मध्य और प्रायद्वीपीय भारत में लू का कहर, छत्तीसगढ़ में तापमान 40°C के पार

मध्य और प्रायद्वीपीय भारत इस समय भीषण लू की चपेट में हैं। मध्य भारत के छत्तीसगढ़ में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। राजनांदगांव जिले में 40.5°C दर्ज किया गया, जो उस समय देश के मैदानी इलाकों में दर्ज सबसे अधिक तापमानों में से एक है और महाराष्ट्र के वाशिम के बराबर है।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी तापमान 40 डिग्री के करीब पहुंच गया है। हंस इंडिया के मुताबिक, हैदराबाद में तापमान 38°C दर्ज किया गया। वहीं, यूवी इंडेक्स 10 तक पहुंच गया है, जिसे ‘अत्यंत खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया है, जिससे त्वचा संबंधी स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर चिंता बढ़ गई है।

तेलंगाना के उत्तरी जिलों — अदीलाबाद, निजामाबाद और करीमनगर — में हालात और गंभीर होने की आशंका है, जहां तापमान 40°C से ऊपर जाने की संभावना है। आंध्र प्रदेश में भी गर्मी का असर तेज हो गया है। विजयवाड़ा में अधिकतम तापमान 38°C तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि रायलसीमा क्षेत्र में गर्मी विशेष रूप से तीव्र रहने की संभावना है।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने तमिलनाडु में लू चलने की संभावना जताई है। वहीं केरल में भी तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, पुनलूर में अधिकतम तापमान 38.4°C और कोट्टायम में 37.8°C दर्ज किया गया, जो इस समय के सामान्य स्तर से लगभग 3 डिग्री अधिक है।

दक्षिण-पश्चिम अमेरिका में ‘अत्यधिक दुर्लभ’ हीटवेव, जलवायु संकट के बिना यह ‘लगभग असंभव’

दक्षिण-पश्चिम अमेरिका में ‘ऐसे समय में जब सर्दी होनी चाहिए’, रिकॉर्ड तोड़ गर्मी दर्ज की गई। स्क्रिप्स न्यूज़  के मुताबिक इस क्षेत्र में लगभग 2 करोड़ लोग ‘अत्यधिक गर्मी की चेतावनी’ के दायरे में हैं, जबकि अन्य 2 करोड़ लोगों को हीटवेव से संबंधित एडवाइजरी दी गई है। एरिज़ोना के फीनिक्स में तापमान 40.5°C तक पहुंच गया, जो मार्च के पिछले रिकॉर्ड से लगभग 5°C अधिक है। लास वेगास और लॉस एंजिल्स के आंतरिक क्षेत्रों में भी रिकॉर्ड स्तर की गर्मी दर्ज की गई।

शोधकर्ताओं ने कहा कि अमेरिका के पश्चिमी हिस्से में यह भीषण हीटवेव जलवायु संकट के बिना ‘लगभग असंभव’ है। द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, जीवाश्म ईंधनों के जलने से उत्पन्न जलवायु संकट ने पिछले एक दशक में इस तरह की हीटवेव की संभावना चार गुना बढ़ा दी है।

विश्लेषण के सह-लेखक बेन क्लार्क ने कहा, “मार्च के लिए ये तापमान पूरी तरह असामान्य हैं।” वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन के विश्लेषण के अनुसार, हाल ही में 2016 तक भी ऐसी हीटवेव कम तीव्र होती, जिसमें तापमान लगभग 1.4°F (0.8°C) कम होता।

सह-लेखक फ्रेडरिके ओटो ने कहा, “ये निष्कर्ष किसी भी संदेह की गुंजाइश नहीं छोड़ते। जलवायु परिवर्तन मौसम को उन चरम स्थितियों की ओर धकेल रहा है, जो औद्योगिक-पूर्व दुनिया में अकल्पनीय थीं।”

हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की दर 2000 के बाद दोगुनी: आईसीआईएमओडी रिपोर्ट

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर वर्ष 2000 के बाद दोगुनी हो गई है, जिससे अरबों लोगों के लिए विनाशकारी बाढ़ और दीर्घकालिक जल संकट का खतरा बढ़ गया है। 

‘चेंजिंग डायनामिक्स ऑफ़ ग्लेशियर्स इन द हिंदुकुश हिमालयन रीजन फ्रॉम 1990 टू 2020’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में क्षेत्र के 63,761 ग्लेशियरों का मानचित्रण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ये ग्लेशियर एशिया की कम से कम दस प्रमुख नदी प्रणालियों का स्रोत हैं, जो अरबों लोगों की खाद्य, जल, ऊर्जा और आजीविका सुरक्षा को सहारा देते हैं।

