ज़ीरो इमीशन ट्रांसपोर्ट: ड्रैगन की नज़र में है हाइड्रोज़न

Newsletter - June 25, 2019

हाइड्रोज़न से क्या मुमकिन है? चीन को लगता है कि हाइड्रोज़न पर सफर किया जा सकता है लेकिन टेस्ला जैसी कंपनियों ने इस पर सवाल खड़े किये हैं। फोटो – चायनाडेली

ज़ीरो इमीशन ट्रांसपोर्ट: ड्रैगन की नज़र में है हाइड्रोज़न

ऐसा लगता है कि प्रदूषण मुक्त परिवहन के लिये चीन हाइड्रोज़न गैस को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की सोच रहा है। बैटरी वाहनों के जनक कहे जाने वाले वॉन गंग ने ब्लूम्सबर्ग को दिये इंटरव्यू में कहा है कि हाइड्रोज़न से चलने वाले वाहन व्यवहारिक होंगे क्योंकि ईंधन के रूप में इसकी रीफ्यूलिंग आसान है। खासतौर से लम्बी दूरी तय करने वाले वाहनों जैसे बस और ट्रक के लिये यह काफी उपयोगी रहेगा।

दुनिया में बिकने वाले कुल बैटरी वाहनों में 50% से अधिक चीन में बिकते हैं और हाइड्रोज़न का इस्तेमाल इस सेक्टर में क्रांति ला सकता है। वैसे अभी इस ईंधन को लेकर बहस भी चल रही है। जहां जापान ने इसका सफल प्रयोग किया है वहीं नार्वे में एक फ्यूल स्टेशन में हुये विस्फोट से हाइड्रोज़न के सुरक्षित प्रयोग को लेकर आशंका भी पैदा हुई है। बैटरी वाहनों के मामले में अव्वल कंपनी टेस्ला के सीईओ एलन मस्कईंधन के रूप में हाइड्रोज़न को मुमकिन नहीं मानते वहीं टोयोटा, ह्युन्दई और होन्डा जैसी कंपनियां इस ईंधन के पक्ष में हैं।


क्लाइमेट साइंस

तंदूर बनी धरती: जहां कुवैत और सऊदी अरब जैसे देश भट्टी की तरह तप रहे हैं वहीं हिमालयी ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने की ख़बर से चिंता बढ़ गई है। फोटो – मशाबेल

हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हुई!

साइंस जर्नल “साइंस एडवांसेज” में छपी रिसर्च से पता चलता है कि हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार लगभग दो गुना हो गई है। वैज्ञानिकों और कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि यह बदलाव पिछले दो दशकों में देखा गया है। हिमालयी ग्लेशियरों से अब हर साल 800 करोड़ टन बर्फ गायब हो रही है और पर्याप्त हिमपात न होने की वजह से उसकी भरपाई नहीं हो पा रही।

करीब 2000 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हिमालय पर्वत श्रंखला में 10 हज़ार से अधिक छोटे बड़े ग्लेशियर हैं जिनमें कुल 60,000 करोड़ टन बर्फ जमा है। वैज्ञानिकों ने पिछले 40 साल के आंकड़ों का मिलान अमेरिकी खुफिया सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों के साथ किया और पाया कि जिस रफ्तार से 1975 और 2000 के बीच ग्लेशियर पिघले उसकी दुगनी रफ्तार से 2003 और 2016 के बीच पिघल रहे हैं।

दुनिया भर में गर्मी की मार; कुवैत, सऊदी अरब बने भट्टी 

जून के महीने में दुनिया के तमाम देश भट्टी की तरह तपते रहे। कुवैत और सऊदी अरब में तापमान सबसे अधिक रहा। कुवैत में तापमान 52°C से अधिक नापा गया और सीधे सूरज के नीचे तो यह 63°C रहा, जबकि सऊदी अरब के अल-मजमाह में तापमान 55°C पहुंच गया। भारत में एक ओर जहां भीषण गरमी से तमाम जगह पानी की भारी किल्लत हो गई है वहीं बिहार में हीट-वेव से 4 दिनों के भीतर ही 142 लोगों के मरने की ख़बर आई।

इस साल मार्च के महीने से गर्मी का जो प्रचंड रूप दिखना शुरू हुआ उसके बाद करीब 100 दिन के भीतर 22 राज्यों में 73 से अधिक जगह हीटवेव की मार दिखी है। यह डर है कि इस सदी के अंत तक आधी दुनिया में हर साल तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहेंगे। 

