क्यों बार-बार बेकाबू हो जाती है बाढ़?

Newsletter - August 20, 2020

काबू से बाहर: शहरों में ऐसे हालात के लिये सिर्फ एक्सट्रीम वेदर ही नहीं बल्कि जल निकायों का खत्म होना और ख़राब कचरा प्रबंधन भी जिम्मेदार है | Photo: Flickr

क्यों बार-बार बेकाबू हो जाती है बाढ़?

इस हफ्ते दिल्ली और एनसीआर में पानी से भरी सड़कों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि आखिर हमारे शहर ज़रा सी देर की बारिश क्यों नहीं झेल पाते। यही नज़ारा इस साल मुंबई में दिखा। असल में मुंबई में पहली बार 2005 में आई बाढ़ ने यह पोल खोली थी कि किसी भी एक्सट्रीम वेदर की स्थित को हमारे शहर नहीं झेल सकते। फिर 2013 की केदारनाथ आपदा, 2015 में चेन्नई की बाढ़, 2018 में केरल और 2019 में पटना को कौन भूल सकता है।  क्या यह सिर्फ मौसम के बदलाव या जलवायु परिवर्तन का असर है या फिर बाढ़ आपदा प्रबंधन की कमी इसके लिये ज़िम्मेदार है। 

जानकार कहते हैं कि बाढ़ खुद में आपदा नहीं है बल्कि कुछ हद तक बाढ़ खेतीहर ज़मीन की उर्वरता को बनाये, ग्राउंड वॉटर रिचार्ज और तालाब-सरोवरों जैसे जल निकायों को रिचार्ज करने के लिये ज़रूरी भी है लेकिन पिछले कुछ वक्त में बाढ़ अप्रत्याशित हो गई हैं और उनका प्रभाव क्षेत्र ग्रामीण इलाकों में ही नहीं बल्कि शहरों में बढ़ता गया है।  बाढ़ से होने वाला नुकसान जान माल से लेकर सम्पत्ति तक हर जगह दिखता है। सरकारी आंकड़े ही इस बात की तसदीक करते हैं।  

संसद में सरकार के दिये आंकड़ों के मुताबिक साल 2018 में 1808 लोगों की जान बाढ़ के कारण गई और 95,000 करोड़ रुपये का माली नुकसान हुआ।  असम सरकार का कहना है कि 1947 के बाद से अब तक कम से कम 1.25 लाख परिवारों ने या तो अपनी रिहायशी ज़मीन खो दी है या फिर कृषि भूमि या फिर कई मामलों में दोनों तरह की भूमि। 

हालांकि बाढ़ से निपटने के लिये सरकार की कई एजेंसियां हैं लेकिन उनमें तालमेल की काफी कमी है। एक समस्या बाढ़ प्रभावित इलाकों का दायरा तय करने और समझने की भी है। सरकारी दस्तावेज़ों में  भारत की कुल 12% भूमि पर बाढ़ का ख़तरा है लेकिन जानकार कहते हैं कि यह डाटा 30-40 साल पुराना है जो कि 70 के दशक में बनाये गये बाढ़ आयोग ने दिया था। अब हालात काफी बदल चुके हैं और चुनौती काफी गंभीर है।

मौसम और जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ मानते हैं कि बहुत अधिक बरसात कम वक्त में हो रही है जिससे कई कस्बाई और शहरी इलाकों में बाढ़ की समस्या के विकराल हो जाती है लेकिन नगर पालिका स्तर पर निकम्मापन, ज़मीन पर क़ब्ज़ा, बेतरतीब निर्माण और खराब कचरा प्रबंधन इस संकट के लिये ज़िम्मेदार है।  मिसाल के तौर पर दिल्ली और तमाम छोटे-बड़े शहरों में सैकड़ों में सरोवर हुआ करते थे जो बाढ़ के दौरान निकासी और संग्रह का काम करते थे लेकिन अब या तो वह बेतरतीब निर्माण के लिये अतिक्रमण की भेंट चढ़ गये हैं या कचरे के  ढेर से भर दिये गये हैं।


