आईपीसीसी की ताज़ा रिपोर्ट, जानिए क्या हैं मुख्य बातें
“हम बर्फ की महीन परत पर खड़े हैं जो तेज़ी से पिघल रही है”
Editorial Team20 मार्च. 2023
आईपीसीसी के अध्यक्ष होसुंग ली 58वें सत्र का उद्घाटन करते हुए। Photo: @IPCC_CH/Twitter
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के यह शब्द जलवायु परिवर्तन पर आईपीसीसी की ताज़ा रिपोर्ट के सार को बताते हैं। संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिकों के पैनल की यह छठी आकलन (संश्लेषण) रिपोर्ट सोमवार को जारी की गई। यह रिपोर्ट पिछले साल जारी की गई तीन कार्यसमूहों की रिपोर्ट और तीन अन्य रिपोर्टों का निचोड़ है जिसमें 2018 की स्पेशल रिपोर्ट (1.5 डिग्री) भी शामिल है।
संश्लेषण रिपोर्ट की मुख्य बातें
- 1850 – 1900 के मुकाबले साल 2011-2020 के बीच धरती के तापमान में 1.1 डिग्री की बढ़ोतरी हो चुकी है और अगर कार्बन उत्सर्जन की रफ्तार यूं ही जारी रही तो इस दशक के मध्य तक ही किसी साल धरती की तापमान वृद्धि का 1.5 डिग्री सेंटीग्रेट का बैरियर पार हो जायेगा। ग्रीन हाउस गैसों का अंधाधुंध उत्सर्जन इसका प्रमुख कारण है जिसके लिये इंसानी हरकतें ज़िम्मेदार हैं।
- वैज्ञानिकों का कहना है कि पेरिस संधि के तहत राष्ट्रीय लक्ष्यों को सभी देश कड़ाई से लागू करें तो सदी के अंत तक धरती की तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक सीमित करने की 50% संभावना है वरना मौजूदा हाल में 2040 या उससे पहले 1.5 डिग्री की तापमान वृद्धि कायम हो जायेगी।
- वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन लगातार बढ़ा है। इसके पीछे ऊर्जा का अंधाधुंध इस्तेमाल, भू-प्रयोग और भू-प्रयोग में बदलाव के अलावा लाइफस्टाइल और उपभोग और उत्पादन का पैटर्न ज़िम्मेदार है।
- धरती, वायुमंडल, समुद्र और हिममण्डल (क्रायोस्फियर) सभी में व्यापक और त्वरित बदलाव हुये हैं। इससे मानव और प्रकृति पर विपरीत प्रभाव और उनसे जुड़ी भारी हानि और क्षति हुई है। जिन संकटग्रस्त समुदायों का जलवायु परिवर्तन पर न्यूनतम योगदान रहा है उन पर असंगत प्रभाव पड़ा है।
- मानव जनित क्लाइमेट चेंज के कारण विपरीत प्रभाव तीव्र होते जायेंगे। पानी की उपलब्धता, खाद्य उत्पादन, स्वास्थ्य और जनहित इससे प्रभावित होंगे। शहरों की बसावट और मूल ढांचों पर असर पड़ेगा।
- अनुकूलन यानी एडाप्टेशन की दिशा में कोशिशों के बावजूद बहुत कमियां बाकी हैं और जिस रफ्तार से योजनायें लागू हो रही हैं यह अंतर और बढ़ेगा।
- वर्तमान वैश्विक वित्तीय मदद अपर्याप्त हैं जिससे क्रियान्वयन (विशेष रूप से विकासशील देशों में) प्रभावित हो रहा है। धरती की तापमान वृद्धि में थोड़ा सा बदलाव भी औसत तापमान या क्लाइमेट में बड़े बदलाव पैदा करेगा। धरती जितनी गर्म होगी उसकी कार्बन को सोखने की क्षमता भी कम हो जायेगी। चरम मौसमी घटनायें, अस्थिरता और अप्रत्याशित घटनाओं की संख्या बढ़ेगी।
- हालांकि कुछ प्रभावों को अब टाला नहीं जा सकता लेकिन उत्सर्जन में तेज़ी से भारी और लगातार कटौती से कई प्रभावों को सीमित किया जा सकता है। मानव जनित ग्लोबल वॉर्मिंग को काबू करने के लिये नेट ज़ीरो के लक्ष्य को हासिल करना ज़रूरी है।
- पेरिस संधि के लक्ष्य निगेटिव इमीशन के बिना हासिल नहीं किये जा सकते। अगर ज़रूरी कदम उठाने में देरी की गई तो लॉस एंड डैमेज (हानि और क्षति ) में भारी वृद्धि होगी।
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