‘जलवायु संवेदनशील’ होने की मान्यता प्राप्त करने लिए देशों में लगी होड़

Editorial Team30 मार्च. 2023
कुछ समुदायों पर जलवायु परिवर्तन का जोखिम केवल भौतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक कारकों से भी अधिक होता है।

कुछ समुदायों पर जलवायु परिवर्तन का जोखिम केवल भौतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक कारकों से भी अधिक होता है।


अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और लघु द्वीपीय देशों सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने पिछले हफ्ते जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की नवीनतम रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील के रूप में परिभाषित किए जाने के लिए कड़ा संघर्ष किया

आईआईएसडी की रिपोर्ट के अनुसार जहां मेक्सिको और चिली लैटिन अमेरिका को ‘विशेष रूप से संवेदनशील’ क्षेत्रों की सूची में शामिल करांना चाहते थे, जबकि भारत एशिया को शामिल करने पर ज़ोर दे रहा था।

अंततः अफ्रीका, लघु द्वीपीय देशों, सबसे कम विकसित देश (एलडीसी), मध्य और दक्षिण अमेरिका, एशिया और आर्कटिक को विशेष रूप से संवेदनशील के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

कुछ समुदायों पर जलवायु परिवर्तन का जोखिम अधिक होने की वजह केवल समुद्र-स्तर में वृद्धि जैसे भौतिक कारक ही नहीं हैं, बल्कि गरीबी, गवर्नेंस, बिल्डिंग मानक और बुनियादी ढांचे जैसे सामाजिक कारक भी हैं।

इसलिए यह वर्गीकरण राजनैतिक रूप से भी संवेदनशील विषय है। लेकिन इस वर्गीकरण से विभिन्न क्षेत्रों पर मंडरा रहे खतरे को वैश्विक मान्यता मिलने के साथ-साथ, जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) तक पहुंच भी बेहतर होती है।

तापमान वृद्धि के 1.5 डिग्री लक्ष्य की प्राप्ति के लिए त्वरित प्रयास जरूरी: आईपीसीसी

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए इस दशक में तत्काल और कड़े कदम उठाने होंगे।  

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस लक्ष्य को पाने के लिए सभी क्षेत्रों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में त्वरित, लगातार और भारी कटौती की आवश्यकता है। यदि कार्रवाई में देरी होती है, तो हानि और क्षति बढ़ती जाएगी।

रिपोर्ट ने जीवाश्म ईंधन के अंधाधुंध और लगातार बढ़ते प्रयोग को ग्लोबल वार्मिंग का एक बहुत बड़ा कारण बताया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने अमीर देशों से आग्रह किया है कि वह 2040 तक और विकासशील देश 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन पर पहुंचने का प्रयास करें।

आईपीसीसी ने कहा कि उत्सर्जन अब तक कम होना शुरू हो जाना चाहिए, और 2030 तक इसे लगभग आधा करना होगा। संयुक्त राष्ट्र पैनल ने यह भी कहा कि 2019 के स्तरों के मुकाबले 2035 तक उत्सर्जन में 60 प्रतिशत की कटौती होनी चाहिए।

हाथियों और बाघों के हमलों में हुईं 3 सालों में 1,788 मौतें

भारत में पिछले तीन वर्षों में हाथियों और बाघों के हमलों में कम से कम 1,788 लोग मारे गए हैं। इनमें से 1,581 लोग हाथियों द्वारा और 207 बाघों द्वारा मारे गए। वर्ष 2019-20 से 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार, हाथियों के हमलों में सबसे अधिक 291 मौतें झारखंड में हुईं। वहीं 2020 से 2022 तक बाघों के हमलों में सबसे ज्यादा 141 लोगों की मौतें महाराष्ट्र में दर्ज की गईं।

हाथियों के हमले बढ़ने का प्रमुख कारण है उनके हैबिटैट का सिकुड़ना और विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक वन क्षेत्रों की संरक्षण नहीं किया जाता और माइग्रेशन कॉरिडोर्स को बहाल नहीं किया जाता है, तब तक ऐसे संघर्ष बढ़ते रहेंगे।

हाथियों के हैबिटैट कृषि और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं द्वारा लगातार नष्ट किए जा रहे हैं। लगभग 40 प्रतिशत रिज़र्व असुरक्षित हैं, क्योंकि वे संरक्षित पार्कों और अभयारण्यों के भीतर नहीं हैं। साथ ही, हाथियों के प्रवास के लिए माइग्रेशन कॉरिडोर को कोई विशिष्ट कानूनी सुरक्षा प्राप्त नहीं है।

देश भर में हाथियों के हमलों में मरने वालों की संख्या 2019-20 में 584, 2020-21 में 461 और 2021-22 में 535 थी।

बाघों की वजह से होने वाली मानव मौतों के मामलों में भी पिछले तीन वर्षों में लगातार वृद्धि देखी गई; 2020 में 44, 2021 में 57 और 2022 में 106 मामले दर्ज किए गए।

गौरतलब है कि बाघों के हमलों में भी होने वाली सभी मौतें अभयारण्यों में हुईं, जो दर्शाता है कि इसके लिए मानव अतिक्रमण अधिक जिम्मेदार है। 

कूनो पार्क में नामीबियाई चीते ने दिया जन्म, एक अन्य चीते की मौत

पिछले साल सितंबर में मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में स्थानांतरित किए गए आठ नामिबियाई चीतों में से एक ने मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चार शावकों को जन्म दिया है

वहीं एक अन्य मादा नामीबियाई चीते साशा की मौत हो गई है। शावकों के जन्म की जानकारी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने ट्विटर पर साझा की। 

इससे पहले पांच वर्षीया मादा चीता साशा की मौत से ‘प्रोजेक्ट चीता’ को बड़ा झटका लगा था। मध्य प्रदेश वन विभाग ने एक बयान में कहा कि साशा को पिछले साल ही किडनी में संक्रमण हो चुका था, जब वह नामीबिया में कैद में थी।

पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों ने पहले बताया था कि साशा को सभी चीतों से अलग रखा गया था और उसका इलाज किया जा रहा था लेकिन “उसके बचने की संभावना बहुत कम थी”।

कूनो नेशनल पार्क की ओर से कहा गया कि 22 मार्च को साशा को मॉनिटरिंग टीम ने सुस्त पाया। जांच में पता चला कि उसे इलाज की जरूरत है, जिसके बाद उसे अलग बाड़े में लाया गया।

उसके ब्लड सैंपल की जांच से पता चला कि उसके गुर्दों में संक्रमण है, जो उसे भारत लाने से पहले से ही हुआ था। इलाज के दौरान साशा की मौत हो गई।

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