क्लाइमेट साइंस

बाढ़ की विभीषिका सिर्फ फिर सब पानी-पानी: जुलाई में अपेक्षाकृत कम बारिश के बाद अगस्त के महीने में जमकर बारिश हुई है। कई राज्यों को बाढ़ का सामना करना पड़ा है | Photo: The News Minute

‘खुश्क जुलाई’ के बाद अगस्त में जमकर बरसा पानी

जुलाई में कम बारिश के बाद अगस्त के दूसरे हफ्ते में जमकर बरसात हुई। उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत  में 11 से 14 अगस्त के बीच हुई अच्छी बारिश के बाद अब तक इस साल कुल 103% बरसात रिकॉर्ड (दीर्घ काल औसत – LPA) की गई है। इस साल (12 अगस्त तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक) देश के 11 राज्यों में  868 लोगों की जान बाढ़ में गई। इसी अवधि  पिछले साल कुल 908 लोगों की जान बाढ़ ने ली थी। जहां कर्नाटक में अब तक 12 लोगों की जान गई और 3,500 करोड़ का नुकसान हुआ वहीं केरल में लगातार तीसरे साल बाढ़ का प्रकोप रहा। इडुक्की ज़िले के पेट्टीमुडी में पिछले 6 अगस्त को भूस्खलन में 70 लोगों की जान चली गई। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने महाराष्ट्र, चंडीगढ़, उड़ीसा और तेलंगाना के इलाकों में अलर्ट जारी किया है। 

कोरोना:  संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट साइंस रिपोर्ट में देरी 

कोरोना महामारी के कारण आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त के वैज्ञानिकों का पैनल) की क्लाइमेट साइंस रिपोर्ट में देरी हो रही है। इसका पहला हिस्सा अगले साल नवंबर में होने वाले ग्लासगो सम्मेलन से पहले जारी कर दिया जायेगा लेकिन रिपोर्ट के दो अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों का प्रकाशन तब तक नहीं हो पायेगा। रिपोर्ट के यह सेक्शन क्लाइमेट चेंज के असर और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रोकने के बारे में हैं।   

चीन में तापमान वृद्धि दर 0.5 डिग्री/दशक से अधिक 

एक नये शोध में पता चला है कि चीन के कई हिस्सों में प्रति दशक तापमान वृद्धि 0.5 डिग्री से अधिक है। देश के अलग अलग हिस्सों में लगाये गये 2479 वेदर स्टेशनों से लिये गये डाटा के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है। इन वेदर स्टेशनों से 1958 और 2017 के बीच दर्ज डाटा का विश्लेषण किया गया। इस शोध में यह भी पाया गया कि पिछले 60 साल में सर्दियों में वॉर्मिंग सबसे अधिक है। तापमान बढ़ने के मामले में इसके बाद वसंत, पतझड़ और फिर गर्मियां रहीं। 

ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण गर्म इलाकों की मिट्टी छोड़ेगी कार्बन 

कार्बन उत्सर्जन से ग्लोबल वॉर्मिंग की बात तो सभी जानते हैं लेकिन अब एक रिसर्च बताती है कि इसका उलट भी सच हो रहा है। इस शोध के मुताबिक धरती के बढ़ते तापमान के कारण गर्म इलाकों के जंगलों की मिट्टी अधिक कार्बन छोड़ रही है। यह उत्सर्जन ऊंचे पहाड़ों के जंगलों के मुकाबले अधिक है जबकि पहले यह माना जाता रहा है कि गर्म क्षेत्रों में जंगलों की मिट्टी पर ऊंचाई पर बसे जंगलों के मुकाबले वॉर्मिंग का कम प्रभाव पड़ता है।  शोध में अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी को दो साल तक गर्म (4 डिग्री तापमान) वातावरण में रखा गया और पता चला कि सामान्य तापमान के मुकाबले 55% अधिक CO2 उत्सर्जन हुआ। 


