आसमान से बरसती आग! लेकिन संकट से निबटने के लिये क्या है योजना?

Newsletter - June 12, 2019

उबलती धरती: भट्टी की तरह तपते हालात में हौसला दिलाने वाली बात बस इतनी सी है कि सरकार को बरबादी का एहसास हो रहा है। फोटो - Rediff News

बड़ी ख़बर: आसमान से बरसती आग! लेकिन संकट से निबटने के लिये क्या है योजना?

पिछले एक महीने में पूरे देश में प्रचंड गर्मी की मार रही है। कई प्रदेशों में तापमान 45ºC से ऊपर चला गया तो राजस्थान के चुरू में तो 1 जून को तापमान 50.8ºC रहा जो प्रदेश में अब तक का सर्वाधिक तापमान था। 10 जून को दिल्ली में 48 डिग्री तापमान के साथ नया रिकॉर्ड बना।

दुनिया भर में मौसम पर नज़र रखने वाली वेबसाइट एल-डोरेडो के मुताबिक विश्व के 15 सबसे गर्म शहरों में से 11 भारत में हैं। मौसम विभाग ने अपने पूर्वानुमान में कहा था कि देश के अधिकतर हिस्सों में 0.5 डिग्री से 1.0 डिग्री अधिक तापमान रहेगा। सरकार ने भी इस साल फरवरी में संसद में आंकड़े पेश करते हुये कहा था शहरों का तापमान बढ़ रहा है।

अहमदाबाद, नागपुर और भुवनेश्वर जैसे शहरों ने कुछ साल पहले गर्म होती आबोहवा से निपटने के स्थानीय स्तर पर कुछ एक्शन प्लान तैयार किये लेकिन जितने भयावह हालात हैं उनसे लड़ने के लिये ये तैयारियां बहुत कम ही कही जायेंगी।


क्लाइमेट साइंस

तवे से तंदूर में: पिछले 65 साल में यह दूसरी सबसे कम मानसून-पूर्व बारिश है। दिल्ली और चेन्नई में अगले साल ग्राउंड वाटर खत्म होने का अलर्ट है। फोटो - HT

घोर जल संकट: 65 साल में दूसरी सबसे कम मानसून-पूर्व बरसात

पानी के लिये पूरे देश में त्राहि-त्राहि मची हुई है। सेंट्रल वॉटर कमीशन के मुताबिक देश में 21 शहरों के 91 जलाशयों (रिज़रवॉयर) में उनकी कुल क्षमता का 20% से भी कम पानी बचा है। इसकी मुख्य वजह मानसून से पहले की बारिश में कमी है। मौसम विभाग ने मार्च और मई के बीच के जो आंकड़े दिये हैं वह बताते हैं कि 1954 के बाद से इस साल मानसून से पहले की दूसरी सबसे कम बरसात हुई है।

मार्च और मई के बीच केवल 99 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई जो सामान्य से 23% कम है। दक्षिण भारत में 47% और उत्तर-पश्चिमी भारत में 30% कम बरसात हुई है। महाराष्ट्र के विदर्भ में तो मानसून पूर्व बरसात 80% कम हुई है। हालांकि जून से सितंबर के बीच सामान्य बरसात का पूर्वानुमान है लेकिन मानसून के 10 दिन देर से आने की वजह से डर बढ़ गया है। महाराष्ट्र सरकार ने सूखा ग्रस्त इलाकों में क्लाउड सीडिंग के ज़रिये कृत्रिम बरसात कराने के लिये 30 करोड़ का फंड मंज़ूर किया है।

गरमाता उत्तरी ध्रुव कर रहा है मौसमी तबाही

कई सालों की अनुमान के बाद अब वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उत्तरी ध्रुव में बढ़ती गर्मी के कारण ही पूरे उत्तरी गोलार्ध के इलाकों में असामान्य मौसम की घटनायें हो रही हैं। वैज्ञानिकों ने इसके पीछे हवाओं के बदलते मिज़ाज को कारण बताया है जिन्हें “जेट स्ट्रीम” कहा जाता है। नॉर्थ अमेरिका और यूरोप में इस सीधा प्रभाव दिख रहा है।

