ब्रासीलिया में आयोजित प्री-कॉप30 मंत्री-स्तरीय बैठक में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि आगामी कॉप-30 सम्मेलन को “कॉप ऑफ अडॉप्टेशन” बनाया जाना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि अब समय है जब जलवायु प्रतिबद्धताओं को वास्तविकता में बदला जाए। यादव ने कहा कि बेलें (ब्राजील) में होने वाला यह सम्मेलन एक मजबूत राजनीतिक संदेश दे कि बहुपक्षवाद (मल्टीलैटरलिज़्म) ही वैश्विक क्लाइमेट एक्शन की आधारशिला है।
उन्होंने यूएई-बेलें वर्क प्रोग्राम के तहत न्यूनतम संकेतकों पर सहमति की अपील की और जलवायु अनुकूलन के लिए वित्तीय प्रवाह बढ़ाने की आवश्यकता बताई। यादव ने भारत की इंटरनेशनल सोलर अलायंस जैसी पहलों को बहुपक्षीय सहयोग के सफल उदाहरण बताया।
पेरिस समझौते के दस साल बाद भी जलवायु पहलों की रफ्तार धीमी: रिपोर्ट
कौंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि पेरिस समझौते के दस वर्ष बाद भी वैश्विक जलवायु सहयोग के नतीजे सीमित रहे हैं। इस विश्लेषण में 203 अंतरराष्ट्रीय जलवायु पहलों का अध्ययन किया गया और पाया गया कि केवल 5% ने अपने लक्ष्य हासिल किए, जबकि 20% से अधिक ठप या निष्क्रिय हो गई हैं। अधिकांश पहलों में स्पष्ट लक्ष्य, वित्तीय सहायता और जवाबदेही की व्यवस्था नहीं है, जिससे दीर्घकालिक प्रगति मुश्किल हो जाती है।
साल 2015 से अब तक सरकारों, निवेशकों और संगठनों के बीच 475 से अधिक स्वैच्छिक साझेदारियां शुरू हुईं, लेकिन इनमें से आधे से ज्यादा के लक्ष्य ऐसे नहीं हैं जिनका आकलन किया जा सके। वहीं जिन परियोजनाओं की शुरुआत ठोस योजनाओं और मॉनिटरिंग प्रणालियों के साथ हुई उन्होंने बेहतर परिणाम दिखाए हैं।
अधिकांश प्रयास ग्रीनहाउस गैसों में कमी (मिटिगेशन) पर केंद्रित रहे हैं, जबकि अनुकूलन (अडॉप्टेशन) से जुड़ी पहलें — जैसे सूखा प्रबंधन, रेसिलिएंट कृषि या वनों की सुरक्षा — कम हैं। हानि और क्षति (लॉस एंड डैमेज) से संबंधित पहलें हाल के वर्षों में ही शुरू हुई हैं, जो दर्शाती हैं कि क्लाइमेट जस्टिस में असमानता अभी भी मौजूद है।
भारत ने ग्लोबल साउथ में एक प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरते हुए आठ पहलें शुरू की हैं। हालांकि स्थानीय सरकारों और निजी निवेशकों की भागीदारी अब भी सीमित है। रिपोर्ट ने क्लाइमेट एक्शन को पटरी पर बनाए रखने के लिए बेहतर निगरानी, वित्तीय सहयोग और साझेदारी को मज़बूत करने की सिफारिश की है।
पहली डीएनए आधारित गणना में भारत में हाथियों की संख्या 18% घटी
भारत में हाथियों की संख्या का पहली बार डीएनए आधारित आकलन किया गया है, जिसमें देश में 22,446 जंगली हाथी होने का अनुमान लगाया गया है। यह आंकड़ा 2017 की गणना (27,312) से कम है, लेकिन अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि दोनों आंकड़ों की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि इस बार नई वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई है।
ऑल-इंडिया सिंक्रोनस एलिफेंट एस्टीमेशन (SAIEE) 2025 रिपोर्ट के अनुसार देश में हाथियों की संख्या 18,255 से 26,645 के बीच है। सर्वेक्षण 2021 में शुरू हुआ था और जटिल डीएनए विश्लेषण के कारण रिपोर्ट चार साल बाद जारी हुई।
इस बार 21,000 से अधिक गोबर नमूनों का डीएनए परीक्षण कर 4,065 हाथियों की पहचान की गई। पश्चिमी घाट क्षेत्र में सर्वाधिक 11,934 हाथी, उसके बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र (6,559) और शिवालिक-गंगा क्षेत्र (2,062) हैं। कर्नाटक में सबसे अधिक (6,013) हाथी हैं, जबकि असम, तमिलनाडु, केरल और उत्तराखंड क्रमशः अगले स्थानों पर हैं। यह नई गणना भविष्य के संरक्षण कार्यों के लिए वैज्ञानिक आधार बनेगी।
दुर्लभ खनिज निर्यात पर चीन ने लगाए नए प्रतिबंध
दुर्लभ (रेयर अर्थ) खनिजों पर लगभग एकाधिकार रखने वाले चीन ने इनके खनन और प्रोसेसिंग से जुड़ी तकनीकों के निर्यात पर नए प्रतिबंध लागू किए हैं। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा कि कुछ विदेशी कंपनियां चीन की आपूर्ति का सैन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग कर रही हैं। मंत्रालय ने कहा कि दुर्लभ (रेयर अर्थ) खनिजों के खनन, स्मेल्टिंग और सेपरेशन (पृथक्करण) से जुड़ी तकनीक और उनके उपकरणों का निर्यात बिना अनुमति नहीं किया जा सकेगा। यही नियम मेटल स्मेल्टिंग, मैग्नेटिक मैटेरियल विनिर्माण और अन्य स्रोतों से रेयर अर्थ की रीसाइक्लिंग और प्रयोग पर भी लागू होगा।
चीन वैश्विक दुर्लभ खनिज खनन का करीब 70% और प्रोसेसिंग का 90% नियंत्रित करता है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और भारत इसके प्रमुख आयातक हैं। नए प्रतिबंध एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) सम्मेलन से पहले लगाए गए हैं, जहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात प्रस्तावित है।
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