क्लाइमेट नीति

विरोधाभास : वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने किसानों से कहा है वह अपनी ज़मीन पर पेड़ लगायें, लेकिन दिल्ली की एक लॉ फर्म के विश्लेषण में यह पाया गया है कि पिछले साल 500 हेक्टेयर संरक्षित वनों की भूमि विकास कार्यों के लिये हस्तांतरित की गई | Photo: Delhi Greens

ड्राफ्ट EIA-2020: एनडीए सदस्यों के विरोध के बावजूद संसदीय पैनल में चर्चा

पर्यावरण आकलन के नये प्रस्तावित नियमों को लेकर पिछले पखवाड़े एक नया विवाद तब खड़ा हुआ  एक संसदीय पैनल ने ईआईए ड्राफ्ट- 2020 पर चर्चा शुरू कर दी। साइंस, टेक्नोलॉजी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन के मामलों पर बनी इस संसदीय समिति के अध्यक्ष कांग्रेस नेता जयराम रमेश हैं जो खुलकर नये प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। बीजेपी और एनडीए के सांसद इससे नाराज़ हैं क्योंकि वह फाइनल ड्राफ्ट आने के बाद ही चर्चा चाहते हैं। इन सदस्यों ने यह भी कहा कि ड्राफ्ट अभी हिन्दी भाषा में उपलब्ध नहीं है हालांकि पैनल के अध्यक्ष रमेश ने यह कहकर चर्चा शुरू कर दी है कि कमेटी तुरंत अपनी सिफारिशें नहीं दे रही और इसमें वक्त लगेगा। 

ड्राफ्ट EIA-2020: सरकार के मुताबिक प्रावधानों में कुछ ग़लत नहीं 

उधर केंद्रीय पर्यावरण सचिव आर पी गुप्ता के मुताबिक ड्राफ्ट ईआईए -2020 के प्रावधानों में परेशान होने वाली कुछ बात नहीं है। सरकार को कुल 2 लाख आपत्तियां और कमेंट मिले हैं लेकिन गुप्ता ने हिन्दुस्तान टाइम्स को दिये इंटरव्यू में साफ कहा है कि पर्यावरण को लेकर व्यक्त की जा रही चिंताओं को उनकी मैरिट के आधार पर सुना जायेगा और नये सिरे से विमर्श की कोई ज़रूरत नहीं है उससे “मुद्दों का नया पिटारा” खुल जायेगा।  पर्यावरण सचिव ने कहा कि हर प्रोजेक्ट में पर्यावरण अनुमति के लिये जन सुनवाई की ज़रूरत नहीं है। गुप्ता के मुताबिक किसी भी प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। 

संरक्षित जंगलों की 500 हेक्टेयर ज़मीन पर विकास प्रोजेक्ट 

नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ ने पिछले साल (2019 में) जंगलों के कुल 481.56 हेक्टेयर संरक्षित इलाके में विकास कार्य शुरु करने की इजाज़त दी। यह बात पर्यावरण कानूनों पर काम करने वाली एक फर्म, लीगल इनीशिएटिव फॉर फॉरेस्ट एंड इन्वायरेंमेंट – के विश्लेषण में सामने आयी है।  जिस ज़मीन में डेवलपमेंट प्रोजेक्ट शुरू हो रहे हैं उस पर वन्य जीव अभ्यारण्य, नेशनल पार्क और कन्जर्वेशन रिज़र्व हैं। बोर्ड ने रेलवे, सिंचाई और खनन के कुल 68 प्रोजेक्ट के लिये संरक्षित वन भूमि पर काम की इजाजत दी है। नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ 1972 में वाइल्ड लाइफ एक्ट के तहत बनाई गई वैधानिक बॉडी है जिसका काम सरकार को नीतिगत योजना और वन्य जीव संरक्षण पर सरकार को सलाह देना है। 

वन मंत्री ने दी किसानों को पेड़ लगाने की सलाह

पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने किसानों से अपनी ज़मीन पर पेड़ लगाने को कहा है, जिन्हें बाद में बेचा जा सके। जावड़ेकर ने राज्यों के वन मंत्रियों  के साथ बैठक में ये बात कही। उन्होंने कहा कि हर राज्य अपने एक जंगल में कैम्पा फंड की मदद से जल और पशु-चारा संबंधित प्रोजेक्ट चलाये।


