जलवायु आपदाएं और मानसिक स्वास्थ्य: भारत में बढ़ता एक ‘मौन संकट’

भारत में बढ़ती जलवायु आपदाएं अब केवल भौतिक विनाश यानी जान-मान की क्षति तक ही सीमित नहीं रह गई हैं। बाढ़, भूस्खलन, हीटवेव, चक्रवात और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएँ न केवल घर, सड़कें और आजीविका नष्ट कर रही हैं, बल्कि लाखों लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डाल रही हैं। हालिया रिपोर्टों और जमीनी अध्ययन बताते हैं कि देश में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाएँ एक “मौन मानसिक स्वास्थ्य संकट” को जन्म दे रही हैं — जो अभी तक नीति-निर्माण और आपदा प्रबंधन की मुख्यधारा में पर्याप्त स्थान नहीं पा सका है।

आपदाओं के बाद बढ़ती मानसिक पीड़ा

विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं के बाद मानसिक आघात (ट्रॉमा), अवसाद, चिंता, अनिद्रा और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। कई प्रभावित लोग लंबे समय तक भय, असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता की भावना से जूझते रहते हैं।

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएँ लोगों को स्थायी मानसिक दबाव में रख रही हैं। कई परिवार हर मानसून के मौसम में संभावित आपदा की आशंका से भयभीत रहते हैं। विशेषज्ञ इसे “हाइपर-विजिलेंस” यानी अत्यधिक सतर्कता की मानसिक अवस्था बताते हैं, जो लंबे समय में मानसिक थकान और अवसाद को जन्म देती है।

व्यक्तिगत कहानियाँ: दर्द जो आँकड़ों से परे है

कार्बनकॉपी की इस रिपोर्ट में उत्तराखंड के एक गांव का उल्लेख है, जहां लगातार बाढ़ और भूस्खलन ने स्थानीय लोगों की आजीविका और मानसिक संतुलन दोनों को प्रभावित किया। एक स्थानीय निवासी प्रदीप पंवार ने पिछले साल अगस्त में हुई आपदा में – जिसमें 55 लोगों की जान गई और पूरा कस्बा तबाह हो गया – अपनी दुकान और टैक्सी सेवा खो दी, जो परिवार की आय का मुख्य स्रोत थी। आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि प्रदीप की मां मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या कर ली।

ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि जलवायु आपदाओं का प्रभाव केवल भौतिक ढांचे पर नहीं, बल्कि मानवीय मन पर भी पड़ता है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद किए गए अध्ययनों में पाया गया कि प्रभावित आबादी के एक बड़े हिस्से में PTSD, अवसाद और चिंता के लक्षण मौजूद थे। कई लोगों ने स्मृति हानि, बोलने में कठिनाई और सामाजिक अलगाव की शिकायत की।

बच्चों और महिलाओं पर विशेष प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु आपदाओं का प्रभाव समाज के कमजोर वर्गों पर अधिक पड़ता है। बच्चों में भयावह सपने, पढ़ाई में ध्यान की कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक अलगाव के लक्षण देखे गए हैं। स्कूलों के बंद होने और विस्थापन के कारण बच्चों की दिनचर्या टूट जाती है, जिससे उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है।

महिलाएं, विशेषकर वे जो पहले से आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर स्थिति में हैं, दोहरे बोझ का सामना करती हैं। घर के पुनर्निर्माण, बच्चों की देखभाल और आर्थिक असुरक्षा के बीच वे मानसिक तनाव झेलती हैं, परंतु सहायता के लिए आगे नहीं आ पातीं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) भी सहायता लेने में बाधा बनता है।