भारत भी इसके असर से अछूता नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जेट स्ट्रीम्स के कारण यहां “पश्चिमी गड़बड़ी” की घटनायें बढ़ रही हैं। इस साल और पिछले साल मार्च से अप्रैल तक मौसम का जो असामान्य रुख रहा है उसमें जेट स्ट्रीम्स को वजह बताया जा रहा है।

बढ़ते तापमान और एंटीबायोटिक्स से सी-फूड व्यापार को ख़तरा

एक इन्वेस्टमेंट नेटवर्क ने चेतावनी दी है कि धरती के बढ़ते तापमान और एंटीबायोटिक्स के अंधाधुंध इस्तेमाल से सी-फूड व्यापार को बड़ा ख़तरा है। समुद्री जीवों के अलावा व्यापारिक स्तर पर किया जा रहा जलीय जीवों का उत्पादन भी संकट में है। यह शोध फार्म एनिमल इनवेस्टमेंट रिस्क एंड रिटर्न नाम की संस्था ने किया है। आज दुनिया भर में यह कारोबार कुल 23 हज़ार करोड़ अमेरिकी डालर (करीब 16 लाख करोड़ रुपये) का है। रिसर्च कहती है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में ही साल 2050 तक समुद्री मछली पालन में करीब 30% तक गिरावट आ सकती है।


क्लाइमेट नीति

निकम्मेपन की कीमत: सरकारी महकमों का हाल यह है कि वह हर महीने 1 करोड़ रुपये जुर्माना देने को तैयार हैं लेकिन प्लास्टिक के प्रबंधन के लिये तैयार नहीं I फोटो - Yale

कचरा प्रबंधन में फेल: CPCB ने राज्यों पर लगाया जुर्माना

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी CPCB ने देश की 25 राज्य सरकारों पर प्रति माह 1 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना इन राज्यों द्वारा प्लास्टिक वेस्ट के प्रबंधन का कोई एक्शन प्लान न दिये जाने की वजह से लगाया गया है। इस मामले मेंCPCB ने केंद्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) में शिकायत की थी जिसके बाद यह जुर्माना लगाया गया।

देश में सालाना 1.6 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक इस्तेमाल होता है लेकिन 80%कचरा यूं ही फैला रहता है। संयुक्त राष्ट्र (UNFCCC) में जमा की गई रिपोर्ट में भारत ने कहा है कि साल 2000 से 2010 के बीच देश में ठोस कचरे की वजह होने वाला ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन सालाना 3.1% बढ़ा है।

NGT ने आंध्र सरकार के रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट पर लगाई रोक

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने आंध्र प्रदेश सरकार की गोदावरी, कृष्णा और पन्ना नदियों को जोड़ने की योजना पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह रोक पर्यावरण संबंधी अनुमति न मिलने की वजह से लगाई है। NGT ने पर्यावरण मंत्रालय से एक महीने के भीतर रिपोर्ट जमा करने को कहा है।

जानकारों ने चेतावनी दी है कि रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट से कृषि के इस्तेमाल होने वाला पानी उद्योगों के लिये खर्च किया जायेगा। इससे खाद्य सुरक्षा को ख़तरा है। विशेषज्ञ याद दिला रहे हैं कि देश में 50% से अधिक कृषि भूमि अभी भी सिंचाई के लिये मॉनसून पर ही निर्भर है इसलिये सरकार जल संकट की दुहाई देकर नदियों को जोड़ने के प्रोजक्ट को सही नहीं ठहरा सकती।

कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण: 80 देश बढ़ायेंगें अपने घोषित लक्ष्य

