जलवायु परिवर्तन पर करो या मरो का वक़्त

Newsletter - September 18, 2019

करो या मरो: ग्लोबल वॉर्मिंग का दानव दरवाज़े पर खड़ा है लेकिन विश्व नेताओं द्वारा कड़े फैसले न लिया जाना हैरान करने वाला है. न्यूयॉर्क सम्मेलन के दौरान कई विरोध प्रदर्शन होना तय हैं – Photo – Twitter

जलवायु परिवर्तन पर करो या मरो का वक़्त

कुछ दिन पहले समाचार एजेंसी AFP ने IPCC के लीक हुये ड्राफ्ट के आधार पर ख़बर छापी जिससे हड़कंप मच गया। इस रिपोर्ट में धरती के क्रायोस्फियर (जहां समंदर का जम जाता है) और महासागरों को लेकर जो जानकारी थी। ख़बर है कि IPCC की इस 900 पन्नों की रिपोर्ट में (जो अब तक छपी नहीं है) क्लाइमेट चेंज के कारण करोड़ों लोगों के विस्थापन की चेतावनी है।

ऐसे में सारी नज़रें  अगले हफ्ते की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ओर से बुलाये गये न्यूयॉर्क सम्मेलन पर टिकी हैं। क्या विश्व के तमाम देश और नेता एंटोनियो गुट्रिस की अपील “पुख्ता कदम, सिर्फ भाषण नहीं” पर अमल करेंगे। सवाल है कि क्या लीक हुई IPCC की रिपोर्ट की वजह से अमीर देशों का ज़मीर जागेगा।  वैसे विश्व मौसम संगठन की क्लाइमेट पर रिपोर्ट भी जल्द प्रकाशित होने वाली है और उसमें भी क्लाइमेट चेंज के भयावह प्रभावों को दर्शाया गया है।

यह साफ है कि धरती की तापमान वृद्धि को अब 1.5 डिग्री की सीमा पर रोकना नामुमकिन है और 2040 तक तापमान इस सीमा को पार कर जायेगा। पेरिस सम्मेलन में किये गये वादे अगर तमाम देश पूरा कर भी देते हैं तो सदी के अंत तक तापमान में 3-4 डिग्री की बढ़ोतरी हो सकती है। इसके बावजूद अमेरिका, कनाडा, रूस, चीन, सऊदी अरब, जापान और ऑस्ट्रेलिया समेत तमाम देश कार्बन इमीशन कम करने की दिशा में कोई बड़ा कदम उठाते नहीं दिख रहे। दूसरी ओर ब्राज़ील जैसे देश हैं जो पेरिस समझौते को घृणा की नज़र से देखते हैं।

विकासशील देशों में भारत ने पहले ही कह दिया है कि वह फिलहाल जलवायु परिवर्तन पर अपने लक्ष्य को पेरिस सम्मेलन में किये वादे से और आगे नहीं ले जा सकता। दूसरी ओर चीन ने भले ही अपने देश के भीतर कार्बन इमीशन कम करने की दिशा में कड़े कदम उठाये हों और साफ ऊर्जा में निवेश किया हो लेकिन वह देश के बाहर तेल, कोयले और गैस से चलने वाले संयंत्रों में निवेश कर रहा है। ऐसे में न्यूयॉर्क सम्मेलन में सभी देशों के रुख को आखिरी उम्मीद के तौर पर देखा जायेगा।


क्लाइमेट साइंस

बद से बदतर हालात: बरसात और बाढ़ ने इस साल भारत में 1400 लोगों की जान ले ली है और 1 करोड़ लोग प्रभावित हुये हैं। – Photo – thefederal.com

