दिल्ली: सर्दियों में प्रदूषण से निपटने के लिए 50% वर्क फ्रॉम होम

Editorial Team30 सित॰. 2026
दिल्ली: सर्दियों में प्रदूषण से निपटने के लिए 50% वर्क फ्रॉम होम

दिल्ली सरकार ने सर्दियों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए विंटर एक्शन प्लान 2026-27 जारी किया है। इसके तहत सरकारी और निजी कार्यालयों में 1 नवंबर से 50 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम या सप्ताह में दो दिन घर से काम करने की व्यवस्था की जाएगी। निर्माण और तोड़फोड़ के काम पर भी चरणबद्ध रोक लगाई जाएगी। 1 नवंबर से 31 जनवरी तक धूल पैदा करने वाली तोड़फोड़ और खुले में होने वाले निर्माण कार्य प्रतिबंधित रहेंगे। 10 दिसंबर से 20 जनवरी तक निर्माण और तोड़फोड़ पर पूरी तरह रोक रहेगी।

1 अक्टूबर से 500 पेट्रोल पंपों पर ‘पीयूसीसी नहीं, ईंधन नहीं’ अभियान तेज किया जाएगा। दिल्ली के बाहर पंजीकृत ऐसे पेट्रोल-डीजल वाहनों का प्रवेश भी 1 नवंबर से रोका जाएगा, जो बीएस-VI मानकों को पूरा नहीं करते। पार्किंग शुल्क भी दोगुना किया जाएगा। सरकार सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के साथ प्रदूषण की निगरानी के लिए 334 प्रवर्तन दल और एआई आधारित कमांड सेंटर तैनात करेगी। 

 

कोयला-आधारित बिजली से बढ़ा शहरों में प्रदूषण, मौतें में इज़ाफ़ा: रिपोर्ट

भारत में 2000 से 2020 के बीच बिजली की मांग करीब चार गुना बढ़ी और इस दौरान बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी करीब 76 प्रतिशत रही। नेचर सिटीज में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, इस अवधि में शहरी वायु प्रदूषण और पीएम2.5 से जुड़ी मौतों में भी बढ़ोतरी हुई। अध्ययन में कहा गया है कि कोयला आधारित बिजली उत्पादन से सल्फर डाइऑक्साइड और सल्फेट एरोसोल बढ़े, जिससे शहरी पीएम2.5 का स्तर बढ़ा। शहरी पीएम2.5 से जुड़ी अनुमानित मौतें 2000 में करीब 6.7 लाख से बढ़कर 2020 में 8.7 लाख हो गईं। वहीं, स्वच्छ खाना पकाने के साधनों की पहुंच बढ़ने से घरेलू वायु प्रदूषण और उससे जुड़ी मौतों में कमी आई। अध्ययन के मुताबिक, इससे प्रदूषण का बोझ घरों के अंदर से बाहर के वातावरण की ओर बढ़ा।

 

2026 की पहली छमाही में एनजीटी के 16 पर्यावरण जनहित मामलों में एक में भी राहत नहीं: विश्लेषण

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि भारतीय अदालतों को पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन कायम करना होगा। इसी बीच एक विश्लेषण में दावा किया गया है कि 2026 के पहले छह महीनों में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पर्यावरण न्याय या जनहित से जुड़े पक्ष में एक भी फैसला नहीं दिया।

साउथ एशियन रिपोर्टर फॉर एनवायरनमेंट लॉज (SAREL) के विश्लेषण में जनवरी से जून के बीच एनजीटी की पांच पीठों में सुनी गई 119 अपीलों का अध्ययन किया गया। इनमें पर्यावरण या जनहित से जुड़े पक्षों ने 16 अपीलें दायर की थीं, जबकि परियोजना प्रवर्तकों, संपत्ति मालिकों या उद्योगों की ओर से 51 अपीलें दायर की गई थीं।