अरब सागर में बढ़ रही है चक्रवाती तूफानों की मार 

गुजरात चक्रवाती तूफान वायु की मार से बाल-बाल बचा लेकिन जानकार कहते हैं कि आने वाले दिनों में ऐसे तूफानों से विनाशलीला लगातार बढ़ेगी। आशंका है किआमतौर पर शांत रहने वाले भारत के पश्चिमी तट पर अब अधिक संख्या में साइक्लोन टकरायेंगे। चक्रवाती तूफानों की बढ़ती संख्या आने वाले दिनों के संकट की ओर इशारा करती है। जहां 1998 से 2013 के बीच 5 बड़े चक्रवाती तूफान भारत में आये वहीं पिछले 8 महीनों में ही तितली, गज और फानी जैसे तूफानों ने ज़बरदस्त तबाही की है।

2019 का जून होगा सबसे खुश्क महीना

आंकड़े बताते हैं कि बरसात के मौजूदा हाल को देखते हुये जून सबसे खुश्क महीनाहोना तय है। देश में जून से सितंबर के 3 महीनों को मॉनसून सीज़न कहा जाता है और सामान्य तौर पर जून में कुल मॉनसून का 17% पानी बरसता है लेकिन जून में पिछले साल के मुकाबले इस साल 44% बारिश हुई है। सवाल है कि क्या जुलाई और अगस्त में इस साल हुई कम बरसात की भरपाई हो पायेगी। 

कनाडा में पर्माफ्रॉस्ट के बदलते हालात से वैज्ञानिक चकित 

ग्लोबल वॉर्मिंग पर नज़र रखे वैज्ञानिकों ने पाया है कि कनाडा में ध्रुवीय बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट अनुमानित समय से 70 साल पहले ही पिघलने लगी है। यह जलवायु परिवर्तन का एक और विनाशकारी लक्षण है। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि हर साल पड़ रही असामान्य गर्मी हज़ारों साल से जमे विशाल हिमखंडों को पिघला रही है। इस पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से कई हज़ार टन ग्रीन हाउस गैसें (मीथेन इत्यादि) रिलीज़ होंगी जो धरती का तापमान और बढ़ायेंगी। 


क्लाइमेट नीति

पानी का अकाल: पानी की कमी भारत के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। सरकार खुद मानती है कि हर साल 2 लाख लोग पानी न मिलने से मर रहे हैं। फोटो – विकीमीडिया

हाहाकार के बीच सरकारी झुनझुना: सबको मिलेगा 2024 तक पीने का पानी

देश के तकरीबन हर हिस्से में पिछले दो महीनों में पानी के लिये हाहाकार मचा रहा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया है कि 2024 तक सारे घरों में पीने का पानी पहुंचेगा। पूरे देश में भूजल के स्तर में 54% तक गिरावट आई है। नीति आयोग ने कहा है कि अगले साल यानी 2020 तक 21 शहरों में ग्राउंड वाटर खत्म हो जायेगा।चेन्नई के सारे सरोवर सूख गये हैं और वहां लोगों के पास पानी नहीं है। सरकारी आंकड़े यह स्वीकार कर रहे हैं कि हर साल साफ पीने का पानी न मिलने से 2 लाख लोगों की मौत होती है और 2030 तक देश में पीने के पानी की मांग दोगुनी हो जायेगी।

2050 तक ‘कार्बन-न्यूट्रल’ के लक्ष्य पर यूरोपीय देशों में सहमति नहीं 

सितंबर में न्यूयॉर्क में हो रहे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पहले यूरोपीय यूनियन के बीच इस बात पर सहमति नहीं बन पाई कि 2050 तक EU के सभी देश कार्बन न्यूट्रल (यानी नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन) होने का वादा करें या नहीं। इस मकसद को हासिल करने के लिये साफ ऊर्जा के उत्पादन को कई गुना बढ़ाने और जंगलों के क्षेत्रफल में विस्तार की ज़रूरत है। लेकिन कोयले के इस्तेमाल पर निर्भर चेक गणराज्य, एस्टोनिया, हंगरी और पोलैंड ने इस प्रस्ताव पर अडंगा लगा दिया।

इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुट्रिस ने सभी देशों से 2030 के क्लाइमेट लक्ष्य को बढ़ाने की अपील की थी। अमेरिका और चीन के बाद यूरोपीय यूनियन का कार्बन उत्सर्जन सबसे अधिक है और ट्रांसपोर्ट, कृषि और निर्माण में बढ़ोतरी की वजह से उसका कार्बन इससे पहले इमीशन तेज़ी से बढ़ रहा है।