संयुक्त राष्ट्र को उम्मीद है कि सितंबर में हो रहे न्यूयॉर्क सम्मेलन में करीब 80 देश कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण के लिये अपने घोषित लक्ष्य को और बढ़ाने का ऐलान करेंगे। करीब 200 देशों ने 2015 में हुये पेरिस सम्मेलन के तहत जलवायु परिवर्तन पर काबू करने के लिये कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिये साफ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने और जंगलों को लगाने का वादा किया है।

चिली – जो कि दिसम्बर में होने वाले महासम्मेलन का मेजबान है – ने घोषणा की है कि वह 2040 तक कोयला बिजलीघरों को पूरी तरह बन्द कर देगा तो दक्षिण कोरिया ने 2040 तक साफ ऊर्जा उत्पादन को 35% बढ़ाने का वादा किया है। कड़वी सच्चाई यह है कि अगर धरती को ग्लोबल हीटिंग से बचाना है तो सभी देशों को अपने घोषित लक्ष्य कई गुना बढ़ाने होंगे लेकिन अभी तो देश पेरिस सम्मेलन के वादों से ही बहुत दूर है।

ब्राज़ीली राष्ट्रपति बोल्सनेरो: अमेज़न वर्षा वनों का दुश्मन

उपग्रह से मिली तस्वीरों से स्पष्ट हो गया है कि क्लाइमेट चेंज को हौव्वा कहने वाले ब्राज़ीली राष्ट्रपति जेर बोल्सनेरो के राज में पर्यावरण पर सबसे अधिक चोट हुई है। पिछले एक दशक पर नज़र डालें तो अमेज़न रेन फॉरेस्ट में सबसे अधिक जंगल इस साल मई के महीने में कटे और कुल 739 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का सफाया हो गया। समाचार एजेंसी राइटर के मुताबिक राष्ट्रपति द्वारा पर्यावरण नियमों में ढील के बाद अवैध टिंबर माफिया के हौसले काफी बढ़ गये हैं। बोल्सनेरो ने वन कमीशन को कृषि मंत्रालय के अधीन कर दिया है जिससे वन कटान की वकालत करने वाले कृषि से जुड़े उद्योगपतियों की खूब चल रही है।


वायु प्रदुषण

अब तक 84: एक तो नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) बहुत फिसड्डी है और उस पर भी 102 में 18 राज्य अब तक इसका कोई खाका केंद्र को जमा नहीं कर पाये हैं। फोटो - IndiaTimes

देश के 84 शहरों ने जमा किया वायु प्रदूषण से निबटने का खाका

देश के 102 शहरों को 2024 तक वायु प्रदूषण के स्तर में 20%-30% कमी करनी है और इनमें से 84 शहरों ने केंद्र सरकार को अपनी योजना का खाका दे दिया है। केंद्र सरकार के इस साल घोषित किये गये नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत ये कदम उठाये जाने हैं हालांकि जानकार NCAP को बहुत ही ढुलमुल और शक्तिहीन कार्यक्रम बता रहे हैं क्योंकि भारतीय शहरों के प्रदूषण के स्तर को देखते हुये 20%-30% की कटौती बहुत कम है। इसके अलावा NCAP में अथॉरिटीज़ के पास किसी तरह की कानूनी ताकत नहीं है जो कि प्रदूषण करने वाले को दंडित कर सके। 

क्या प्रदूषण फैलाने वाले बिजलीघरों से हर्जाना वसूला जायेगा?