आर्थिक असुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध

जलवायु आपदाओं के बाद आजीविका का नुकसान मानसिक संकट को और गहरा करता है। किसान फसल नष्ट होने से कर्ज में डूब जाते हैं, छोटे व्यवसायी अपनी पूंजी गंवा बैठते हैं, और दिहाड़ी मजदूरों की आय अचानक समाप्त हो जाती है। आर्थिक असुरक्षा लंबे समय तक अवसाद और चिंता को जन्म देती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपना घर, जमीन या व्यवसाय खो देता है, तो वह केवल संपत्ति नहीं खोता — वह अपनी पहचान और सामाजिक स्थिरता भी खो देता है। यह भावनात्मक क्षति कई बार शारीरिक क्षति से अधिक गंभीर होती है।

तटीय और शहरी क्षेत्रों की स्थिति

तटीय राज्यों में चक्रवात और समुद्री तूफानों की आवृत्ति बढ़ रही है। मछुआरा समुदायों में भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। बार-बार के विस्थापन और पुनर्वास की प्रक्रिया लोगों को मानसिक रूप से थका देती है।

शहरी क्षेत्रों में भी हीटवेव और अचानक आई बाढ़ मानसिक दबाव बढ़ा रही है। अत्यधिक गर्मी के दौरान चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और थकान बढ़ती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि तापमान बढ़ने के साथ आत्महत्या दर में भी वृद्धि हो सकती है।

आपदा प्रबंधन में मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी

भारत में आपदा प्रबंधन तंत्र मुख्यतः राहत, पुनर्वास और बुनियादी ढांचे की मरम्मत पर केंद्रित रहता है। हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य सहायता अक्सर अल्पकालिक और सीमित होती है। आपदा के तुरंत बाद कुछ काउंसलिंग शिविर या हेल्पलाइन शुरू की जाती हैं, लेकिन दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक सहायता की कमी बनी रहती है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि आपदा के बाद मानसिक आघात कई महीनों या वर्षों तक बना रह सकता है। ऐसे में केवल तत्काल राहत पर्याप्त नहीं है। समुदाय-आधारित समर्थन, नियमित परामर्श और सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रमों की आवश्यकता है।

नीतिगत पहल और चुनौतियाँ

विश्व स्वास्थ्य संगठनों और राष्ट्रीय स्तर पर कुछ दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जिनमें आपदाओं के दौरान मनोसामाजिक सहायता को शामिल करने की सिफारिश की गई है। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) के माध्यम से कुछ क्षेत्रों में सेवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।

फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित काउंसलरों की संख्या में कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाओं की अनुपलब्धता बड़ी बाधाएं हैं। मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं किया गया है।

आगे की राह: समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता

रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य को अलग-अलग मुद्दों के रूप में नहीं देखा जा सकता। एक समग्र रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें निम्नलिखित कदम शामिल हों:

  • आपदा प्रबंधन योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य घटक बनाना
  • स्कूलों और समुदायों में मनोसामाजिक सहायता कार्यक्रम चलाना
  • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में काउंसलिंग सेवाओं का विस्तार
  • महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सहायता योजनाएँ
  • आर्थिक पुनर्वास के साथ मानसिक पुनर्वास का एकीकृत मॉडल

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसिक स्वास्थ्य को अनदेखा किया गया, तो इसका प्रभाव दीर्घकाल में सामाजिक उत्पादकता, शिक्षा और सामुदायिक स्थिरता पर पड़ेगा।

निष्कर्ष

भारत में जलवायु आपदाओं की बढ़ती तीव्रता और आवृत्ति केवल पर्यावरणीय या आर्थिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह एक गहरा मानवीय संकट भी है। मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव अक्सर अदृश्य रहते हैं, लेकिन उनका असर गहरा और दीर्घकालिक होता है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में आवश्यक है कि नीति-निर्माता, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समाज मिलकर ऐसी रणनीति तैयार करें जो न केवल घरों और सड़कों का पुनर्निर्माण करे, बल्कि लोगों के मन और आत्मविश्वास को भी पुनर्स्थापित करे।

जलवायु आपदाएं प्रकृति की चेतावनी हैं — और यह समय है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता से लें जितनी भौतिक पुनर्निर्माण को।

(यह रिपोर्ट विस्तार से अंग्रेज़ी में यहां पढ़ी जा सकती है।)

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