई परियोजना और दिल्ली में नदी तल प्रबंधन पर अपनी रिपोर्ट में पैनल ने चेतावनी दी कि दिल्ली और उत्तर प्रदेश में सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी) के निर्माण और अपग्रेडेशन के बावजूद जल प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रूप से बहुत अधिक बना हुआ है। कुछ 33 निगरानी स्थलों में से उत्तराखंड में केवल चार और हिमाचल प्रदेश में चार ही प्राथमिक जल गुणवत्ता मानदंडों पर खरे उतरे।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के साथ मिलकर जनवरी 2021 से मई 2023 के बीच 33 स्थानों पर पानी की गुणवत्ता का आकलन किया। इस आकलन में घुली हुई ऑक्सीजन (डीओ), pH, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और फेकल कोलीफॉर्म (एफसी) के चार प्रमुख पैरामीटर शामिल थे।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नई रिपोर्ट में प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान संगम का पानी “स्नान के लिए उपयुक्त” 

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण को सौंपी गई नई रिपोर्ट में सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर दावा किया गया है कि प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान संगम में पानी की गुणवत्ता “स्नान के लिए उपयुक्त” थी। सीपीसीबी का यह कथन फरवरी में दी गई पिछली रिपोर्ट के बिल्कुल विपरीत है।

सीपीसीबी की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि सांख्यिकीय विश्लेषण इसलिए आवश्यक था क्योंकि एक ही स्थान से अलग-अलग तिथियों और एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों से एकत्र किए गए नमूनों में “आंकड़ों में भिन्नता” थी, जिसके कारण ये आंकड़े “नदी क्षेत्र में समग्र नदी जल की गुणवत्ता” को नहीं दर्शाते थे।

दिसंबर के आदेश के अनुपालन में 17 फरवरी को सीपीसीबी ने जो  रिपोर्ट दी, उसमें दिखाया गया कि जनवरी के दूसरे सप्ताह में की गई जांच के दौरान प्रयागराज में संगम के पानी में फीकल कोलीफॉर्म और बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड का स्तर स्नान लायक जल के मानदंडों को पूरा नहीं करता था। 

लेकिन अब 28 फरवरी की तारीख वाली और 7 मार्च को एनजीटी की वेबसाइट पर अपलोड की गई नई रिपोर्ट में कहा गया है कि सीपीसीबी ने 12 जनवरी से लेकर हर सप्ताह दो बार वॉटर मॉनीटरिंग की थी, जिसमें महाकुंभ के दौरान शुभ स्नान के दिन भी शामिल थे। गंगा नदी पर पांच स्थानों और यमुना नदी पर दो स्थानों पर जल निगरानी की गई थी।

रिपोर्ट में कहा गया है, “विभिन्न तिथियों पर एक ही स्थान से लिए गए नमूनों के लिए विभिन्न मापदंडों जैसे पीएच, घुलित ऑक्सीजन (डीओ), जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) और फीकल कोलीफॉर्म काउंट (एफसी) के मूल्यों में महत्वपूर्ण परिवर्तनशीलता है। एक ही दिन एकत्र किए गए नमूनों के लिए उपर्युक्त मापदंडों के मूल्य भी अलग-अलग स्थानों पर भिन्न होते हैं।”

मध्य प्रदेश में यूनियन कार्बाइड के कचरे को जलाने का दूसरा चरण पूरा 

मध्य प्रदेश के धार जिले में एक डिस्पोज़ल प्लांट में यूनियन कार्बाइड कचरे को जलाने का दूसरा चरण शनिवार रात को समाप्त हो गया। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी श्रीनिवास द्विवेदी ने बताया कि परीक्षण का दूसरा चरण 6 मार्च को सुबह 11 बजे शुरू हुआ और 8 मार्च (शनिवार) को शाम 7.01 बजे समाप्त हुआ। उनके मुताबिक इस दौरान निपटान इकाई में कुल 10 टन कार्बाइड अपशिष्ट को जला दिया गया।

यह कचरा भोपाल में बंद पड़े यूनियन कार्बाइड कारखाने से निकला है जहां 1984 में ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ था। आपदा के स्थल के 337 टन कचरे के निपटान की योजना के तहत, 2 जनवरी को सामग्री को राज्य की राजधानी से लगभग 250 किलोमीटर दूर पीथमपुर में कचरा निपटान संयंत्र में ले जाया गया। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार, इस कचरे का परीक्षण निपटान सुरक्षा मानदंडों का सख्ती से पालन करते हुए तीन चरणों में किया जाना है और 27 मार्च को उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिपोर्ट पेश की जानी है। टेस्ट का पहला चरण 3 मार्च को संपन्न हुआ।

यूनियन कार्बाइड की कीटनाशक फैक्ट्री से 2 और 3 दिसंबर, 1984 की रात को अत्यधिक जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस लीक हो गई थी। दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक आपदा में कम से कम 5,479 लोग मारे गए और हज़ारों अन्य शारीरिक रूप से विकलांग हो गए।

चीनी कंपनी चला रही थी खदान, ज़हरीले रिसाव से नदी प्रदूषित 

जाम्बिया में चीनी स्वामित्व वाली तांबे की खदान में एसिड रिसाव के कारण काफू नदी प्रदूषित हो गई है और इस कारण लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। यह रिसाव 18 फरवरी को हुआ जब एक टेलिंग बांध टूट गया, जिससे 50 मिलियन लीटर जहरीला कचरा निकला। अधिकारियों को दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति का डर है, क्योंकि नदी राजधानी लुसाका में रहने वाले बाशिंदों समेत पाँच मिलियन लोगों के लिए मछली पकड़ने, खेती करने और पानी की आपूर्ति का समर्थन करती है। 

रिसाव क्षेत्र के 100 किमी नीचे की ओर मरी हुई मछलियाँ देखी गई हैं, और यहां खेतों में फसलें नष्ट हो गई हैं। अब सरकार एसिड को बेअसर करने के लिए चूने का उपयोग कर रही है। साइनो-मेटल्स लीच जाम्बिया ने इस रिसाव के लिए माफ़ी मांगी और पर्यावरण को बहाल करने का संकल्प लिया। एक अन्य चीनी स्वामित्व वाली खदान में एक और छोटा एसिड रिसाव पाया गया, जहाँ एक श्रमिक की मौत हो गई।

अधिकारियों ने दोनों खदानों को बंद कर दिया और दो चीनी प्रबंधकों को गिरफ़्तार कर लिया गया। आलोचकों ने चीनी कंपनियों पर सुरक्षा और पर्यावरण नियमों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। जाम्बिया, जो पहले से ही चीन के कर्ज में डूबा हुआ है, इन घटनाओं को लेकर गुस्से में है, स्थानीय लोग अपनी ज़मीन और संसाधनों की बेहतर सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।

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