भारत में बाढ़ से इस साल 1400 लोगों की मौत

भारी बारिश और बाढ़ की मार उत्तर भारत के कई राज्यों पर पड़ी है। राजस्थान, पंजाब और यूपी में तो बाढ़ ने कहर बरपा किया ही लेकिन मध्य प्रदेश में तो कम से कम 220 लोगों की जान चली गई और करीब 10,000 करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ। केंद्र सरकार की टीम अभी मध्य प्रदेश औऱ दूसरे राज्यों में हालात का मुआयना कर रही हैं। गृह मंत्रालय का कहना है कि इस बाढ़ में कम से कम 1400 लोगों की जान जा चुकी है और करीब 1 करोड़ लोग प्रभावित हुये हैं।

भारत: चरागाह 10 साल में 31% घटे

साल 2005 और 2015 के बीच भारत में ग्रासलैंड (चरागाहों) के क्षेत्रफल में 31% गिरावट आई है।  क्षेत्रफल में यह कमी करीब 56.5 लाख हेक्टेयर के बराबर है। भारत ने अभी हाल में  मरुस्थलीकरण पर हुये संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में यह जानकारी दी। सबसे अधिक हानि राजस्थान के अरावली रेंज में हुई है। इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में घास स्थलों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है।

घास स्थलों में होने वाली इस कमी के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारण हैं। प्रत्यक्ष कारणों में चरागाहों में अत्यधिक चरान, जंगलों का कटान और ख़राब प्रबंधन शामिल है। अप्रत्यक्ष कारणों में चरागाहों में अतिक्रमण कर उसे कृषि भूमि में तब्दील करना और उस पर आबादी का बसना शामिल है।

जलवायु परिवर्तन खत्म कर देगा क्रिकेट का खेल: रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन की मार भारत के सबसे पसंदीदा खेल पर पड़ सकती है। जी हां, एक नई रिपोर्ट क्रिकेट के भविष्य पर सवालिया निशान खड़े करती है और वजह है जलवायु परिवर्तन। लगातार मूसलाधार बरसात से लबालब होते मैदान पिच से लेकर पैवेलियन और ड्रेसिंग रूम सब कुछ डुबा रहे हैं। इंग्लैंड में हाल में इस मौसम का असर साफ दिखा। इसी तरह असामान्य गर्मी, बढ़ती नमी और हीट वेव खिलाड़ियों की जान के लिये ख़तरा बन सकती हैं। ‘हिट फॉर सिक्स’ नाम से लिखी गई इस रिपोर्ट के  बारे में वर्ल्ड क्रिकेट कमेटी को बता दिया गया है औऱ कुछ सुझाव दिये गये हैं ताकि खिलाड़ियों की जान पर आफत न आये। मिसाल के तौर पर प्लेयर्स को अब नमी वाले हालात में पतलून की जगह शॉर्ट्स में खेलने की इजाज़त और ड्रिंक्स इंटरवल बढ़ाना जैसे कदम सुझाये गये हैं।

क्लाइमेट एडाप्टेशन में निवेश बचायेगा खरबों रुपये: रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन को लेकर तैयार की गई एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक अनुकूलन यानी एडाप्टेशन पर निवेश किया गया तो इसके कई आर्थिक फायदे हो सकते हैं। ग्लोबल कमीशन ऑफ एडाप्टेशन द्वारा लिखी गई यह रिपोर्ट बताती है कि 2020 और 2030 के बीच क्लाइमेट चेंज के असर से लड़ने के लिये अगर 1.8 ट्रिलियन डॉलर का निवेश किया गया तो यह करीब 7.1 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक फायदा होगा या इतना नुकसान होने से बचेगा।  इस रिपोर्ट में जो कदम उठाने के लिये कहा गया है उनमें बाढ़ और चक्रवाती तूफान जैसे खतरों से आगाह करने के लिये चेतावनी (अर्ली वॉर्निंग सिस्टम), जलवायु परिवर्तन के असर को झेल सकते वाले भवन और मूलभूत ढांचा, जल स्रोत और बंजर ज़मीन पर खेती के साधन के साथ मैंग्रोव को बचाने की सिफारिश है। रिपोर्ट कहती है कि अगर ये कदम नहीं उठाये गये तो साल 2030 तक करीब 10 करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे जा सकते हैं।


