सरकार ने डीजल-पेट्रोल बिक्री पर लगी अस्थायी पाबंदियां हटाईं
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कच्चे तेल की आपूर्ति सामान्य होने के बाद सरकार ने 1 जुलाई से डीजल और पेट्रोल की बिक्री पर लगाई गई अस्थायी पाबंदियां हटाने का फैसला किया है। 12 जून को सरकार ने पेट्रोल पंपों पर प्रति वाहन प्रतिदिन 200 लीटर डीजल की सीमा तय की थी और औद्योगिक, व्यावसायिक तथा संस्थागत उपभोक्ताओं की खुदरा पेट्रोल पंपों से ईंधन खरीद पर रोक लगा दी थी।
यह कदम ईंधन की कमी, जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए उठाया गया था। अब होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य होने के बाद स्थिति में सुधार हुआ है। सरकार ने यह प्रतिबंध उस समय लगाया था, जब खुदरा पंपों पर डीजल की मांग अचानक बढ़ गई थी और कई बड़े उपभोक्ता कीमतों के अंतर के कारण पेट्रोल पंपों से ईंधन खरीद रहे थे।
बॉन जलवायु सम्मेलन बेनतीजा, वित्त और व्यापार पर देशों में टकराव
जर्मनी के बॉन में संयुक्त राष्ट्र का दो सप्ताह तक चला जलवायु सम्मेलन (SB64) कई अहम मुद्दों पर सहमति के बिना समाप्त हो गया। सबसे बड़ा विवाद जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) को लेकर रहा। विकासशील देशों ने मांग की कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन वित्त (अडॉप्टेशन फाइनेंस) यानी बाढ़, सूखा और समुद्र-स्तर बढ़ने जैसी चुनौतियों से बचाव के लिए वित्तीय सहायता तीन गुना करने की अपनी प्रतिबद्धता को औपचारिक रूप दें, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी।
भारत ने सम्मेलन में स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं में पहले से तय दायरे से बाहर कोई नया दायित्व नहीं जोड़ा जाना चाहिए। भारत ने विकसित देशों से जलवायु वित्त बढ़ाने, ऐतिहासिक जिम्मेदारी और समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताएं (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities) के सिद्धांत का पालन करने की भी मांग की। यह सिद्धांत मानता है कि सभी देशों की जिम्मेदारी समान नहीं है और विकसित देशों की भूमिका अधिक है।
हालांकि, न्यायसंगत ऊर्जा परिवर्तन (जस्ट ट्रांज़िशन) तंत्र को औपचारिक रूप देने पर सहमति बनी। इसके तहत स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के दौरान प्रभावित श्रमिकों के पुनर्प्रशिक्षण और विकासशील देशों को तकनीकी सहायता देने पर जोर दिया जाएगा।
पहली बार 2 ट्रिलियन डॉलर के पार हुआ फाइनेंस, लेकिन रफ्तार धीमी
दुनिया में क्लाइमेट फाइनेंस (जलवायु वित्त) पहली बार 2024 में 2 ट्रिलियन डॉलर (करीब 2,008 अरब डॉलर) के पार पहुंच गया। क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव (सीपीआई) की रिपोर्ट के अनुसार निवेश बढ़ा है, लेकिन इसकी वार्षिक वृद्धि दर घटकर 6 प्रतिशत रह गई, जिससे जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने पर चिंता बढ़ी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में 85 प्रतिशत निवेश देशों के भीतर ही हुआ। निजी क्षेत्र का योगदान 62 प्रतिशत रहा। भारत ने दक्षिण एशिया के कुल जलवायु वित्त में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी निभाई। सबसे अधिक निवेश स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन और इमारतों के क्षेत्र में हुआ। हालांकि, अनुकूलन वित्त (अडॉप्टेशन फाइनेंस) यानी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाव और तैयारी के लिए मिला धन केवल 64 अरब डॉलर रहा, जिसे रिपोर्ट ने बेहद अपर्याप्त बताया।
अरावली समिति की निष्पक्षता पर सवाल, विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट को लिखा पत्र
अरावली पर्वतमाला की सीमा तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (High-Powered Committee) की निष्पक्षता पर वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर समिति की संरचना में बदलाव की मांग की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समिति के अधिकांश सदस्य वर्तमान या पूर्व सरकारी अधिकारी हैं, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष राय मिलने पर संदेह पैदा होता है। उनका तर्क है कि अरावली संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर समिति में स्वतंत्र वैज्ञानिकों, वन्यजीव, जल संसाधन, पारिस्थितिकी, स्वास्थ्य और स्थानीय आजीविका के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
आलोचकों ने यह भी कहा कि समिति की अध्यक्ष ऐसे संस्थान की प्रमुख हैं, जो पर्यावरण मंत्रालय के अधीन काम करता है। इससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) की आशंका पैदा होती है, यानी निर्णय लेने वाले व्यक्ति का किसी पक्ष से संस्थागत जुड़ाव निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह समिति अरावली की नई परिभाषा और सीमांकन की समीक्षा के लिए बनाई है। समिति को 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी है।