भारत के सभी फॉरेस्ट क्षेत्रों में जमा कार्बन बढ़ने की संभावना: शोध

भारत के जंगलों में जमा कार्बन आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है, लेकिन यह बढ़ोतरी सभी क्षेत्रों में समान नहीं होगी। एक अध्ययन के अनुसार, सबसे ज्यादा बढ़ोतरी रेगिस्तानी और कम वर्षा वाले इलाकों में हो सकती है। इसके बाद ट्रांस-हिमालय, गंगा के मैदानी क्षेत्र और दक्कन क्षेत्र का स्थान है। पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में भी वृद्धि होगी, लेकिन कम।

गौरतलब है कि जंगल ‘कार्बन सिंक’ होते हैं, यानी वे हवा से कार्बन डाइऑक्साइड हटाकर उसे तनों, पत्तियों और जड़ों में जमा करते हैं। अध्ययन में पाया गया कि साल 2100 तक यह भंडारण 35% से 97% तक बढ़ सकता है। लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि ज्यादा गर्मी, सूखा और आग जैसे खतरे भी बढ़ेंगे।

दो भारतीय संरक्षणविदों को मिला ‘ग्रीन ऑस्कर’ सम्मान

भारत की दो संरक्षणविदों – बरखा सुब्बा और परवीन शेख – को 2026 का प्रतिष्ठित व्हिटली अवॉर्ड प्रदान किया गया है। यह सम्मान वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए दिया जाता है।

बरखा सुब्बा को दार्जिलिंग क्षेत्र में दुर्लभ हिमालयन सैलामैंडर के आवास संरक्षण के लिए सम्मानित किया गया, जहां वे इसके प्रजनन स्थलों की रक्षा और पुनर्स्थापन पर काम कर रही हैं। वहीं, परवीन शेख को चंबल नदी में संकटग्रस्त भारतीय स्किमर पक्षी के घोंसलों की सामुदायिक भागीदारी से सुरक्षा के प्रयासों के लिए यह पुरस्कार मिला।

व्हिटली अवॉर्ड, जिसे ‘ग्रीन ऑस्कर’ भी कहा जाता है, वैश्विक दक्षिण के जमीनी स्तर पर काम करने वाले संरक्षणकर्ताओं को सम्मानित करता है। यह सम्मान न केवल अंतरराष्ट्रीय पहचान देता है, बल्कि जैव विविधता संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान करता है।

राज्यों ने की वन संरक्षण कानून में घासभूमि को शामिल करने की मांग

देश के कई राज्यों ने केंद्र सरकार से वन संरक्षण कानून में बदलाव की मांग की है। इन राज्यों में कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं। उनका कहना है कि घासभूमि (जहां पेड़ों की बजाय घास होती है) को भी संरक्षण मिलना चाहिए। अभी ‘क्षतिपूरक वनीकरण’ का नियम है, जिसमें जंगल कटने पर कहीं और पेड़ लगाए जाते हैं। लेकिन कई बार इसी कारण से घासभूमि में पेड़ लगा दिए जाते हैं, जिससे वहां का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।

राज्यों का कहना है कि कानून में संशोधन कर घासभूमि बहाली को भी इसमें शामिल किया जाए। अभी कई घासभूमि इलाकों को सरकारी रिकॉर्ड में गलत तरीके से बंजर जमीन दिखाया जाता है, जिससे उनका महत्व कम आंका जाता है।

कोलंबिया सम्मेलन में जीवाश्म ईंधन ट्रांज़िशन पर हुई चर्चा 

कोलंबिया के सैंटा मार्टा शहर में 60 से ज्यादा देशों ने जीवाश्म ईंधन छोड़ने पर चर्चा की। 18 देशों ने एक कानूनी समझौते की मांग की, जिससे इन ईंधनों का उपयोग कम किया जा सके। सम्मेलन में यह साफ हुआ कि अब सवाल ‘क्यों छोड़ें’ नहीं, बल्कि ‘कैसे छोड़ें’ है

सबसे बड़ी समस्या पैसे की है। कई गरीब देशों के पास स्वच्छ ऊर्जा (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) अपनाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। वे कर्ज में डूबे हैं और मजबूरी में तेल-गैस प्रोजेक्ट बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि इस बदलाव के लिए वैश्विक सहयोग, फंड और कर्ज राहत जरूरी है। हालांकि कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ, लेकिन आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति बनी।

दिल्ली के सेंट्रल रिज में ‘थीम पार्क’ योजना पर विवाद

दिल्ली के सेंट्रल रिज क्षेत्र में ‘थीम-आधारित स्पेशल फॉरेस्ट’ विकसित करने की योजना के तहत वन विभाग द्वारा जारी टेंडर पर विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने गंभीर आपत्ति जताई है। टेंडर में दीमकों छुटकारा पाने के लिए प्रतिबंधित कीटनाशक लिंडेन के उपयोग का उल्लेख किया गया है, जो विवाद का बड़ा कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि दीमक जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करते हैं।

हालांकि वन विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि लिंडेन का उल्लेख टेंडर में गलती से हुआ है, और इसकी जगह सीमित मात्रा में क्लोरपाइरीफॉस के नियंत्रित उपयोग किया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञ इसे भी खतरनाक मान रहे हैं।

पर्यावरण के जानकारों ने स्पेशल फॉरेस्ट की योजना पर भी चेतावनी दी है और कहा है कि थीम-आधारित वनरोपण से सेंट्रल रिज की इकोलॉजी को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा कीटनाशकों के उपयोग से पशु-पक्षियों और मानव जीवन को भी खतरा हो सकता है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि सेंट्रल रिज एक प्राकृतिक वन है, इसलिए कृत्रिम वनरोपण की जगह इसे प्राकृतिक रूप से बहाल किया जाना चाहिए।

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