क्लाइमेट नीति

कमज़ोर योजना: मरुस्थलीकरण पर दिल्ली में विश्व सम्मेलन तो ज़ोर-शोर से हुआ लेकिन नतीजा कुछ खास नहीं दिखा है। Photo: Ángeles Estrada, IISD/ENB

मरुस्थलीकरण सम्मेलन ढीली ढाली घोषणा के साथ खत्म

मरुस्थलीकरण पर 14 वां विश्व सम्मेलन एक ढीले ढाले ऐलान के साथ खत्म हो गया। बेकार होती ज़मीन  दुनिया  की सबसे बड़ी चिंताओं में एक है लेकिन इसे लेकर जो आखिरी घोषणा हुई उसमें इरादे की कमी साफ दिखी है।

अंतिम घोषणापत्र में ख़राब होती ज़मीन और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध को अधिक महत्व नहीं दिया गया है। इससे आने वाले दिनों में मरुस्थलीकरण और क्लाइमेट चेंज सम्मेलनों के बीच तालमेल की संभावना नहीं के बराबर है। साथ ही जो एजेंसियां जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिये पैसा खर्च कर रही हैं उन्हें इस लड़ाई में शामिल करना अब मुश्किल होगा जबकि अंतिम रूप दिये जाने से पहले इन बातों को घोषणापत्र में रखा गया था।  आपदाओं से लड़ने की तैयारी यानी अनुकूलन (जिसे क्लाइमेट चेंज की भाषा में एडाप्टेशन कहा जाता है) को भी घोषणापत्र से हटा दिया गया है जबकि यह ख़राब होती ज़मीन और सूखे से लड़ने की दिशा में बड़ा हथियार है। इसी तरह आदिवासियों और फॉरेस्ट इकोसिस्टम से जुड़े कई मुद्दे – जो पहले घोषणापत्र के ड्राफ्ट में थे – आखिरी घोषणा में नहीं दिखे।

मुंबई में अब तक बाढ़ आपदा संभावित क्षेत्रों की पहचान नहीं

मुंबई की स्थानीय नागरिक इकाइयों जैसे म्युनिसिपल कारपोरेशन, डेवलोपमेंट अथॉरिटी आदि  ने 2005 में आई भयानक बाढ़ के बावजूद अब तक कोई फ्लड-रिस्क ज़ोन मेप तैयार नहीं किया है जिसके आधार पर बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान और उससे निपटने के लिये आपदा प्रबंधन का खाका तैयार हो सके। इस काम की ज़िम्मेदारी ब्रह्नमुंबई म्युनिस्पल कॉरपोरेशन (BMC) और मुंबई मेट्रोपोलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MMRDA) है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किये गये विशेषज्ञों के एक पैनल ने कोर्ट में जमा की गई अपनी एक रिपोर्ट में यह बात कही है। साल 2005 में मिथी नदी में जल-स्तर बढ़ जाने से मुंबई में भारी बाढ़ आ गई थी।  रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बाढ़ के बाद मिथी नदी को चौड़ा किया गया है जिसे लेकर कई सवाल उठे हैं।   

जलवायु परिवर्तन संकट को लेकर अमेरिका का UN एजेंसियों पर दबाव!  

क्या विस्थापन पर काम कर रही संयुक्त राष्ट्र की माइग्रेशन एजेंसी पर अमेरिकी सरकार का दबाव है? इंटरनेशनल ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर माइग्रेशन (IOM) के अमेरिका स्थित एक अधिकारी ने दुनिया भर में अपने सहकर्मियों  को जो ई-मेल लिखा है उससे यह बात पता चलती है। यह ई-मेल 28 अगस्त को लिखा गया और इसके लीक होने से हड़कंप मच गया है। ई-मेल से पता चलता है कि अमेरिका के ब्यूरो ऑफ पॉपुलेशन, रिफ्यूजी और माइग्रेशन (PRM) ने UN माइग्रेशन एजेंसी से कहा है कि किसी भी ऐसे प्रोग्राम से  जुड़े दस्तावेज़ में,  जिसे चलाने के लिये अमेरिकी सरकार आर्थिक मदद करती हो,  अमेरिका सरकार की वर्तमान राजनीति के खिलाफ बात नहीं होनी चाहिये।  इस अधिकारी ने लिखा है कि जलवायु परिवर्तन संकट और सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (SDG) से जुड़े तथ्य इन शर्तों में शामिल हैं और दस्तावेज़ में लिखी  किसी बात के छपने से पहले उसे अमेरिकी सरकार को दिखाना और उससे मंज़ूरी लेनी पड़ सकती है।

