कमजोर मानसून और घटती आपूर्ति से देश में चावल के दाम 10% तक बढ़े

Editorial Team17 अग॰. 2026
कमजोर मानसून और घटती आपूर्ति से देश में चावल के दाम 10% तक बढ़े

घरेलू बाजार में चावल, खासकर गैर-बासमती किस्मों की कीमतें पिछले कुछ हफ्तों में 10% से अधिक बढ़ गई हैं। कारोबारियों का कहना है कि मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर, कमजोर मानसून की आशंका और धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी ने कीमतों को ऊपर धकेला है। 2026-27 फसल वर्ष के लिए सामान्य किस्म के धान का एमएसपी बढ़ाकर 2,441 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है, जो पिछले साल 2,369 रुपये था।

प्रीमियम किस्मों जैसे सोना मसूरी, पोन्नी और मसूरी की आपूर्ति में कमी ज्यादा महसूस की जा रही है। पश्चिम बंगाल में स्वर्णा चावल की एक्स-मिल कीमत कुछ हफ्तों में 30 से बढ़कर 34 रुपये प्रति किलो हो गई है, जबकि कई किस्मों के दाम कम से कम 10 रुपये प्रति किलो बढ़े हैं।

7 अगस्त तक मानसून सामान्य से 11% कम था। कारोबारियों के मुताबिक, खरीफ की नई फसल अक्टूबर के बाद बाजार में आएगी, जबकि जायद और रबी फसलों की आवक लगभग खत्म हो चुकी है। कृषि मंत्रालय ने 2025-26 में रिकॉर्ड 154.02 मिलियन टन चावल उत्पादन का अनुमान लगाया है। हालांकि, विशेषज्ञों ने उत्पादन और सरकारी भंडार के आंकड़ों में संभावित अंतर पर भी सवाल उठाए हैं। सरकार की खुले बाजार बिक्री योजना (OMSS) में आपूर्ति बढ़ने पर कीमतों में कुछ नरमी आने की उम्मीद है।

 

सरकार ने हीटवेव, आकाशीय बिजली को आपदा सूची में शामिल किया

केंद्र सरकार ने हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल कर लिया है। इससे राज्यों को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राहत के लिए केंद्र से वित्तीय सहायता मिल सकेगी। गृह मंत्रालय ने बताया कि 2026-31 के लिए राज्य आपदा मोचन कोष (एसडीआरएफ) और राष्ट्रीय आपदा मोचन कोष (एनडीआरएफ) के दिशानिर्देशों में यह बदलाव किया गया है। 

16वें वित्त आयोग ने बढ़ती और तीव्र होती चरम मौसम की घटनाओं के मद्देनजर हीटवेव और आकाशीय बिजली को सूची में शामिल करने की सिफारिश की थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 मार्च से 26 जुलाई 2026 के बीच देश में हीटस्ट्रोक से कम से कम 20 लोगों की मौत हुई, जबकि करीब 5,000 लोग प्रभावित हुए।  अब राज्य हीटवेव से निपटने के लिए आपदा राहत और शमन कोष का इस्तेमाल कर सकेंगे।

 

ग्रीन इंडिया मिशन का लक्ष्य 98% तक पिछड़ा: सीएजी

भारत 2015 से 2025 के बीच ग्रीन इंडिया मिशन के तहत वन क्षेत्र बढ़ाने के लक्ष्य से 97.57% पीछे रहा। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने 10 वर्षों में 14 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र बढ़ाने का लक्ष्य रखा था। इसके मुकाबले केवल 34,090 हेक्टेयर क्षेत्र में वन क्षेत्र बढ़ा।

वन गुणवत्ता सुधारने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हुआ। 14 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 1.14 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सुधार हुआ। यह लक्ष्य से 91.87% कम है। सीएजी ने खराब योजना, कमजोर समन्वय और पर्याप्त फंड की कमी को इसकी वजह बताया है

ऑडिट में आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाने की बात भी सामने आई। जीआईएस विश्लेषण में जांचे गए 70% स्थानों पर मिशन के कारण कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं मिला। रिपोर्ट के अनुसार, कई जगहों पर जलवायु परिवर्तन के लिहाज से कम संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई।

 

नए पर्यावरण मंजूरी नियम: विशेषज्ञता को लेकर उठे सवाल

केंद्र सरकार ने पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया में बदलाव किया है। पर्यावरण मंत्रालय ने 13 जुलाई 2026 को दो आदेश जारी किए। इनके तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में दो स्थायी निकाय बनाए जाएंगे। इनमें स्टैंडिंग अथॉरिटी ऑन एनवायरनमेंट इंपैक्ट असेसमेंट (एसएईआईए) और स्टैंडिंग कमेटी ऑन एनवायरनमेंट इंपैक्ट अप्रेजल (एससीईआईए) शामिल हैं। यह निकाय राज्यों की ज्यादातर परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी दे सकते हैं।

सरकार की दलील है की राज्यों द्वारा अक्सर पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया में देरी की जाती है जिस वजह से यह बदलाव किए जा रहे हैं। नए निकाय शुरू में छह महीने तक काम करेंगे। जरूरत पड़ने पर छह महीने का और विस्तार दिया जा सकता है।

हालांकि, नए नियमों में सदस्यों की विशेषज्ञता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। मौजूदा नियमों के तहत एसईएसी और केंद्रीय ईएसी में पर्यावरण से जुड़े क्षेत्रों में लंबा अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ जरूरी हैं। एससीईआईए के छह सदस्यों में पांच अपने सरकारी पद के कारण सदस्य होंगे। इनमें मुख्य वन्यजीव संरक्षक, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, नए नियम उस पुराने प्रावधान को भी हटा देते हैं जिसके तहत राज्य स्तर की संस्था के काम न करने पर परियोजना का आकलन केंद्र की विशेषज्ञ समिति करती थी।

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