भारी सूखे मौसम के बाद जनवरी में कई राज्यों में बारिश की 100% कमी

दिसंबर में बहुत सूखे मौसम के बाद अब कम से कम 6 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में जनवरी माह में बारिश की 100% कमी दर्ज की गई है। घने कोहरे और शीतलहर वाले दिनों में दिसंबर-जनवरी में बारिश की भारी कमी के बाद ये साफ है कि जाड़ों का मौसम सूखाग्रस्त ही घोषित होगा। 

विशेषज्ञ बारिश की कमी के पीछे मज़बूत पश्चिमी विक्षोभ की अनुपस्थिति को मुख्य वजह बता रहे हैं। उत्तर भारत में इस सर्दियों में करीब पांच से सात पश्चिमी विक्षोभ असर दिखाते हैं लेकिन इस साल ऐसा एक भी विक्षोभ सक्रिय नहीं है। मौसम विभाग ने पश्चिमी गड़बड़ी के सक्रिय न होने के पीछे एल निनो को भी एक कारण बताया था।   विशेषज्ञों ने इस बार हिमालयी चोटियों पर कम बर्फ के पीछे भी इसे एक वजह बताया है और कहा है कि बर्फ कम होने के कारण पहाड़ अधिक गर्मी अवशोषित करेंगे और इस साल गर्मी का मौसम जल्दी आएगा। उत्तराखंड के जंगलों में सर्दियों में भी आग लग रही है और जनवरी के पहले पखवाड़े में ही कोई 600 फायर अलर्ट जारी किए गए। 

मौसम विभाग के सीनियर साइंटिस्ट नरेश कुमार ने कहा, “सर्दियों में हिमपात का पश्चिमी विक्षोभ से सीधा रिश्ता होता है। दिसंबर से अभी तक कोई सक्रिय पश्चिमी गड़बड़ी नहीं है। कुछ अलग-अलग स्टेशनों को छोड़ दैं तो शीतलहर नहीं दिखी है। आने वाले दिनों में भी कोई पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होता नहीं दिख रहा। हवा की दिशा बदल रही है, उसमें नमी कम है और रफ्तार धीमी है। इस कारण उत्तर-पश्चिम के कई हिस्सों में घना कोहरा दिख रहा है। दिन के तापमान में कमी के कारण गंगा के मैदानी इलाकों में घने कोहरे की चादर है।”

जलवायु आपदा के पीछे ‘इंसानी व्यवहार जनित’ संकट 

रिकॉर्डतोड़ हीटिंग के पीछे रिकॉर्ड उत्सर्जन हैं और उसका मुख्य कारण है जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध उपभोग। धरती इस वक्त अपने क्लाइमेट लक्ष्य को हासिल करने के सबसे असंभव पड़ाव पर दिख रही है। जो एक कारण इस हालात के लिये ज़िम्मेदार है, उसे वैज्ञानिकों ने नाम दिया है ‘इंसानी व्यवहार जनित संकट‘।  सेज जर्नल में प्रकाशित एक शोध कहता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की चर्चा कार्बन उत्सर्जन पर केंद्रित रहती है जबकि उपभोग और खपत, कचरे का भारी ढेर और मानव जनसंख्या में वृद्धि जैसे मूल कारणों को अनदेखा कर दिया जाता है। 

मर्ज संस्थान के वैज्ञानिक जोसफ मर्ज इस शोध के लेखकों में से एक हैं और वह बताते हैं कि असल में समस्या की जड़ में अंधाधुंध उपभोग है और जब तक उसे नियंत्रित नहीं किया जाता तब तक जो भी समाधान बताये जा रहे हैं वह अस्थाई और निष्फल होंगे। आज जनसंख्या और संसाधनों पर दबाव को देखते हुये इंसानी सभ्यता को अभी 1.7 धरती की ज़रूरत है।  धरती की आबादी 1050 में कोवल 250 करोड़ थी और आज यह 800 करोड़ से अधिक है और नागरिकों की जीवनशैली कई गुना अधिक विलासितापूर्ण हो चुकी है। 

जलवायु परिवर्तन से 6 महीने कम हो सकती है आयु 

एक शोध में यह पाया गया है कि क्लाइमेट चेंज के कारण मानव जीवन के 6 महीने कम हो सकते हैं। विशेष रूप से महिलाओं और विकासशील देशों में रह रहे लोगों पर इसका बहुत ज़्यादा असर पड़ता है। PLOS क्लाइमेट नाम के विज्ञान पत्र में प्रकाशित ने 191 देशों में 1940 से 2020 के बीच की अवधि के औसत तापमान, बारिश और जीवन प्रत्याशा के आंकड़ों का अध्ययन किया। 

तापमान और बारिश के अलग-अलग प्रभावों को मापने के साथ-साथ शोधकर्ताओं ने अपने प्रकार का पहला समग्र जलवायु सूचकांक (कम्पोज़िट क्लाइमेट इंडेक्स) विकसित किया जो क्लाइमेट चेंज की व्यापक गंभीरता को मापने के लिये दो चर राशियों को जोड़ता है। परिणाम बताते हैं कि अलग-अलग, एक डिग्री की ग्लोबल तापमान वृद्धि औसत मानव जीवन प्रत्याशा में करीब 0.44 वर्ष यानी लगभग 6 महीने और एक सप्ताह की कमी बताती है।

अटलांटिक के जंगलों में हज़ारों वृक्ष प्रजातियों पर विलुप्ति का संकट 

विज्ञान पत्र साइंस में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक अटलांटिक के जंगलों में जो 4950 वृक्ष प्रजातियां पाई जाती हैं उनमें से दो-तिहाई आबादी पर विलुप्ति का संकट है। ब्राज़ील के दक्षिणी तट पर अटलांटिक महासागर के साथ फैले यह जंगल पिछले कुछ दशकों में कृषि और भवन निर्माण के लिये तेज़ी से कटे हैं और ब्राज़ील के 70 प्रतिशत आबादी इस जंगल के भीतर या बाहरी क्षेत्र में निवास करती है। इन जंगलों में पाई जाने वाली 80% वृक्ष प्रजातियों पर संकट है। शोधकर्ताओं का विश्वास है कि इनमें से कुछ को तो संयुक्त राष्ट्र की आईयूसीएम लिस्ट में ज़रूर जगह मिलेगी ताकि उनके संरक्षण के लिये प्रयास किए जा सकें।

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