'सुपर एल नीनो' ने तोड़ा रिकॉर्ड, भारत के लिए खतरा बढ़ा
‘सुपर एल नीनो’ के मजबूत होने से अगले छह महीनों में भारत में गर्मी से जुड़ी करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। एक अध्ययन के अनुसार, यह घटना भारत में पहले से मौजूद गर्मी और जलवायु जोखिम को बढ़ा सकती है।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, नीनो 3.4 सूचकांक सितंबर में 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है और सभी 22 मॉडल 2026-27 की सर्दियों में बेहद मजबूत अल नीनो की संभावना जता रहे हैं। नीनो 3.4 सूचकांक प्रशांत महासागर के एक खास हिस्से के समुद्र की सतह के तापमान में सामान्य से अंतर को मापता है। इसका स्तर जितना अधिक होता है, अल नीनो की तीव्रता उतनी ही ज्यादा मानी जाती है।
भारत में एल नीनो अक्सर कमजोर मानसून, गर्म और शुष्क मौसम तथा फसलों और जल उपलब्धता पर दबाव से जुड़ा होता है।
उपरोक्त अध्ययन की सह-लेखिका एमिली ग्रोवर-कोपेक ने बताया कि इसका आकलन मौसमी तापमान पूर्वानुमान और तापमान से होनेवाली मौतों के संबंधों के आधार पर किया गया है। इसके लिए 1996-2025 की अवधि को आधार बनाया गया। उन्होंने कहा कि इस्तेमाल किया गया ईसीएमडब्ल्यूएफ पूर्वानुमान उपलब्ध मॉडलों के बीच अपेक्षाकृत मध्यम अनुमान देता है। हालांकि, एनआरडीसी के अभियांत तिवारी ने कहा कि इन मौतों के अनुमान को मॉडल आधारित अनुमान के रूप में सावधानी से देखना चाहिए और पूरी पद्धति की अभी समीक्षा होनी है।
दशकों तक रहेगा पुराने उत्सर्जन का असर: अध्ययन
दुनिया की प्रमुख जीवाश्म ईंधन कंपनियों के पुराने कार्बन उत्सर्जन का असर आने वाले दशकों तक जलवायु पर बना रह सकता है। वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार, 178 प्रमुख तेल, गैस, कोयला और सीमेंट उत्पादकों के उत्सर्जन का प्रभाव पहले के अनुमानों से अधिक लंबे समय तक रह सकता है।
प्लॉस क्लाइमेट में 23 सितंबर को प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, औद्योगिक क्रांति के बाद इन प्रमुख प्रदूषकों ने एक ट्रिलियन टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित की है। इसका बड़ा हिस्सा वातावरण में लंबे समय तक रहकर गर्मी को रोकता रहेगा। अध्ययन के सह-लेखक डार्गन फ्रियर्सन ने कहा कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कल पूरी तरह रुक भी जाए, तब भी पर्यावरण को औद्योगिक क्रांति से पहले की स्थिति में लौटने में लंबा समय लगेगा। उन्होंने कहा कि पुराने उत्सर्जन आने वाले दशकों में जलवायु आपदाओं को बढ़ा सकते हैं और उत्सर्जन की जवाबदेही को लेकर कानूनी मामले लंबे समय तक जारी रह सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में भारी बारिश का कहर, 81 लोगों की मौत; 2,254 मकान क्षतिग्रस्त
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में भारी बारिश और आंधी-तूफान ने व्यापक तबाही मचाई। राज्य राहत आयुक्त कार्यालय के अनुसार, बारिश से जुड़ी घटनाओं में 81 लोगों की मौत और 62 लोग घायल हुए हैं। इसके अलावा 154 पशुओं की भी मौत हुई है और 2,254 मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं।
उत्तर प्रदेश में 24 घंटे की अवधि के दौरान सामान्य 1.8 मिमी के मुकाबले 45.1 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जो 2,506% अधिक है। राज्य के 75 में से 74 जिलों में अत्यधिक अधिक वर्षा दर्ज की गई।
दिल्ली से विदा हुआ मानसून, 14 साल में सबसे छोटा प्रवास
दक्षिण-पश्चिम मानसून ने बुधवार को दिल्ली से विदाई ले ली। इस साल मानसून 83 दिन तक दिल्ली में रहा, जो 14 वर्षों में सबसे कम अवधि है। मानसून 2 जुलाई को दिल्ली पहुंचा था और 23 सितंबर को लौट गया। 2012 में मानसून 80 दिन तक दिल्ली में रहा था। हालांकि, कम अवधि के बावजूद राजधानी में सामान्य से 16 प्रतिशत अधिक बारिश हुई।
सफदरजंग केंद्र ने 23 सितंबर तक 728.6 मिमी बारिश दर्ज की, जबकि सामान्य बारिश 629.7 मिमी है। इस साल मानसून का आगमन सामान्य से पांच दिन देर से हुआ था। जुलाई और अगस्त में भारी बारिश हुई, जबकि सितंबर में बारिश काफी कम रही। अगस्त में सफदरजंग में 354.1 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 59 प्रतिशत अधिक थी। मानसून की विदाई सामान्य तारीख 25 सितंबर से दो दिन पहले हुई।