'कई सालों की सबसे बुरी बाढ़': असम में अब तक 80 लोगों की मौत

Editorial Team31 जुल॰. 2026
'कई सालों की सबसे बुरी बाढ़': असम में अब तक 80 लोगों की मौत

असम में बाढ़ से कम से कम 80 लोगों की मौत हो चुकी है और मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, सात ज़िले बुरी तरह प्रभावित हैं; 622 गांवों में 3,00,000 से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए हैं और 45,000 हेक्टेयर से ज़्यादा फसल वाला इलाका पानी में डूब गया है।

ये मौतें पिछले चार हफ़्तों में हुई हैं, जिनमें से 58 मौतें तो सिर्फ़ पिछले हफ़्ते ही हुईं। बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है, 'सिर्फ़ 21 जुलाई को 24 घंटों में 21 लोगों की मौत हुई; ज़्यादातर लोग बाढ़ के पानी में बह गए या डूब गए। कुछ लोगों की मौत ज़मीन खिसकने (लैंडस्लाइड) और घर गिरने से हुई'। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ बचे हुए लोगों को रात पेड़ों पर बितानी पड़ी।

कोहिमा मौसम केंद्र के एक वैज्ञानिक ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया कि उस इलाके में बादल फटने (जिसे भारत मौसम विज्ञान विभाग एक घंटे में 100 मिमी से ज़्यादा बारिश के तौर पर परिभाषित करता है) जैसी घटना नहीं हुई थी, बल्कि उस दिन आठ से नौ घंटों के दौरान 137 मिमी भारी बारिश हुई थी। इस बारिश की वजह से 'मोन' (Mon) इलाके में कई जगहों पर ज़मीन खिसकने की घटनाएं हुईं, जिनमें नौ लोगों की मौत हो गई।

सरकार ने कहा कि पानी का स्तर 'अभूतपूर्व तेज़ी' से बढ़ा। अख़बार के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने इस आपदा के लिए 'बारिश और इंसानी गतिविधियों के मिले-जुले असर' को ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने बताया कि एक वजह नदी की घाटियों के किनारे बहुत ज़्यादा खुदाई करना भी था, जिससे गाद (silt) जमा होने की समस्या बढ़ी और नदी की पानी ले जाने की क्षमता कम हो गई।

वैज्ञानिकों ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया, 'जहां घने जंगल होते हैं, वहां भारी बारिश होने पर 'इनफिल्ट्रेशन अपॉर्चुनिटी टाइम' (ज़मीन के अंदर पानी रिसने का समय) बढ़ जाता है; यानी पानी को ज़मीन के अंदर रिसने और समाने का ज़्यादा समय मिलता है। लेकिन अगर ज़मीन बंजर हो, तो पानी को ज़मीन के अंदर रिसने का काफ़ी समय नहीं मिलता और वह तेज़ी से ढलान की ओर बहता है, साथ ही अपने साथ बहुत सारी गाद भी ले जाता है। जंगल तेज़ी से कम होने की वजह से हम यही देख रहे हैं। यह ज़्यादा गाद नदी की तलहटी को ऊपर उठा देती है और पानी ले जाने की क्षमता को कम कर देती है।'

डीटीई की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार ने संसद को बताया कि 2026 में 10 मिलियन हेक्टेयर से ज़्यादा कृषि क्षेत्र जल-मौसम संबंधी आपदाओं से प्रभावित हुआ है।

 

गुजरात में बाढ़ से 40 लोगों की मौत; फ़ैक्टरियां बंद, सैकड़ों लोगों को सुरक्षित निकाला गया

गुजरात में भारी बारिश और बाढ़ के कारण लगभग 40 लोगों की मौत हो गई। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, नवसारी और वलसाड ज़िलों से 33 शव बरामद किए गए।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, टाटा मोटर्स के साणंद प्लांट में - जहां टियागो, नेक्सॉन और सिएरा गाड़ियाँ बनती हैं - बाढ़ के कारण दो दिनों के लिए कामकाज रोक दिया गया। पुलिस ने साणंद के पास बावला में गैलप्स इंडस्ट्रियल पार्क से 900 कर्मचारियों को बचाया, जबकि सेना ने बागोदरा तालुका में अमेज़न के वेयरहाउस से 80 से ज़्यादा कर्मचारियों को सुरक्षित निकाला। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया है कि सूरत में टेक्सटाइल यूनिट्स पानी में डूबी रहीं।

लोकमत टाइम्स ने वापी और सूरत के शहरी इलाकों में बाढ़ की वजह भारी बारिश (16 घंटों में लगभग 1100 मिमी) के साथ-साथ तेज़ी से हो रहे निर्माण कार्य, प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था में कमी और जल-मार्गों पर कब्ज़े को बताया है।