वायु प्रदुषण

इकोनोमी से ऊपर है पर्यावरण: मद्रास हाइकोर्ट ने टुथकुंडी में कॉपर स्मेल्टर दोबारा खोलने की वेदांता की याचिका को खारिज करते हुये कहा है कि प्रदूषण करने वाले को कीमत चुकाने ही चाहिये | Photo: The New Indian Express

मद्रास हाइकोर्ट ने “स्थाई रूप से बन्द” किया वेदांता का प्लांट

मद्रास हाइकोर्ट ने वेदांता की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें कंपनी ने अपने कॉपर स्मेल्टर   को फिर से चलाने की अनुमति मांगी थी।  यह प्लांट दो साल पहले 13 प्रदर्शनकारियों की पुलिस फायरिंग में मौत के बाद बन्द किया गया था। वेदांता का कहना है कि उस पर पर्यावरण को क्षति पहुंचाने आरोप गलत हैं और पुलिस फायरिंग के बाद प्लांट को बतौर “राजनीतिक कार्रवाई” बन्द किया गया है। हालांकि अदालत ने अपना आदेश प्रदूषण पर आधारित रखा और कहा है “प्रदूषण करने वाले भुगते” सिद्धांत लागू होना चाहिये। साल 2018 में हज़ारों लोग दक्षिण भारत के टूथकुंडी में वेदांता के खिलाफ सड़कों पर उतरे। वेदांता ने अपनी याचिका में कहा कि प्लांट का बन्द होना “अर्थव्यवस्था पर चोट” है लेकिन कोर्ट ने 815 पन्नों के फैसले में कहा, “अदालतों का हमेशा मानना रहा है कि जब भी अर्थव्यवस्था और पर्यावरण में से किसी एक को चुनना हो तो पर्यावरण सर्वोपरि है।” 

मुंबई को “गैस चेंबर” बनाने के लिये पेट्रो कंपनियों पर जुर्माना 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मुंबई के अंबापाड़ा, महुल और चेम्बूर को “गैस चेंबर” बनाने के लिये पेट्रोलियम कंपनियों पर कुल 286 करोड़ रूपये का जुर्माना किया है। कोर्ट ने यह जुर्माना बीपीसीएल और एचपीसीएल समेत चार कंपनियों पर लगाया है जिन पर हवा में प्रदूषण करने वाला वोलेटाइल ऑर्गेनिक कम्पाउंड (वीओसी) फैलाने के लिये लगाया गया है। साल 2015 में अंबापाड़ा, महुल और चेम्बूर के निवासियों पर एक सर्वे किया गया जिसमें यहां बड़ी संख्या में लोगों ने सांस की तकलीफ की शिकायत की। महुल में 67.1% लोगों ने महीने में 3 से अधिक बार सांस की तकलीफ की शिकायत की। 76.3% लोगों ने कहा कि सभी मौसमों में उन्हें तकलीफ होती है। इसके अलावा 86.6% लोगों ने आंख में जलन और 84.5% लोगों ने छाती में दर्द की शिकायत की। 

सीमेंट निर्माताओं को फ्लाई ऐश सप्लाई करेगा NTPC 

सरकारी पावर कंपनी NTPC ने बिजलीघरों से निकलने वाली खतरनाक फ्लाई ऐश को सीमेंट बनाने वाली कंपनियों को भेजना शुरू कर दिया है। NTPC ने 3000 मेगावॉट के रिहन्द पावर प्लांट से यूपी के अमेठी फ्लाई ऐश भेजी। प्लांट के पास सूखी राख रेलवे बोगियों में लादने की सुविधा है। जानकार कहते हैं कि इस कदम से सिंगरौली-सोनभद्र इलाके में लगातार जमा हो रही खतरनाक फ्लाई ऐश का दबाव कम किया जा सकता है। यूपी-मध्यप्रदेश बॉर्डर पर इस क्षेत्र में 9 बड़े थर्मल पावर स्टेशन हैं जिनमें 3 सरकारी कंपनी NTPC के प्लांट हैं। यूपी और मध्य प्रदेश में कुल 51,000 मेगावॉट क्षमता के पावर स्टेशन हैं जिनमें आधी बिजली सोनभद्र-सिंगरौली के इलाके में पैदा होती है। 