प्लास्टिक उत्पादन ने भी बढ़ाया 2018 में CO2 उत्सर्जन

विश्व बाज़ार में पिछले साल प्लास्टिक उत्पादन में उछाल भी CO2 गैस के उत्सर्जन में बढ़ोतरी के लिये ज़िम्मेदार रहा। यह बढ़ोतरी 2011 के बाद से अब तक सर्वाधिक थी। बीपी एनर्जी के विश्लेषण से पता चलता है कि चीन, भारत और अमेरिका का उत्सर्जन 2018 में सबसे अधिक रहा।

जंगल: केरल से अच्छी ख़बर पर अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य में पिछड़ा भारत

केंद्र सरकार पेरिस समझौते के तहत देश में जंगल लगाने के वादे में पिछड़ रही है। 2015 की पेरिस डील में भारत ने कहा है कि 2030 तक वह ढाई से तीन खरब टन कार्बन सोखने लायक जंगल (कार्बन सिंक) लगायेगा पर ऐसा होता नहीं दिख रहा। उधर केरल के एक छोटे से कस्बे कोडुंगलूर से थोड़ी उम्मीद जगी है जहां नगरपालिका ने तय किया है कि अगर आप कोडुंगलूर में अपना घर पंजीकृत करना चाहते हैं तो आपको आम और कटहल का एक-एक पेड़ लगाना पड़ेगा। कोडुंगलूर की नगरपालिका ने भवन निर्माण के साथ वृक्षारोपण पर नज़र रखने के लिये यह मुहिम चलाई है।


वायु प्रदुषण

बिगड़ती हवा: मुंबई की हवा न केवल प्रदूषित हो रही है बल्कि उसकी क्वॉलिटी दिल्ली जैसे दमघोंटू शहरों से भी बदतर हो रही है। फोटो – DNA इंडिया

मुंबई की हवा में अधिक देर तक रहते हैं हानिकारक कण

सिस्टम ऑफ एयर क्वॉलिटी, वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR) के शोध से पता चला है कि छोटे और जानलेवा कण मुंबई की हवा में काफी देर तक रहते हैं। PM 2.5 और PM 10 जैसी हानिकारक कणों का प्रतिशत यहां की हवा में दिल्ली के मुकाबले अधिक पाया गया। ऐसे कण जो हमारे शरीर के भीतर आसानी से दाखिल हो सकते हैं वह यहां दिल्ली के मुकाबले अधिक थे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक 2018 में मुंबई में PM 10  पिछले 20 सालों के उच्चतम स्तर पर था और यह पिछले कई सालों से लगातार बढ़ रहा है।

 रसोईघर के धुएं से मर रहे हैं 2.7 लाख लोग  

कैलिफोर्निया और बर्कले विश्वविद्यालय की आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर की गईरिसर्च में पता चला है कि चूल्हों में जलने वाले लकड़ी, कोयला, उपले और मिट्टी के तेल से होने वाला प्रदूषण लाखों लोगों की जान ले रहा है। इस प्रदूषण को रोककर भारत हर साल करीब 2.7 लाख लोगों की जान बचा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि घरों के भीतर का प्रदूषण रोककर वायु प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों में 13% कमी की जा सकती है।

 सीमेंट उद्योग कर रहा है दुनिया भर के ट्रकों से अधिक प्रदूषण 

वैज्ञानिकों का कहना है कि सीमेंट के कारखाने दुनिया भर में उत्सर्जित होने वाली कुल 7% CO2 के लिये ज़िम्मेदार हैं। यह उत्सर्जन दुनिया के सभी ट्रकों से होने वाले प्रदूषण से अधिक है। ईंट के भट्टों का तापमान 1400ºC तक पहुंच जाता है और एक टन सीमेंट करीब आधा टन CO2 छोड़ता है। इतनी कार्बन डाइ ऑक्साइड शिमला से गोवा तक जाने वाली सामान्य कार भी नहीं छोड़ती।


रिन्यूएबिल

निवेशक गायब: बिजली खरीद और भुगतान की गारंटी न होने से निवेशकों ने TANGEDCO के टेंडरों में हिस्सा नहीं लिया। फोटो – चिदंबरमविलास

तमिलनाडु: सौर और पवन ऊर्जा के टेंडर बंद, केंद्र सरकार ने दिलाया भरोसा

पिछले दो सालों से निवेशक न मिलने के बाद अब तमिलनाडु बिजली बोर्ड TANGEDCO ने सौर और पवन ऊर्जा के टेंडर निकालना बन्द कर दिया है। बिजली खरीद और भुगतान के लिये बोर्ड की ओर से निवेशकों को भरोसा नहीं मिला पाया जिसकी वजह से किसी ने निविदाओं में रुचि नहीं दिखाई। अब राज्य में टेंडर सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) निकालेगा। उधर केंद्र सरकार ने निवेशकों को तय वक्त पर भुगतान के लिये एक कार्यक्रम तय करने और नीति में बदलाव का ऐलान किया है जिससे साफ ऊर्जा की मुहिम पर ब्रेक न लगे। 