जंगल बचाने के लिये अमेज़न देशों में करार, आदिवासी ब्राज़ीली राष्ट्रपति के खिलाफ एकजुट

भयानक आग से तबाह हुये जंगलों को बचाने के लिये सात अमेज़न देशों ने करार किया है। कोलंबिया, बोलीविया, इक्वेडोर, पेरू, ब्राज़ील, सूरीनाम और गुयाना ने अमेज़न पर संकट से लड़ने के लिये एक आपदा प्रबंधन रणनीति के लिये मीटिंग की। मंज़ूरी लेना पड़ सकता है। इन देशों में अमेज़न क्षेत्र में पेड़ लगाने, जंगलों के कटान पर नज़र रखने और आदिवासियों की भूमिका पर चर्चा की।

उधर अमेज़न पर छाये संकट को देखते हुये आपस में संघर्षरत कई कबीले ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सनारो के खिलाफ एकजुट हो गये हैं। इन आदिवासियों को लगता है कि अमेज़न में लगी आग जानबूझ कर आदिवासियों को भगाने और उद्योगपतियों को क़ब्ज़ा देने के लिये लगाई गई है।


वायु प्रदुषण

बुरे दिनों की तैयारी: दिल्ली में सर्दियों का मौसम दमघोंटू हवा वाला होता है। मुख्यमंत्री ने इससे निपटने के लिये एक बार फिर ऑड-ईवन कार योजना को लागू करने का ऐलान किया है। Photo: Hindustan Times

दिल्ली में फिर लागू होगी ऑड-ईवन, प्रदूषण के आंकड़ों को लेकर विवाद

दमघोंटू प्रदूषण से लड़ने के लिये नवंबर के महीने में राजधानी में कारों के लिये ऑड-ईवन योजना लागू होगी। यह स्कीम 4 नवंबर से 15 नवंबर के बीच लागू की जायेगी। इस ऐलान के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री ने प्रदूषण से लड़ने के लिये एक सात सूत्री कार्यक्रम की भी घोषणा की जिसके तहत दिल्ली की सड़कों पर 1000 बैटरी बस लाने और दिल्ली वासियों के लिये N-95 मास्क उपलब्ध करवाना शामिल है।

केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिये लम्बे समय से जो कदम उठाये जा रहे हैं उनकी वजह से यहां प्रदूषण स्तर में 25% कमी आई है। मुख्यमंत्री दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरेंन्मेंट (CSE)  की ताज़ा अध्ययन के आधार पर यह जानकारी दी। CSE ने कहा है कि 2012-14 और 2016-18 के बीच आंकड़ों का अध्ययन करने से पता चलता है कि प्रदूषण में वृद्धि रुक गई है और PM 2.5 कणों के स्तर में 25 प्रतिशत कमी है। हालांकि CSE ने यह भी कहा कि दिल्ली की हवा को सांस लेने लायक बनाने के लिये इसमें 65% प्रदूषण और कम करना होगा।

उधर करीब यूनाइटेड रेजीडेंट ज्वाइंट एक्शन (URJA) – जो दिल्ली के करीब 2500 रेजीडेंट वेलफेयर (RWA) का संगठन है – का कहना है कि राजधानी की हवा को बेहतर करने के लिये बनी रणनीति और उसके लागू होने में काफी अंतर है। कुछ जानकारों ने दिल्ली की हवा के 25% साफ होने के दावे पर भी सवाल खड़े किये हैं और कहा है कि 2015 से पहले दिल्ली में एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग बेहतर नहीं थी इसलिये इन आंकड़ों की आपस में तुलना ठीक नहीं है।