लॉकडाउन के बाद बिके दोयम दर्जे के BS-IV वाहनों का पंजीकरण नहीं 

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में बिके उन सभी खराब क्वॉलिटी के BS-IV वाहनों के पंजीकरण के लिये अनुमति देने से मना कर दिया है जिन्होंने रजिस्ट्रेशन के लिये 31 मार्च की समयसीमा का पालन नहीं किया। हालांकि देश के दूसरे हिस्सों में मार्च में बिके वो वाहन पंजीकृत हो पायेंगे जिनका रजिस्ट्रेशन कोरोना लॉकडाउन की वजह से नहीं हो पाया था। कोर्ट ने यह फैसला ऑटो डीलर्स की लॉबी FADA द्वारा दायर उस शपथपत्र के बाद दिया जिसमें बिके वाहनों का विवरण था जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया है।


रिन्यूएबिल

‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ का ज़िक्र प्रधानमंत्री ने भले ही अपने भाषण में किया हो लेकिन इसकी राह में रोड़े आते रहे हैं | Photo: The Bihar Now

प्रधानमंत्री के भाषण में आया “वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर एक बार फिर से “वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड” का ज़िक्र किया। इस सोच को पहली बार प्रधानमंत्री मोदी ने 2018 में अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस की पहली बैठक में ज़ाहिर किया था। इसका मकसद पूरी दुनिया में एक ग्रिड के ज़रिये नॉन स्टॉर सोलर पावर सप्लाई का मिशन है। इस साल जून में रिन्यूएबिल एनर्जी मिनिस्ट्री ने इस आइडिया पर अमल करने के लिये सलाहकारों की नियुक्ति का प्रस्ताव रखा था। कई जानकार इसे चीन के वन बेल्ट, वन रोड प्रोजेक्ट का जवाब मानते हैं जिसमें चीन 70 से अधिक देशों में निवेश कर रहा है। सरकार ने सलाहकारों  की नियुक्ति का प्रस्ताव क्रियान्वित नहीं किया जिसके पीछे कोई साफ वजह नहीं बताई गई हालांकि  बिजनेस स्टैंडर्ड अख़बार के मुताबिक  कोरोना महामारी इस प्रस्ताव पर अमल न करने के पीछे एक वजह रही। वर्ल्ड बैंक इस प्रोजेक्ट के लिये तकनीकी सहयोग कर रहा है। 

ISA: पहला “ऑनलाइन” सम्मेलन 8 सितंबर को 

भारत और फ्रांस की साझेदारी से 2015 में लॉन्च हुए इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) की पहली वर्चुअल मीटिंग 8 सितम्बर को होगी। संभावना है कि इस ऑनलाइन वर्ल्ड सोलर टेक्नोलॉजी सम्मेलन में दुनिया की जानी मानी कंपनियों के प्रतिनिधि और नोबेल पुरस्कार पा चुके एक्सपर्ट शामिल होंगे। बड़े संभावित नामों में सॉफ्टबैंक के चीफ एक्सक्यूटिव मासायोशी सोन, टेस्ला के प्रमुख एलन मस्क और बर्टेंड पिकार्ड हैं जिन्होंने सौर ऊर्जा चालित विमान में दुनिया का चक्कर लगाया था।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ऑनलाइन सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। 