 

जम्मू-कश्मीर में भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ से 27 लोगों की मौत; हिमाचल ने लोगों और पर्यटकों को यात्रा न करने की सलाह दी

जम्मू-कश्मीर में भारी बारिश और भूस्खलन से मरने वालों की संख्या बढ़कर 27 हो गई है; इनमें से सात लोग एक ही परिवार के थे जिनकी मौत पुंछ जिले में भूस्खलन के कारण हुई। राजौरी और पुंछ सबसे ज़्यादा प्रभावित जिलों में शामिल हैं। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम विभाग ने संवेदनशील इलाकों में और बारिश, अचानक बाढ़, भूस्खलन, मडस्लाइड और नदियों का जलस्तर बढ़ने की चेतावनी दी है, जिसके चलते अधिकारियों ने पहलगाम और बालटाल दोनों रास्तों से अमरनाथ यात्रा रोक दी है।

पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश ने भी वहां के लोगों और पर्यटकों से यात्रा न करने की अपील की है, क्योंकि राज्य में बादल फटने, अचानक बाढ़ आने और भूस्खलन की घटनाएं लगातार हो रही हैं। एएनआई के अनुसार, सरकार ने बताया कि इस मॉनसून में बादल फटने की नौ घटनाएं, अचानक बाढ़ की 19 घटनाएं और बादल फटने से प्रभावित चार बड़े इलाके सामने आए हैं, जिससे 120 सड़कें बंद हो गई हैं और पीने के पानी की कई सप्लाई योजनाएं बाधित हुई हैं।

 

झारखंड में सूखे की मार, मॉनसून में 40-79% की कमी; सरकार ने दी किसानों को बाजरा बोने की सलाह 

झारखंड के धान किसान 40% से ज़्यादा (कुछ ज़िलों में 79%) बारिश की कमी का सामना कर रहे हैं, जिसे वैज्ञानिक एल-नीनो जनित सूखा बता रहे हैं। झारखंड में खरीफ की बुआई का मौसम मॉनसून पर निर्भर करता है, लेकिन इस साल बुआई में 20 दिन से ज़्यादा की देरी हुई। मोंगाबे इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इस हालात का लंबे समय तक असर पड़ने की संभावना है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इस साल सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया है। यूएस नेशनल वेदर सर्विस के अनुसार, अक्टूबर और दिसंबर के बीच बहुत मज़बूत एल नीनो का अनुमान है -- शायद यह अब तक का सबसे मज़बूत एल नीनो इवेंट है, जिसके बारे में वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह मॉनसून में रुकावट डालेगा।

झारखंड में 1 जून से 14 जुलाई के बीच सामान्य से 41% कम बारिश हुई। इस दौरान राज्य में आमतौर पर 321 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस साल यह 193.2 मिमी ही थी। चतरा में हालत और भी खराब है, जहां उम्मीद से 68% कम बारिश हुई (नॉर्मल 287 मिमी के मुकाबले 91 मिमी)। गढ़वा में 79% की कमी थी। ख़बरों में कहा गया है कि राज्य भर में, 24 में से 13 जिलों में 40% से ज़्यादा बारिश की कमी है।

 

फ्रांस और स्पेन ने अधिक हीटवेव के लिए कमर कसी;  जंगलों में आग से बिगड़ेंगे हालात 

जंगल की आग के बीच फ्रांस और स्पेन में फिर से हीटवेव बढ़ने की आशंका है। इससे वहां लगी जंगल की आग और भयानक हो सकती है। गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस के अटलांटिक तट पर टूरिस्ट जगहों से करीब 4,000 लोगों को निकाला गया है, क्योंकि हवाओं फिर बहुत ज़्यादा गर्मी की होने  से फ्रांस और स्पेन में लगी जंगल की आग को बुझाने के लिए फायरफाइटर्स को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

फाइनेंशियल टाइम्स ने चेतावनी दी है कि ‘और भी ज़्यादा तापमान से जंगल की आग और खराब हो सकती है’। अखबार ने आगे कहा कि यूरोप के कुछ हिस्सों में तापमान 40 डिग्री तक पहुंचने की उम्मीद है। इस साल लगातार तीन हीटवेव की वजह से आग की स्थिति और खराब हो गई है, जिससे पेड़-पौधे सूख गए, जिससे आग लगना और फैलना आसान हो गया। 

फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा, ‘वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से ये हालात और खराब हुए हैं’। येल E 360 की रिपोर्ट के मुताबिर 'वैज्ञानिकों का कहना है कि गीले से सूखे मौसम में अचानक बदलाव, जो क्लाइमेट चेंज का एक संकेत है, ने आग को और भड़काने का काम किया'।

 

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