विश्लेषण के अनुसार, जनहित वाले पक्ष की सभी 16 अपीलों में उसे अनुकूल फैसला नहीं मिला। इसके विपरीत उद्योग, परियोजना प्रवर्तक या संपत्ति मालिकों के पक्ष ने अपनी 51 मेरिट अपीलों में से 30 में सफलता हासिल की, यानी सफलता दर करीब 59 प्रतिशत रही। छह प्रतिशत मामलों में मौजूदा स्थिति बरकरार रखी गई।

विश्लेषण में यह भी कहा गया कि 44 प्रतिशत अपीलें तकनीकी या प्रक्रियागत आधारों – जैसे समय-सीमा, अधिकार क्षेत्र, सुनवाई योग्य न होना या अपील वापस लेने – के कारण खारिज हो गईं और मामले के गुण-दोष पर फैसला नहीं हुआ।

दिल्ली की प्रधान पीठ में उद्योग/परियोजना पक्ष ने 10 में से पांच मेरिट अपीलें जीतीं। पुणे में 24 में से 15 और चेन्नई में 12 में से नौ अपीलों में उसे सफलता मिली। भोपाल पीठ में पांच में से एक अपील जीती गई। कोलकाता पीठ ने छह महीनों में केवल एक जनहित अपील का निपटारा किया, जिसे खारिज कर दिया गया।

ये निष्कर्ष सीजेआई सूर्यकांत के उस बयान के संदर्भ में सामने आए हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि अब अदालतों के सामने सवाल संरक्षण बनाम विकास का नहीं, बल्कि दोनों के बीच सामंजस्य कायम करने का है।

 

निर्माण कचरा नहीं हटाया तो नहीं मिलेगा ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट, गुरुग्राम में नए नियम

गुरुग्राम में निर्माण और विध्वंस (डिमॉलिशन) से निकलने वाले कचरे (सी&डी वेस्ट) के बेतरतीब निपटारे और उससे होने वाले धूल प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए नगर निगम गुरुग्राम (एमसीजी) ने नए सख्त नियम लागू किए हैं। नए नियमों के तहत निर्माण या विध्वंस परियोजनाओं में कचरे के उचित निपटारे का प्रमाण देना अब जरूरी होगा। इसके बिना ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) या कंप्लीशन सर्टिफिकेट (सीसी) जारी नहीं किया जाएगा।

कुल 200 वर्ग मीटर या उससे बड़े भूखंडों पर विध्वंस करने वाले आवेदकों को बिल्डिंग प्लान मंजूरी के समय अनुमानित मलबे की मात्रा बतानी होगी। निर्माण शुरू करने से पहले इस कचरे को एमसीजी के अधिकृत केंद्र, फिलहाल बसई प्लांट या निर्धारित संग्रह केंद्र पर जमा करना होगा। इसके बाद ऑनलाइन रसीद और साइट निरीक्षण के आधार पर निपटारे की पुष्टि होगी।

वहीं 20,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक के बिल्ट-अप क्षेत्र वाली परियोजनाओं के लिए इंटीग्रेटेड वेस्ट मैनेजमेंट प्लान अनिवार्य किया गया है। बड़े डेवलपर्स को कचरा अपने वाहनों से अधिकृत रीसाइक्लिंग प्लांट तक पहुंचाना होगा। सरकारी परियोजनाओं को भी इन नियमों से छूट नहीं दी गई है।

एमसीजी ने निर्माण में रिसाइकिल सामग्री के इस्तेमाल के लक्ष्य भी तय किए हैं। भवन निर्माण में यह हिस्सेदारी 2026-27 में 5% से बढ़ाकर 2030-31 तक 25% और सड़क निर्माण में 2030-31 से 15% करने का लक्ष्य है। सार्वजनिक स्थानों पर पड़ा मलबा 24 घंटे, जबकि सड़क, सीवर और जलापूर्ति कार्यों का मलबा 72 घंटे के भीतर हटाना होगा। नियमों की निगरानी के लिए विशेष सी&डी मॉनिटरिंग सेल भी बनाया जाएगा।

हालांकि, नए नियमों के बावजूद गुरुग्राम के कुछ इलाकों में अवैध रूप से निर्माण कचरा फेंके जाने की शिकायतें सामने आई हैं, जिससे इनके प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी की चुनौती बनी हुई है।

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