 साल 2020 की पहली छमाही में पवन और सौर ऊर्जा ने बनाया रिकॉर्ड  

 इस साल की पहली छमाही में पूरी दुनिया में उत्पादित कुल बिजली में सौर और पवन ऊर्जा की 10% हिस्सेदारी रही। इस दौर में कोल पावर में गिरावट भी दर्ज हुई लेकिन क्लाइमेट थिंक टैंक एम्बर के मुताबिक पेरिस समझौते के तहत तय किये गये लक्ष्य को हासिल करने के लिये अभी  काफी कुछ किया जाना है। यह स्टडी बताती है कि लॉकडाउन के दौरान बिजली की मांग 3% गिरी है लेकिन तब भी कुल बिजली उत्पादन की एक तिहाई कोयला बिजलीघरों से मिली। साल के पहले 6 महीनों में सोलर और विन्ड का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 14% बढ़ा जबकि कोल पावर में इसी दौर में पिछले साल की तुलना में 8.3% की कमी आई। शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने के लिये कोयला बिजली उत्पादन अगले 10 सालों (2030) तक 13% सालाना की दर से लगातार कम होना चाहिये।  

पहले से स्वीकृत प्रोजेक्ट को भी देनी पड़ सकती है इम्पोर्ट ड्यूटी 

सरकार पहले पास किये जा चुके सोलर पावर प्रोजेक्ट को चीन से उपकरण आयात करने पर इम्पोर्ट ड्यूटी में छूट से मना कर सकती है।  असल में “ग्रैंड फादर क्लॉज” के तहत इन प्रोजेक्ट्स के लिये कंपनियां चीन से आने वाले सामान पर लगने वाले कर में छूट का वादा था। इकॉनोमिक टाइम्स के मुताबिक अगर सरकार यह राहत नहीं देती तो वह प्रोजेक्ट “ख़तरे में पड़ सकते हैं” जिनकी प्लानिंग कम बजट में की गई है।  

अख़बार ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि वित्त मंत्रालय  ने ड्यूटी में छूट से मना कर दिया है लेकिन कहा है कि सरकार कोयला सेस जैसा कोई फॉर्मूला इजाद करेगी ताकि कंपनियां अपना घाटा पूरा कर सकें। ज़ाहिर है आखिरी चोट उपभोक्ता पर ही पड़ेगी।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

बदलाव की शुरुआत? दिल्ली और तेलंगाना ने औपचारिक रूप से बैटरी वाहन नीति को नोटिफाइ किया है | Photo: Saur Energy

दिल्ली और तेलंगाना में EV पॉलिसी लागू

दिल्ली सरकार ने आखिरकार बैटरी वाहन नीति को औपचारिक रूप से नोटीफाई कर दिया। इस नीति के तहत शहर में बिकने वाले कम से कम 25% वाहन इलैक्ट्रिक होंगे और इनकी खरीद पर 5000 रुपये प्रति किलोवॉट घंटा के हिसाब से छूट दी जायेगी। इस प्रकार बैटरी दुपहिया की खरीद पर 30,000 रुपये की अधिकतम छूट और बैटरी कार की खरीद पर 1,50,000 की छूट की सीमा तय की गई है। यह सब्सिडी पहले 1000 वाहनों पर लागू होगी। ड्राफ्ट पॉलिसी को 2018 में पहली बार नोटिफाइ किया गया था जिसका मकसद राजधानी के वायु प्रदूषण स्तर को कम करना है। 

उधर तेलंगाना ने भी EV पॉलिसी को लागू कर दिया है जिसके तहत सभी कैटेगरी के वाहनों पर छूट मिलेगी। राज्य सरकार का लक्ष्य है कि इस क्षेत्र में 30,000 करोड़ का निवेश आये।  इस धन से दिवितिपल्ली में एनर्जी पार्क लगा जायेगा ताकि बैटरी वाहन निर्माता राज्य में कारखाना लगायें। सरकार करीब 1.2 लाख रोज़गार पैदा करना चाहती है। संयोग से तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में पिछले साल के मुकाबले बैटरी वाहनों की बिक्री 23% बढ़ गई है और इस तेज़ी में घटी हुई जीएसटी दरों (12% से 5%) का भी असर है। 

