महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के 75% हिस्से में सूखा घोषित किया, राहत उपायों का ऐलान
महाराष्ट्र सरकार ने बारिश की कमी और फसलों पर पड़ते असर को देखते हुए राज्य के 358 में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। यानी राज्य के करीब तीन-चौथाई तालुका सूखे की चपेट में हैं। 1 जून से 26 सितंबर के बीच राज्य में 798.2 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य 970.9 मिमी से 18 प्रतिशत कम है। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में मराठवाड़ा और विदर्भ शामिल हैं।
सरकार ने सूखाग्रस्त तालुकों में भूमि राजस्व माफ करने, फसल ऋण के पुनर्गठन और कृषि ऋण की वसूली स्थगित करने जैसे उपायों की घोषणा की है। कृषि पंपों के बिजली बिल में रियायत, छात्रों की परीक्षा फीस माफी और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी की जाएगी। जिला कलेक्टर फसलों के नुकसान का सर्वेक्षण शुरू करेंगे।
फसल नुकसान का मुआवजा सर्वेक्षण पूरा होने के बाद अलग आदेश से घोषित किया जाएगा। सरकार ने पानी बचाने के काम शुरू करने और जरूरत वाले इलाकों में टैंकरों से पेयजल उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए हैं।
नेपाल ने भारत-चीन के साथ ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ का प्रस्ताव रखा
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने भारत और चीन के साथ मिलकर ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन सीमाओं को नहीं पहचानता और हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग जरूरी है।
प्रस्तावित तंत्र के तहत तीनों देश उपग्रह डेटा और वैज्ञानिक विशेषज्ञता साझा करने, संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी, संयुक्त पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत करने और सीमा-पार आपदा राहत एवं बचाव के लिए समन्वय कर सकते हैं। शाह ने कहा कि हिमालय को अलग-अलग सूचनाओं से बंटी सीमा के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला बनाया जाना चाहिए।
शाह ने अगस्त में नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल नेपाल की स्थानीय त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है। उनके अनुसार, बढ़ते तापमान से परमाफ्रॉस्ट के पिघलने, पर्वतीय ढलानों के अस्थिर होने, हिम-चट्टान भूस्खलन, बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम बढ़ रहा है। हाल की आपदा में कम से कम 1,400 लोगों की मौत और 6,000 से अधिक लोगों के लापता होने की बात सामने आई है।
शाह ने यह भी कहा कि नेपाल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम योगदान देता है, लेकिन जलवायु संकट का असमान रूप से बड़ा नुकसान झेल रहा है। उन्होंने जलवायु वित्त को आसान बनाने और कमजोर देशों के लिए अनुदान आधारित सहायता बढ़ाने की मांग की।
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र करीब दो अरब लोगों के लिए पानी, पारिस्थितिकी, कृषि और आजीविका का आधार है।
जलवायु जोखिमों के कारण भारत में दूध की कमी संभव
जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बढ़ती चुनौतियां भारत में दूध की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर को और बढ़ा सकती हैं। सीआईआई फूड एंड एग्री सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और इंन्वायरेंमेंटल डिफेंस फंड (ईडीएफ) की ओर से जारी एक वर्किंग पेपर के अनुसार, भारत में दूध उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर पहले के 6-7 प्रतिशत से घटकर अब करीब 3.5-3.7 प्रतिशत रह गई है, जबकि मांग लगातार बढ़ रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ता तापमान डेयरी पशुओं की उत्पादकता पर सीधा असर डाल रहा है। तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से प्रति पशु प्रतिदिन 1.5 से 2 लीटर तक दूध उत्पादन घट सकता है। हीट स्ट्रेस से पशुओं के चारे का सेवन, स्वास्थ्य और दूध में वसा व प्रोटीन की मात्रा भी प्रभावित होती है। इसका असर दूध के साथ-साथ पनीर, चीज और दही जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों पर पड़ सकता है।
वर्किंग पेपर के मुताबिक, गर्मी की लहरों के दौरान डेयरी कंपनियों की खरीद लागत बढ़ती है और मुनाफे पर दबाव पड़ता है। विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय डेयरी डेटा प्लेटफॉर्म, चारा सुरक्षा रणनीति और जलवायु-अनुकूल डेयरी प्रशिक्षण संस्थानों की जरूरत बताई है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत के एक प्रतिशत से भी कम दुग्ध पशु संरचित मिल्क रिकॉर्डिंग व्यवस्था के दायरे में हैं। इससे पशुओं की उत्पादकता और जलवायु जोखिम के आधार पर लक्षित हस्तक्षेप करना मुश्किल होता है।
विशेषज्ञों ने कम उत्पादकता और पशुओं के आहार में असंतुलन को भी क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया है। साथ ही, स्वदेशी नस्लों की गर्मी और आर्द्रता सहने की क्षमता को देखते हुए नस्ल-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन उपायों पर जोर दिया गया है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए मजबूत नीतियों और कार्रवाई की जरूरत: राष्ट्रपति मुर्मू
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक जटिल चुनौती है, जिससे जैव-विविधता का नुकसान, जल संकट और भूमि क्षरण बढ़ रहा है। इससे निपटने के लिए नीतियों और योजनाओं का मजबूत ढांचा जरूरी है।
वह राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि जलवायु कार्रवाई में सरकारों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ प्रभावित समुदायों की भी सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने ग्रामीण और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों, छोटे किसानों, महिलाओं और अन्य कमजोर वर्गों की जरूरतों पर विशेष ध्यान देने की बात कही।
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों के अनुभव जलवायु अनुकूलन की क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप टिकाऊ वनीकरण और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र बहाल करने पर भी जोर दिया।