माहुल की एयर क्वॉलिटी बेहतर हुई या नहीं, रिपोर्ट्स की तुलना हो: मुंबई हाइकोर्ट

मुंबई हाइकोर्ट ने आदेश दिया है कि माहुल की एयर क्वॉलिटी को लेकर हुये तमाम सर्वे के आधार पर एक तुलनात्मक चार्ट बनाया जाये ताकि पता चल सके कि 2015 से अब तक माहुल की हवा साफ हुई है या नहीं। कोर्ट ने यह आदेश तानसा पाइप लाइन प्रोजेक्ट से प्रभावित लोगों की याचिका पर दिया। 2015 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा था कि माहुल में हवा लोगों के रहने लायक नहीं है। प्रभावित लोगों के वकील ने नेशनल इन्वारेंमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (NEERI), महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) और काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) की रिपोर्ट अदालत में पेश की थी। 160 किलोमीटर तानसा वॉटर पाइपलाइन की सुरक्षा के लिये इस इलाके में बनी सैकड़ों बस्तियों में रह रहे लोगों को हटाया जा रहा है।


रिन्यूएबिल

कड़ी चेतावनी: केंद्र सरकार ने बिजली वितरण कंपनियों से कहा है कि भुगतान न करने पर वसूली के लिये उन्हें अदालत में घसीटा जायेगा। Photo: Business Today

DISCOM पर बढ़ता कर्ज़: ऊर्जा मंत्री ने 7 राज्यों को चेताया

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने राज्य की डिस्कॉम (बिजली वितरण कंपनियों) को चेतावनी दी है कि अगर वह अपने करीब साढ़े पांच हज़ार करोड़ के बकाया नहीं चुकाते हैं तो उनके खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में मुकदमा चल सकता है। ऊर्जा मंत्री के मुताबिक डिस्कॉम द्वारा अदायगी न करने पर बिजली कंपनियां भुगतान करने में असमर्थ हो जाती हैं। आंध्र प्रदेश की वितरण कंपनियों  सबसे अधिक 2000 करोड़ बकाया है। उसके बाद तमिलनाडु और तेलंगाना का नंबर है।

रूफ टॉप सोलर में चाहिये 10 गुना की बढ़त: मंत्रालय

साफ ऊर्जा मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि छत पर सोलर पावर (रूफ टॉप सोलर) के मामले में निर्धारित 40,000 मेगावॉट का लक्ष्य हासिल करने के लिये भारत को 10 गुना क्षमता बढ़ानी होगी।  वित्त वर्ष 2018-19 के लिये “SARAL: State rooftop solar attractiveness index” नाम से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ राज्यों ने इस दिशा में बहुत अच्छी तरक्की की है। मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र ने पिछले साल 450 मेगावॉट क्षमता के सोलर पैनल लगाये। इसी तरह दिल्ली ने सबसे उम्दा नेट-मीटरिंग रेग्युलेशन शुरू किया और कर्नाटक में सभी जानकारियों के साथ एक ई-पोर्टल शुरू किया गया ताकि सभी आवेदनों को पर बिना किसी झंझट और परेशानी के कार्यवाही हो सके।

सोलर सेल: भारत और चीन मिलकर करेंगे रिसर्च  

नीति आयोग ने कहा है कि भारत और चीन सोलर सेल बनाने के लिये वैकल्पिक सामग्री के प्रयोग और सोलर सेल की दक्षता (efficiency) बढ़ाने के लिये एक साथ काम करेंगे। इसके तहत दोनों देश एक दूसरे को रिसर्च और डेवलपमेंट में मदद करेंगे। यह फैसला अभी हाल में आर्थिक-रणनीतिक मामलों में हुये छठे भारत-चीन संवाद में लिया गया। दोनों देश ऊर्जा, टैक्नोलॉजी और नीति समन्वय समेत अलग-अलग क्षेत्रों में 6 संयुक्त कार्यदलों का गठन करेंगे।