मंत्रालय के सर्कुलर से वाहन निर्माता उलझन में 

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के नये सर्कुलर ने वाहन निर्माताओं को उलझन में डाल दिया है। इस सर्कुलर में कहा गया है कि ईवी को बिना बैटरी के बेचा और पंजीकृत किया जा सकता है। महत्वपूर्ण है कि इलैक्टिक वाहन में 30 से 40% कीमत बैटरी की ही होती है। ज़ाहिर है इस सर्कुलर का मकसद कार की अपफ्रंट कीमत में कमी लाना है। यह सर्कुलर सेंट्रल मोटर वेहिकल एक्ट (1989) के उस नियम से भी छूट देता है जिसके मुताबिक इलैक्ट्रिक वाहन बैटरी समेत एक टेस्टिंग एजेंसी द्वारा प्रमाणित होना चाहिये। 

लेकिन इस सर्कुलर ने कार निर्माताओं के लिये उलझन पैदा कर दी है क्योंकि फेम-II नीति के तहत बैटरी वाहनों की सब्सिडी कार में फिट होने वाली बैटरी क्षमता से जुड़ी है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय का सर्कुलर  इस मैकिनिज्म के उलट है। 

ह्युदंई ने पार किया 1000 किमी का बैरियर! 

कोरियाई कार निर्माता कंपनी ह्युंदई ने कहा है कि उसकी कोना इलैक्ट्रिक एसयूवी ने एक चार्जिंग में ही 1000 किलोमीटर का सफर किया। यह टेस्टिंग जर्मनी में की गई। यह दूरी बिना कार का एसी और स्टीरियो सिस्टम चलाये तय की गई। कुल 3 टेस्ट किये गये जिनमें हर बार 64 किलोवॉट-घंटा बैटरी इस्तेमाल की गई और कार की औसत रफ्तार 29-31 किलोमीटर थी।


जीवाश्म ईंधन

गंभीर संकट: मॉरीशस में जहाज से हुआ तेल रिसाव 15 किलोमीटर के दायरे में फैल गया है और इसे साफ करने में कई दशक लग सकते हैं | Photo: Sailors TV

मॉरीशस में हुये तेल रिसाव रोकने के लिये भारत ने टीम भेजी

मॉरीशस की मदद के लिये भारत ने तकनीकी उपकरणों के साथ विशेषज्ञों की टीम भेजी है। मॉरीशस में स्थानीय प्रशासन एक जापानी जहाज, एम वी वाकाशियो, से तेल के रिसाव के बाद पैदा हुये हालात से निपटने में जुटा है। यहां पिछली 25 जुलाई को यह जापानी जहाज हिन्द महासागर में एक कोरल रीफ (मूंगे की दीवार) से टकरा गया जिससे 1000 टन तेल समंदर में बिखर गया और पर्यावरणीय संकट की स्थिति पैदा हो गई है। इससे दुर्लभ कोरल और मछलियों के साथ समुद्री जीवों के लिये खतरा पैदा हो गया है और इसे मॉरीशस की सबसे विनाशकारी आपदा कहा जा रहा है।  

हालांकि क्षतिग्रस्त हिस्से को बाकी जहाज से अलग कर दिया गया है लेकिन मॉरीशस की नेशनल क्राइसिस कमेटी ने कहा है कि खराब मौसम के कारण जहाज से बाकी तेल हटाने का काम जोखिम भरा हो गया है। उधर एम वी वाकाशियों की मालिक कंपनी नागाशिकी शिपिंग ने कहा है कि उसे अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास है और वह मुआवज़े की प्रक्रिया में साथ देगी। 

ब्रिटिश पेट्रोलियम: तेल और गैस 40% काम बन्द होगा 2030 तक 

जानी मानी मल्टीनेशनल कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम (BP) 2030 तक तेल और गैस के 40% बिजनेस को बन्द कर देगी। कंपनी इन 10 सालों में अपने रिफाइनिंग के कारोबार को भी 30% कम करेगी। इससे पहले कंपनी ने 2050 तक कार्बन न्यूट्रल होने की बात कही थी।  कंपनी साफ ऊर्जा में 500 करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करेगी और उसका इरादा रिन्यूएबल पावर की वर्तमान क्षमता 2.5 गीगावॉट से बढ़ाकर 50 गीगावॉट करने का इरादा है।  BP यूनाइटेड किंगडम में बैटरी वाहन चार्जिंग स्टेशनों पर भी बड़ा निवेश कर रही है।