जलवायु परिवर्तन की लगाम खींचने में बच्चे न सिर्फ़ सक्रिय, बल्कि सक्षम भी
गर्म होती पृथ्वी पर अपने भविष्य की चिंता और इस जलवायु संकट को रोकने में
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पर्यावरण का ज़िक्र होते ही जो पहली चीज़ दिमाग़ में आती है वो है एक
ख़बर है कि कोल इंडिया उन अंडरग्राउंड खदानों में फिर से काम शुरू कर रहा
भारत के ऊर्जा मंत्री ने ऑयल कंपनियों को सलाह दी है कि देश के सभी
दिल्ली स्थित क्लाइमेट ट्रेंडस और फिनलेंड की एलयूटी यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के शोध में यह
मध्य प्रदेश के सिंगरौली क्षेत्र में दो कोयला बिजली घरों के राखड़ बांध (एश डेम)
उत्तराखंड के चमोली ज़िले में ऑर्किड की वह दुर्लभ प्रजाति पाई गई है जो 124
पर्यावरण संरक्षण पर सलाह देने वाली क्लाइमेट रिस्क हॉराइज़न (CRH) की ताज़ा रिपोर्ट में कहा
जलवायु परिवर्तन से जुड़ी फेक न्यूज़ को अपने प्लेटफार्म पर जगह देने के लिए आलोचनाओं में घिरे फेसबुक ने जलवायु विज्ञान पर एक सूचना केंद्र शुरू कर दिया है। कुछ दिन पहले ही फेसबुक ने फेक न्यूज पर लगाम कसने के लिए तमाम कदम भी उठाए। लेकिन जब फेसबुक द्वारा जलवायु परिवर्तन से संबंधित कुछ गलत जानकारियां पोस्ट कर दी गयीं, तब ही से इस सोशल मीडिया प्लेटफार्म की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे थे और इसकी काफ़ी किरकिरी हुई। इन्हीं सब आरोपों से पल्ला झाड़ने और अपनी गिरती विश्वसनीयता को वापस स्थापित करने के इरादे से संभवतः फेसबुक ने यह फ़ैसला लिया। इस क्रम में अब जलवायु परिवर्तन से संबंधित सही जानकारी अपने यूज़र्स तक पहुंचाने के लिए फेसबुक ने अब जलवायु विज्ञान पर एक सूचना केंद्र शुरू करने का ऐलान किया है। इस फैसले पर प्रकाश डालते हुए फेसबुक के ग्लोबल पॉलिसी के प्रमुख निक क्लेग ने बताया कि फेसबुक न सिर्फ़ नेताओं द्वारा जलवायु परिवर्तन के बारे में किए गए दावों को प्रकाशित करेगा, वो उनके इस दिशा में किए गए कामों को भी यूज़र्स के सामने रखेगा। निक ने कहा कि ऐसा करने में उनका मक़सद है कि आम आदमी को सच्चाई का पता चल सके क्योंकि राजनीतिक भाषणों में अमूमन अतिशयोक्ति होती है। फेसबुक के इस केंद्र को चरणबद्ध तरीके से पहले अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, और ब्रिटेन में शुरू किया जाएगा, उसके बाद दूसरे देशों में इसका विस्तार होगा। लेकिन दूसरे देशों के यूज़र इस केंद्र से जानकारी हासिल कर सकेंगे। फेसबुक द्वारा जारी सन्देश की मानें तो यह जलवायु विज्ञान जानकारी केंद्र फेसबुक पर एक समर्पित स्थान होगा जहां दुनिया भर के बड़े जलवायु संस्थानों से तथ्यपूर्ण संसाधन जुटाए जायेंगे जिन्हें जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए आम जनता अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तमाल कर सकती है। फेसबुक की यह पहल एहम है। ख़ास तौर से इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया के इस बादशाह पर हाल में आरोप लगते रहे हैं कि वो जलवायु परिवर्तन पर झूठे दावों को प्रचारित करने की अनुमति देता है। कोविड से जुड़ी कई भ्रामक जानकारियां भी यहां पोस्ट कर दी गयीं थी और फेसबुक कुछ ठोस तब नहीं कर पाया। फेसबुक के प्रोडक्ट प्रमुख क्रिस कॉक्स ने बताया कि इस केंद्र के लांच होते ही 60 करोड़ लोगों को उसे देखा और इसे एक सफलता का संकेत माना जा सकता है। इस पहल का एक दूसरा पक्ष भी है। दरअसल अमेरिका के अधिकांश पश्चिमी तट पर जंगलों में आग लगी हुई है, और ऐसे हालात में जलवायु का मुद्दा महज़ अकादमिक नहीं रहा। फेसबुक जैसी कम्पनी, जो मौजूदा वक़्त में अपने कंटेंट के ज़रिये मानव सभ्यता की दशा और दिशा तक निर्धारित करने का माद्दा रखती है, उसका जलवायु परिवर्तन को लेकर ऐसे कदम उठाना बेहद ज़रूरी और कारगर भी हैं। फेसबुक ने अपने बयान में कहा है वो अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं। साथ ही, फेसबुक ने यह भी साफ़ किया कि वो न सिर्फ़ अपनी सेकंडरी सप्लाई चेन में ग्रीनहाउस गैसों के एमिशन में 75 फ़ीसद की कमी लाने के लिए प्रयासरत है, बल्कि उसका इरादा है कि वो अगले दस सालों में, मतलब 2030 तक, अपनी पूरी वैल्यू चेन को नेट ज़ीरो एमिशन पर ले आये। नीले फेसबुक के इन फैसलों और इरादों से लगता है कि इस सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने पर्यावरण के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए एक हरी चादर ओढ़ ली है।
ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ 7 साल में 75 फ़ीसद से ज़्यादा गिरेगी प्लास्टिक की माँग