सौर ऊर्जा पैनल: जून की तिमाही में 14%  गिरावट साफ ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाली मरकॉम इंडिया के मुताबिक सोलर पैनल स्थापित करने के मामले में इस साल दूसरी तिमाही में ग्राफ गिरा है। रिपोर्ट कहती है कि अप्रैल से जून 2019 में कुल 1510 मेगावॉट क्षमता के पैनल लगे जबकि पिछले साल इसी दौरान 1665 मेगावॉट के पैनल लगे थे। यह गिरावट 14% है। 2019 की पहली तिमाही में तो 2018 की पहली तिमाही के मुकाबले 35% की गिरावट दर्ज हुई थी। मरकॉम की रिपोर्ट में इस कमी की वजह रूफ टॉप सोलर में गिरावट और सोलर पैनल प्रोजेक्ट में निवेश की कमी है। रिपोर्ट कहती है कि इस साल भारत कुल 8000 मेगावॉट सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर सकता है और 2022 तक उसकी कुल क्षमता 70,000 मेगावॉट हो सकती है।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

जान फूंकने की कोशिश: तमिलनाडु की नई इलैक्ट्रिक वाहन पॉलिसी में ग्राहकों को लुभाने के लिये कई योजनायें हैं। साथ ही राज्य भर में चार्जिंग स्टेशन लगाने की तैयारी है। Photo: Economic Times

तमिलनाडु: बैटरी वाहन बाज़ार को बढ़ावा देने के लिये उठाये कदम

तमिलनाडु सरकार ने बैटरी वाहनों में तेज़ी लाने के नई घोषणायें की हैं। अब किसी भी श्रेणी के व्यवसायिक बैटरी वाहन पर कोई रोड टैक्स नहीं होगा। इनमें मोटरसाइकिलों से लेकर ऑटो रिक्शा और सभी मालवाहक शामिल हैं।  निजी बैटरी कारों के लिये रोड टैक्स में अब तक 50 % छूट थी जिसे बढ़ाकर 100 % कर दिया गया है। सरकार ने यह भी तय किया है कि अब हाइवे पर हर 25 किलोमीटर पर बैटरी चार्जिंग स्टेशन लगाया जायेगा।

पेट्रोल-डीज़ल वाहनों रोक नहीं, टैक्स की दरों में बदलाव मुमकिन

सरकार ने साफ कर दिया है कि बैटरी वाहनों की बिक्री बढ़ाने के लिये वह पेट्रोल-डीज़ल वाहनों पर पाबंदी नहीं लगायेगी। पेट्रोल-डीज़ल वाहनों की सेल में पिछले कुछ महीनों में ज़बरदस्त मंदी है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि  ऑटोमोबाइल में जीएसटी दरों में कमी की जा सकती है ताकि वाहनों की बिक्री बढ़े। ऑटो निर्माताओं ने बीमार पड़े बाज़ार में जान फूंकने के लिये सरकार से गुहार लगाई थी। सरकार के ताज़ा ऐलान इसी समस्या को हल करने की दिशा में हैं।

लीथियम-आयन बैटरी: ज़र्मनी और फ्रांस की कंपनियों में समझौता

जर्मनी की जानी मानी कंपनी BASF और फ्रांस की Eramet & Suez अगले साल जनवरी से इलैक्ट्रिक कार बैटरियों के रिसाइक्लिंग पर काम शुरू करेंगी। जर्मन कंपनी का अनुमान है कि साल 2027 तक पूरे यूरोप में करीब 50,000 टन लीथियम आयन बैटरियों को रीसाइकिल किया जायेगा। BASF  ने कहा है कि मौजूदा हाल को देखते हुये 2035 तक करीब 5 लाख टन बैटरियां रीसाइकिल होंगी। दोनों कंपनियां मिलकर नयी आधुनिक बैटरियों के पुर्ज़े भी तैयार करेंगी.