2040 तक भारत होगा साफ ऊर्जा में अव्वल, पिछले साल 7.19 लाख लोगों को मिला रोज़गार

लंदन स्थित बीपी एनर्जी आउटलुक ने साफ ऊर्जा को लेकर काफी उम्मीद जगाने वाली भविष्यवाणी की है। दुनिया में 2040 तक कार्बन रहित ऊर्जा का इस्तेमाल कोयले से अधिक होगा। बीपी एनर्जी का कहना है कि भारत इस मामले में अग्रणी देश होगा। हालांकि टैक्स और कंपनियों को भुगतान जैसी ज़मीनी सच्चाईयों को देखकर ऐसा नहीं लगता क्योंकि सौर और पवन ऊर्जा में निवेश के लिये निकाले जा रहे कई टेंडरों को फिलहाल रद्द करना पड़ा है। 

उधर इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (IRENA) ने ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि साफ ऊर्जा से जुड़े क्षेत्र में पिछले साल 1.1 करोड़ लोगों को रोज़गार मिला। भारत में कुल 7.19 लोगों को रोज़गार मिलने की बात कही गई है। 

ओबेराय ग्रुप के दो होटलों में 100% सौर ऊर्जा का इस्तेमाल

ओबेराय ग्रुप ने घोषणा की है कि उसके गुड़गांव स्थित दोनों होटल पूरी तरह से सौर ऊर्जा से चल रहे हैं। इसके लिये हरियाणा के बालासर में एक कैप्टिव सोलर प्लांट बनाया गया है जो 7.5 मेगावॉट क्षमता का है जिसमें 27 हज़ार सोलर पैनल लगे हैं। ग्रुप का कहना है कि उसके ओबेराय और ट्राइडेंट होटल दिल्ली-एनसीआर में पूरी तरह साफ ऊर्जा पर चलने वाले पहले होटल हैं और सौर ऊर्जा के इस प्रयोग से कार्बन इमीशन में सालाना 12 हज़ार टन से अधिक की कटौती होगी।

फेसबुक ने किया साफ ऊर्जा में किया $ 41 करोड़ निवेशसोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने अमेरिका के टैक्सस में 41.6 करोड़ डॉलर का सोलर पार्क लगाने का फैसला किया है। बोस्टन की कंपनी लॉन्गरोड एनर्जी ने घोषणा की है कि वह फेसबुक के साथ एक प्रोजेक्ट तैयार कर रही है। इस सोलर पार्क से 379 मेगावॉट बिजली पैदा होगी। इससे करीब 72 हज़ार घरों को बिजली मिलेगी।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

2030 से केवल बैटरी वाहन: नीति आयोग एक बार फिर से अपना रुख बदल रहा है। क्या ऑटो निर्माता इस बदलाव के लिये तैयार हैं? फोटो – एनर्जी डिज़िटल

नीति आयोग: EV पर रजिस्ट्रेशन फी खत्म करने का प्रस्ताव

बैटरी वाहनों की बिक्री बढ़ाने के लिये नीति आयोग ने प्रस्ताव दिया है कि उनकारजिस्ट्रेशन फ्री होगा। आयोग ने अपना पुराना प्रस्ताव फिर से दोहराया है कि 2030 के बाद देश में केवल बैटरी वाहन ही बेचे जायेंगे। 

यह प्रस्ताव आयोग ने पहली बार 2017 में दिया लेकिन ऑटो इंडस्ट्री के दबाव के बाद मार्च 2018 में नियमों में ढील दी गई। तब सरकार ने 2030 का लक्ष्य 30% बैटरी वाहनों की बिक्री तक सीमित कर दिया गया। देश की सबसे बड़ी आटो निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने भी  2030 तक 100% बैटरी वाहनों के प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुये कहा है कि जब तक बैटरी वाहनों के पुर्जे बनाने में आत्मनिर्भरता न हो जायेहाइब्रिड वाहनों को ही बढ़ावा दिया जाना चाहिये।