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने यूपी-एमपी सीमा पर बसे सिंगरौली और सोनभद्र ज़िलों के पावर प्लांट्स से हो रहे प्रदूषण पर एक समिति का गठन किया है। इस कमेटी में पर्यावरण मंत्रालय के अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अलावा यूपी और एमपी के प्रदूषण बोर्डों के अधिकारी होंगे। कोर्ट “प्रदूषण करने वाला जुर्माना अदा करे” नियम के तहत यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि वहां हुये नुकसान की भरपाई के लिये क्या किया जा सकता है। सिंगरौली-सोनभद्र में दर्जनों पावर प्लांट्स की वजह से दोनों राज्यों में काफी वायु और जल प्रदूषण हो चुका है।

एक दूसरे मामले में कोर्ट ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से नरेला और बवाना इलाके में प्रदूषण फैला रही प्लास्टिक यूनिटों पर कार्रवाई रिपोर्ट जमा करने को कहा है। इन यूनिटों पर औद्योगिक कूड़ा फैलाने और जलाने का आरोप है। 

अधिक वायु प्रदूषण से पैदायशी विकार और मौत का ख़तरा

अमेरिका की टेक्सस स्थित A&M यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में पता चला है कि हवा में मौजूद महीन हानिकारक कणों (PM 2.5) की अधिकता से जन्मजात विकार (डिफेक्ट) हो सकते हैं। मादा चूहों पर प्रदूषित हवा के प्रभावों का अध्ययन किया गया जिससे पता चला कि गर्भवती मां और उसके बच्चे पर प्रदूषण का प्राणघातक असर होता है। भारत और चीन में जाड़ों के दिनों में तो यह प्रभाव खासतौर से अधिक है।
उधर दिल्ली स्थित CSE की रिपोर्ट में पता चला है कि हर साल वायु प्रदूषण की वजह से 5 साल से कम उम्र के 1 लाख बच्चों की मौत हो रही है।


रिन्यूएबिल

रफ्तार पर ब्रेक: आयात शुल्क और कम बिक्री दरों ने निवेशकों की दिलचस्पी घटाई है लेकिन सरकार कहती है सौर ऊर्जा मिशन में तय लक्ष्य हासिल कर लिये जायेंगे। फोटो - IndiaTimes

सौर ऊर्जा की मुहिम को लगा झटका, फिर भी सरकार ने कहा – हौसले हैं बुलंद

इस साल के पहले क्वार्टर में (Q-1, 2019) में पिछले साल की पहली तिमाही (Q-1, 2018) के मुकाबले 49% कम क्षमता के सोलर पैनल लगे हैं। हालांकि पिछले साल की आखिरी तिमाही (Q-4, 2018) के मुकाबले 4% की मामूली बढ़ोतरी हुई। इस साल की शुरुआत में करीब 800 मेगावॉट की नीलामी रद्द करनी पड़ी क्योंकि कंपनियों को बिजली खरीद की सस्ती दरें मंज़ूर नहीं थी।

रूफटॉप सोलर में भी 33% की गिरावट दर्ज की गई है। भारत ने 2022 तक कुल 40 GW रूफ टॉप सोलर लगाने की बात कही है जिसमें अभी तक केवल 9 GW ही लग पाया है। हालांकि ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने कहा है कि भारत ने साल 2022 तक 175 GW साफ ऊर्जा के संयंत्र लगाने का जो वादा किया है वह पूरा कर लिया जायेगा।

सौर ऊर्जा: कीमत गिरने का सिलसिला जारी

इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (IRENA) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि सोलर पावर लगातार सस्ती हो रही है और कोयला बिजलीघरों को टक्कर दे रही है। साल 2018 के हालात पर प्रकाशित रिपोर्ट कहती है कि साफ ऊर्जा के सभी संयंत्रों से मिलने वाली बिजली की कीमत गिरी है। पिछले साल जहां विश्व भर में सौर ऊर्जा की कीमत में 26 प्रतिशत की गिरावट आई वहीं बायोएनर्जी 14% सस्ती हुई। इसी तरह सोलर फोटो वोल्टिक (PV) और पवन ऊर्जा में 13% और हाइड्रोपावर की कीमत में 12% की कमी आई।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सोलर (पैनल या प्लांट) को लगाने की कीमत में 2010 और 2018 के बीच 80% प्रतिशत गिरावट आई। धीरे धीरे उद्योग जगत में इसका असर दिख रहा है। पिछले हफ्ते भारत में सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति ने ऐलान किया कि वह इसी वित्तीय वर्ष में अपने प्लांट्स में सोलर एनर्जी का इस्तेमाल शुरू कर देगी।