जीवाश्म ईंधन

नई कोशिश: गुजरात औऱ छत्तीसगढ़ जैसे कोल पावर प्लांट से भरे राज्यों ने अब साफ ऊर्जा के नये प्रोजक्ट लगाने का वादा किया है। क्या ये राज्य अब कोल पावर को अलविदा कहेंगे? Photo: NTPC

गुजरात, छत्तीसगढ़ में नया कोयला बिजलीघर नहीं, सौर ऊर्जा पर होगा ज़ोर

गुजरात सरकार ने साफ कर दिया है कि राज्य में कोई नया कोयला बिजलीघर नहीं बनेगा। हर साल 8-9% की दर से बढ़ रही बिजली की मांग सौर ऊर्जा से पूरी की जायेगी। गुजरात के कोयला बिजलीघर औसतन केवल 40% की क्षमता पर काम कर रहे हैं।  सरकार ने भले ही सौर ऊर्जा पर निर्भरता का ऐलान किया हो लेकिन उसे सोलर पावर काफी महंगी पड़ती है। अभी जबकि तमाम राज्य सरकारें नये बिजली अनुबंध ₹ 3 प्रति यूनिट के हिसाब से कर रहे हैं वहीं गुजरात सरकार कंपनियों से  ₹ 15 प्रति यूनिट की दर से सौर ऊर्जा खरीद रही है।

उधर छत्तीसगढ़ ने भी ऐलान किया है कि वह अब कोई नया कोल प्लांट नहीं लगायेगा। राज्य सरकार अब सौर ऊर्जा के नये संयंत्र खड़े करेगी और 100 मेगावॉट के सोलर प्लांट्स को मंज़ूरी भी मिल चुकी है।

पस्त पड़ी DISCOM, सरकार UDAY योजना में करेगी बदलाव

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री का कहना है की बिजली दरों की नई नीति के साथ साथ जल्द ही उदय योजना के नये संस्करण (UDAY 2) का ऐलान होगा। इसका प्रमुख उद्देश्य बिजली वितरण कंपनियों (DISCOM) के घाटे को कम करना है। नई नीति के तहत सरकार बिजली जाने पर (लोड शेडिंग) पेनल्टी का प्रावधान करेगी। इसके अलावा केंद्र या राज्य से मदद पाने के लिये कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उन्होंने अपनी हालत सुधारने के लिये क्या कदम उठाये। बिजली चोरी रोकने के लिये नये पुलिस स्टेशन भी बनाये जायेंगे।   उधर केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने प्रस्ताव रखा है कि DISCOM बिजली कंपनियों को 50% अग्रिम भुगतान यानी एडवांस पेमेंट करें ताकि कंपनियों पर दबाव कम रहे।  

काला धुंआं छोड़ने वाली योजनाओं में 5000 करोड़ डॉलर का निवेश

ऊर्जा क्षेत्र की हलचल और बाज़ार पर उसके असर पर नज़र रखने वाले थिंक टैंक कार्बन ट्रैकर का नया विश्लेषण बताता है कि बड़ी तेल और गैस कंपनियों ने पिछले एक साल में करीब 5000 करोड़ डालर के नये जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) प्रोजेक्ट मंज़ूर किये हैं।  इससे धरती की तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री की सीमा में रखा पाना मुमकिन होगा। इन बड़ी कंपनियों में बीपी, शेल, एक्सियॉन मोबिल और शेवरॉन जैसी कंपनियां हैं। रिपोर्ट बताती है कि इन कंपनियों का 30% निवेश ही तापमान को 1.6 डिग्री बढ़ाने के लिये काफी होगा।  रिपोर्ट कहती है कि ये सभी प्रोजेक्ट उन निवेशकों और कंपनियों के लिये चुनौती हैं जो ग्लोबल वॉर्मिंग की चुनौतियों से लड़ने के लिये कमर कस रहे हैं।