ऑटो कंपनियों ने बिक्री बढ़ाने के लिये सरकार से नियमों में ढील मांगी 

बैटरी वाहन निर्माताओं ने सरकार से मांग की है EV वाहनों के देसी पुर्जे बनाने की यूनिट के लिये तय समय सीमा 6 से 9 महीने बढ़ाई जाये। अभी यह समय सीमा अप्रैल 2020 तक रखी गई है। इसी तरह देश के भीतर लीथियम आयन बैटरियां बनाने की डेडलाइन अप्रैल 2021 से बढ़ाकर अप्रैल 2023 करने की मांग भी ऑटो कंपनियों ने की है। भारत ने 2025 तक सभी दुपहिया और तिपहिया वाहनों को बैटरी चालित करने का लक्ष्य रखा है लेकिन वर्तमान हालात में देश के भीतर बने पुर्जों की पर्याप्त सप्लाई नहीं हो पा रही। 

ऑटो निर्माताओं ने फेम-II योजना के तहत दुपहिया वाहन पर मिलने वाली सब्सिडीको प्रति परिवार एक वाहन तक सीमित करने की शर्त हटाने को कहा है ताकि बैटरी दुपहिया वाहनों की बिक्री में तेज़ी लाई जा सके।


जीवाश्म ईंधन

धुंएं की ट्रम्प: अगले साल चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने कोयला बिजलीघरों को नियमों में छूट दी है। हालांकि उनके अपने देश में साफ ऊर्जा के लिये आवाज़ लगातार बुलंद हो रही है। फोटो – साउथईस्टकोलएश

ट्रम्प ने दिया ‘क्लीन एनर्जी मिशन’ को झटका, राज्यों के भरोसे छोड़ा अभियान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा का वह आदेश वापस ले लिया है जिसमें कोयला बिजलीघरों को अपने कार्बन उत्सर्जन में साल 2030 तक 32% कटौती करना ज़रूरी था। यह कटौती बिजलीघर से 2005 में हो रहे उत्सर्जन के आधार पर तय होनी थी। नये प्लान का नाम “एक्सिसबल क्लीन एनर्जी” है और यह कोल पावर प्लांट्स को अपनी लक्ष्य को तय करने के लिये 3 साल का वक्त देता है। इस मामले में सरकार ने पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) को फैसला लेने के अधिकार दिये हैं।

ट्रम्प के इस फैसले को साफ ऊर्जा मुहिम के लिये झटका और कोयला बिजलीघरों के लिये एक जीवनदान माना जा रहा है। महत्वपूर्ण है कि इसी महीने पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ट्रम्प प्रशासन पर समुद्र में तेल प्रदूषण से जुड़ी पाबंदियों को ढीला करने के लिये मुकदमा किया है।

यूनाइटेड किंगडम: कोयले-गैस से बिजली उत्पादन में करीब 50% की कमी

यूनाइटेड किंगडम में इस साल की पहली छमाही में तेल और गैस से बिजली उत्पादन कुल ऊर्जा का करीब 47% रहा जबकि साफ ऊर्जा का हिस्सा 48% हो गया। यूके ने इस कामयाबी को हासिल करने के लिये दो हफ्ते तक सारी बिजली सौर, पवन और जल विद्युत संयंत्रों से बनाई। देश के सेंट्रल पावर ग्रिड का कहना है कि आगे भी पूरे साल साफ ऊर्जा का ही ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल किया जायेगा।

हालांकि निराश करने वाली बात यह है कि अपने देश के भीतर साफ ऊर्जा को युद्धस्तर पर बढ़ावा दे रहा यूके 2013 से ही विकासशील देशों में कोयला और गैस बिजलीघर लगाने के लिये सालाना 320 करोड़ डॉलर कर्ज़ दे रहा है। 

प्रदूषित करने वाले जहाज़ों को कर्ज़ पर होंगी शर्तें, हवाई जहाज के ईंधन पर टैक्स का प्रस्ताव  

दुनिया के 11 बड़े बैंकों ने फैसला किया है कि उन व्यापारिक जहाजों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन की मॉनिटरिंग होगी जिन्हें बिजनेस लोन दिया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक इन जहाजों को 2008 में निकलने वाले धुंयें के मुकाबले अपना कार्बन इमीशन 50% कम करना था।

उधर नीदरलैंड और स्वीडन के मंत्रियों ने यूरोपीय संघ के देशों से कहा है कि यूरोप में व्यापारिक संतुलन के लिये हवाई जहाज के ईंधन पर टैक्स लगे। यूरोपियन कमीशन के अध्ययन में पता चला है कि एयरलाइंस ने अपनी उड़ानों की संख्या बढ़ा कर प्रदूषण में बढ़ोतरी की है लेकिन इन कंपनियों से बहुत कम ईंधन टैक्स लिया जा रहा है।