कमजोर मानसून से पड़ेगी मंहगाई की मार, अनाज के अलावा बढ़ सकते हैं दूध के दाम
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि महंगाई की भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, बेमौसम बारिश, बाढ़ और सूखे से केवल अनाज और सब्जियों की ही नहीं, बल्कि दूध की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं। इस साल कई इलाकों में कमजोर और असमान मानसून से हरे चारे की खेती प्रभावित हुई है। चारा कम होने पर किसानों को महंगा पशु आहार खरीदना पड़ता है, जिससे दूध उत्पादन की लागत बढ़ती है।
छोटे डेयरी किसानों के लिए यह बोझ और अधिक होता है, जिससे भविष्य में दूध का उत्पादन घट सकता है। दूध और खाद्य पदार्थ, दोनों ही उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) का बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए इनकी कीमत बढ़ने से खुदरा महंगाई पर सीधा असर पड़ता है।
आरबीआई की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक जलवायु संबंधी झटके महंगाई में 1 प्रतिशत तक अतिरिक्त बढ़ोतरी कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम से जुड़ी महंगाई को समझने और उससे निपटने के लिए जलवायु संबंधी आंकड़ों को आर्थिक नीति और महंगाई के आकलन में व्यवस्थित रूप से शामिल करना जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन: 310 जिलों में खतरे में कृषि, 109 पर सबसे ज्यादा जोखिम
देश के 651 कृषि-प्रधान जिलों में से 310 जलवायु परिवर्तन के असर के प्रति संवेदनशील पाए गए हैं। केंद्र सरकार ने संसद में यह जानकारी दी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अध्ययन में इनमें से 109 जिलों को 'बहुत अधिक जोखिम' और 201 जिलों को 'उच्च जोखिम' की श्रेणी में रखा गया। इससे खेती और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ रहा है। हालांकि सरकार ने इन जिलों के नाम नहीं बताए हैं।
सरकार ने बताया कि किसानों की मदद के लिए सभी जिलों के लिए विशेष कृषि योजनाएं तैयार की गई हैं। इनमें स्थानीय मौसम के अनुसार फसल, खेती की तकनीक और खेत प्रबंधन के सुझाव दिए गए हैं, ताकि खराब मौसम में भी नुकसान कम हो सके।
सरकार ने बताया कि 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 151 संवेदनशील जिलों के 448 गांवों में जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत कम पानी में धान की खेती, बिना जुताई गेहूं बोना और खेत में फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग जैसी तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है। गांवों में बीज बैंक और पौध तैयार करने की सामुदायिक नर्सरी भी बनाई गई हैं।
अरावली संरक्षण समिति ने जनता से सुझाव मांगे
सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एक समिति ने अरावली पर्वतमाला के संरक्षण पर आम लोगों से सुझाव और दस्तावेज मांगे हैं। समिति 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और अन्य जुड़े राज्यों के लोग ईमेल या विशेष पोर्टल के जरिए 21 दिनों के भीतर अपनी राय भेज सकते हैं। इससे पहले केंद्र की एक समिति ने केवल 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा मानने का प्रस्ताव दिया था, जिसका पर्यावरणविदों ने विरोध किया था। उनका कहना है कि इससे कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकते हैं।
पर्यावरण राहत कोष के उपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पर्यावरण राहत कोष (एनवायरनमेंटल रिलीफ फंड) के उपयोग पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है। अदालत ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से भी इस कोष के इस्तेमाल की जानकारी देने को कहा है। यह कोष 1991 के सार्वजनिक दायित्व बीमा कानून के तहत बनाया गया था, ताकि औद्योगिक दुर्घटनाओं से प्रभावित लोगों को राहत दी जा सके। केंद्र ने अदालत को बताया कि 2021 तक इस कोष में करीब 1,000.69 करोड़ रुपए जमा हुए थे। हालांकि अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि इस राशि का कितना हिस्सा खर्च हुआ या पीड़ितों को दिया गया।