महाराष्ट्र: सरकार सूखा पीड़ित किसानों को देगी सोलर पम्प, CSE ने कहा – नीति है नाकाम

महाराष्ट्र सरकार सूखा पीड़ित विदर्भ में 3900 किसानों को सोलर पम्प देगी। इसके लिये करीब 40 हज़ार किसानों ने मांग की थी। सरकार 3 HP क्षमता का ये पम्प 16,560 रुपये में दे रही है। जबकि उसकी असल कीमत इसकी 10 गुना है। मुख्यमंत्री सौर कृषि पम्प योजना के तहत महाराष्ट्र सरकार ये सुविधा एक लाख किसानों तक चरणबद्ध तरीके से पहुंचाना चाहती है।

उधर दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरेंमेंट ने एक सर्वे के आधार पर कहा है कि पम्प योजना नाकाम रही है। पानी के लगातार गिरते स्तर की वजह से पम्प का समुचित इस्तेमाल नहीं हो पाया और सिंचाई के घंटे भी कम हुये हैं।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

बचायेगी बैटरी: अब भारत में भी डिलीवरी कंपनियां बैटरी वाहनों का इस्तेमाल बढ़ायेंगी जैसे लंदन में इस बैटरी डिलीवरी वैन को ट्रायल के तौर पर उतारा गया। फोटो - London.gov.uk

भारत में ओला, ऊबर को 40% बैटरी चालित वाहन लाने होंगे

टैक्सी ऑपरेटर्स ओला और ऊबर जैसी कंपनियों को अपनी 40% गाड़ियों को 2026 तक बैटरी चालित करना पड़ सकता है। समाचार एजेंसी रायटर ने सूत्रों के हवाले से ख़बर दी है कि सरकार ओला, ऊबर से कहेगी कि 2021 तक वह अपनी 2.5% गाड़ियों को बैटरी वाहनों में तब्दील करें।

इसके बाद हर साल कंपनियों को बैटरी वाहनों की संख्या में बढ़ोतरी करते हुये 2026 कर 40% बैटरी वाहनों का लक्ष्य हासिल करना होगा। भारत ने साल 2020 तक सड़कों पर कुल 1.5 करोड़ बैटरी वाहनों को उतारने का लक्ष्य रखा था लेकिन अभी वह इस लक्ष्य का 2% (2.8 लाख वाहन) भी हासिल नहीं कर पाया है।

दिल्ली सरकार देगी बैटरी डिलीवर वाहनों को बढ़ावा, केंद्र ने राज्यों से बैटरी बसों के लिये मांगे प्रस्ताव

आपके घर में खाने पीने की चीज़ों से लेकर रोज़मर्रा के सामान की डिलीवरी करने वाली कंपनियों को दिल्ली सरकार बैटरी वाहनों के इस्तेमाल के लिये उत्साहित करेगी। राजधानी में वायु प्रदूषण कम करने के लिये दिल्ली सरकार बैटरी वाहन नीति के तहत जमेटो, स्विगी, फ्लिपकार्ट और अमेज़न जैसी कंपनियों को अपने डिलीवरी वाहन बैटरी चालित करने के बदले इन्सेन्टिव देगी।

उधर भारी उद्योग मंत्रालय ने राज्य सरकारों से बैटरी-बसों के लिये प्रस्ताव (एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट – EoI) जमा करने को कहा है। सरकार बैटरी वाहनों को बढ़ावा देने के लिये चल रही फेम – II योजना के तहत 5000 बैटरी बसों को उतारने की सोच रही है जिसके लिये सरकार ने करीब 35 करोड़ रुपये का बजट रखा है।