समुद्र तल से 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित लगभग 78% ग्लेशियर क्षेत्र ‘ऊंचाई-निर्भर ताप वृद्धि’ (एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग) के प्रभाव में है, जिसमें ऊंचे क्षेत्रों में तापमान निम्न क्षेत्रों की तुलना में तेजी से बढ़ता है।

इन निष्कर्षों के पीछे हाल के वर्षों में दिखे गंभीर प्रभाव भी हैं। 2021 में उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में चमोली आपदा, जिसमें एक ग्लेशियर खंड के टूटने से 200 से अधिक लोगों की मौत हुई; अक्टूबर 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ), जिससे 50 से अधिक लोगों की जान गई; और 5 अगस्त को उत्तराखंड के धाराली में हुई आपदा, जहां ग्लेशियर-आधारित खीर गंगा ने पूरा बाजार बहा दिया — ये सभी हालिया घटनाएं ग्लेशियरों से जुड़े बढ़ते खतरे को दर्शाती हैं।

महासागरों का बढ़ता तापमान जमीन पर हीटवेव बढ़ा रहा है: अध्ययन

महासागरों के बढ़ते तापमान का असर अब जमीन पर पड़ने वाली लू पर साफ दिखाई दे रहा है। डाउन टू अर्थ (DTE) की रिपोर्ट के अनुसार, कई एजेंसियों के संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि वैश्विक स्तर पर जमीन पर पड़ने वाली हीटवेव में 50-64% तक की वृद्धि के लिए समुद्री तापमान में बढ़ोतरी जिम्मेदार है।

शोधकर्ताओं ने 1982 से 2023 के बीच के जलवायु आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बताया कि आर्द्र (ह्यूमिड) हीटवेव की तीव्रता में वृद्धि तटीय समुद्री तापमान बढ़ने से गहराई से जुड़ी हुई है। यह निष्कर्ष ‘लार्ज-स्केल एग्रीगेशन ऑफ़ ह्यूमिड हीटवेव्स एक्सासरबेटेड बाय कोस्टल ओशनिक वार्मिंग ‘ शीर्षक वाली रिपोर्ट में सामने आया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, गर्म होती दुनिया में हीटवेव अब एक स्थायी घटना बनती जा रही है, जिससे गर्मी से होने वाली मौतों का खतरा बढ़ रहा है। इस खतरे को ‘वेट बल्ब तापमान’ (Wet Bulb Temperature) से मापा जाता है, जिसकी सीमा लगभग 31.5°C मानी जाती है। इसके ऊपर शरीर का पसीना प्रभावी ढंग से ठंडक नहीं दे पाता, जिससे हीट स्ट्रोक का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।

विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि तटीय समुद्रों का गर्म होना और आर्द्र हीटवेव का तेज होना खासतौर पर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अध्ययन के अनुसार, हिंद महासागर का बढ़ता तापमान दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में व्यापक हीटवेव को ट्रिगर करता है। इसी तरह 2023 में उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में समुद्री सतह के रिकॉर्ड तापमान ने दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में भीषण हीटवेव को जन्म दिया।

धरती की तापमान वृद्धि 2°C होने पर खाद्य संकट झेलने वाले देशों की संख्या हो सकती है तिगुनी: विश्लेषण

वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर गंभीर खाद्य असुरक्षा से जूझने वाले देशों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़कर 24 तक पहुंच सकती है। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, यह खुलासा एक नए अध्ययन में हुआ है।

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) के विश्लेषण के मुताबिक, वैश्विक तापमान बढ़ने से दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ेगा, लेकिन निम्न-आय वाले देशों में खाद्य प्रणालियां अमीर देशों की तुलना में सात गुना तेजी से बिगड़ेंगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संकट को कम करने के लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना, जलवायु-सहिष्णु कृषि में निवेश बढ़ाना और जल व मिट्टी प्रबंधन में सुधार करना जरूरी है, ताकि जलवायु झटकों का तेजी से सामना किया जा सके।

सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में सोमालिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, अफगानिस्तान, हैती और मोजाम्बिक शामिल हैं। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता ऋतु भारद्वाज के अनुसार, 2°C तापमान वृद्धि की स्थिति में इन देशों में खाद्य असुरक्षा 30% से अधिक बढ़ सकती है, जबकि उच्च-आय वाले देशों में यह औसतन केवल 3% बढ़ने का अनुमान है।

Website |  + posts

दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
कार्बनकॉपी हिंदी में आपका स्वागत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

कार्बन कॉपी
Privacy Overview

This website uses cookies so that we can provide you with the best user experience possible. Cookie information is stored in your browser and performs functions such as recognising you when you return to our website and helping our team to understand which sections of the website you find most interesting and useful.