चीन ने बैटरी वाहनों के लाइसेंस प्लेट पर सीमा हटाई

चीन ने बैटरी वाहनों की बिक्री को और बढ़ाने के लिये लाइसेंस प्लेट कोटा को खत्म कर दिया है। परम्परागत कारों की बिक्री पर नियंत्रण के लिये कोटा अभी बना रहेगा। पिछले महीने चीन ने बैटरी वाहनों की सब्सिडी में 60% कटौती कर दी थी। चीन में बैटरी वाहन अब ऑटोमोबाइल उद्योग का प्रमुख हिस्सा हैं और पिछले साल जहां भारत ने कुल 3600 बैटरी वाहन रजिस्टर हुये वहीं चीन में यह आंकड़ा 60,000 रहा।


जीवाश्म ईंधन

थोड़ी राहत: रिज़र्व बैंक ने पावर प्लांट के लिये कर्ज़ को अदा करने की राह थोड़ा आसान की है लेकिन पावर कंपनियों का संकट बहुत गहरा है। फोटो - Financial Tribune

कर्ज़ में डूबी कंपनियों के लिये रिज़र्व बैंक ने बदले नियम

रिज़र्व बैंक के नये नियमों के तहत अब डिफॉल्टर कंपनियों को अपने ऋण को चुकता करने के प्रक्रिया दोबारा शुरु करने से पहले 30 दिन का वक़्त मिलेगा। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व बैंक के उस सर्कुलर को निरस्त कर दिया था जिसमें कर्ज़ चुकाने में एक दिन की देरी होने पर भी कर्ज़दार को पूरे लोन का भुगतान करने के लिये कार्रवाई शुरू करनी थी। लगातार हो रहे नुकसान की वजह से 40 GW तक के कोयला और गैस पावर प्लांट को इससे राहत मिलेगी।

उज्ज्वला स्कीम के तहत अब 5 किलो का सिलेंडर

उज्ज्वला योजना के तहत सरकार अब गरीब परिवारों को 5 किलो का सिलेंडर देगी ताकि उसे भरवाना जेब पर अधिक भारी न पड़े। एनडीए – I सरकार के वक़्त उज्ज्वला योजना शुरू की गई जिसमें लकड़ी का इस्तेमाल खत्म करने के लिये बीपीएल परिवारों को गैस और चूल्हा दिया गया लेकिन कई जगह देखा गया कि लोग खाली सिलेंडर को भरवा नहीं पा रहे थे। जहां 14.2 किलो का सिलेंडर 500 रुपये में भरता वहीं 5 किलो का सिलेंडर ग्राहक करीब 180 रुपये में भरवा पायेंगे।

उज्जवला योजना के तहत सरकार ने अपने कार्यकाल को पहले 100 दिनों में 8 करोड़ नये कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा है। 3 जून तक उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 1.29 करोड़ और बिहार में 78 लाख कनेक्शन दिये जा चुके थे।

जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी दुनिया को तबाह कर रही है: संयुक्त राष्ट्र महासचिव

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुट्रिस ने दुनिया भर के देशों से कहा है कि प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन पर सब्सिडी देने से बुरा कुछ नहीं है। उन्होंने ऑस्ट्रिया में राजनेताओं और उद्योगपतियों के सम्मेलन में कहा कि तेल, गैस और कोयले जैसे ईंधन पर सब्सिडी देकर उसे बढ़ावा देना “दुनिया की तबाही में मदद” करने जैसा है और जनता के पैसे का इससे बड़ा दुरुपयोग नहीं हो सकता।

जीवाश्म ईंधन जलवायु परिवर्तन के ख़तरे को और बढ़ा रहे हैं। फिर भी 2017 में प्रदूषक ईंधन पर कुल 5,20,000 करोड़ डॉलर यानी करीब 364 लाख करोड़ रुपये आंकी गई।