देश के आधे जिलों में बारिश की कमी, खरीफ बुआई सुस्त; धान, तिलहन और दालों का रकबा घटा
देश में मानसून की धीमी प्रगति और एल नीनो की आशंका के बीच खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। अब तक देश के 741 जिलों में से आधे से अधिक जिले वर्षा की कमी का सामना कर रहे हैं, जिससे धान, दाल, मोटे अनाज और तिलहनों की बुआई पिछले वर्ष की तुलना में काफी पीछे चल रही है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 10 जुलाई तक धान की बुआई 114.69 लाख हेक्टेयर में हुई, जो पिछले वर्ष के 125.53 लाख हेक्टेयर की तुलना में 8.6 प्रतिशत कम है। दालों की बुआई में और अधिक गिरावट दर्ज की गई है। इस वर्ष अब तक 56.63 लाख हेक्टेयर में दालों की बुआई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 73.85 लाख हेक्टेयर थी।
तिलहनों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। इनका कुल रकबा घटकर 117.8 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले वर्ष के 149.2 लाख हेक्टेयर से 31.3 लाख हेक्टेयर कम है। देश की प्रमुख तिलहन फसल सोयाबीन का रकबा 17.2 लाख हेक्टेयर, जबकि मूंगफली का रकबा 12 लाख हेक्टेयर घटा है। वहीं कपास की बुआई भी पिछले साल और सामान्य स्तर, दोनों से पीछे है।
हालांकि, गन्ना अपवाद रहा है। इसका रकबा बढ़कर 57.6 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले वर्ष और सामान्य क्षेत्रफल दोनों से अधिक है।
जलवायु परिवर्तन का असर: पहाड़ों पर ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं 845 प्रजातियां
ग्लोबल वार्मिंग का असर अब पर्वतीय जैव विविधता पर साफ दिखाई देने लगा है। नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, दुनिया भर की 845 पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियां बढ़ते तापमान के कारण ठंडे वातावरण की तलाश में ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रही हैं। हालांकि सभी प्रजातियों के खिसकने की गति समान नहीं है। उनका ऊंचाई की ओर बढ़ना उनके जलवायु अनुकूलन और विकासवादी इतिहास पर निर्भर करता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि पर्वतों पर रहने वाली प्रजातियों के लिए यह स्थिति गंभीर है, क्योंकि ऊंचाई बढ़ने के साथ उनके रहने योग्य क्षेत्र लगातार सिकुड़ते जाते हैं। इससे कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जलवायु के दौर में जैव विविधता संरक्षण की रणनीतियों में इन बदलावों को शामिल करना आवश्यक होगा, ताकि संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र और वहां रहने वाली प्रजातियों को सुरक्षित रखा जा सके।
भारत सहित चार देशों में भीषण गर्मी का सबसे बड़ा खतरा, अहमदाबाद दुनिया का दूसरा सबसे जोखिम वाला शहर
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के बड़े शहरों में भीषण गर्मी का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। सस्टेनेबल सिटीज एंड सोसाइटी जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया और घाना ऐसे चार देश हैं जहां अत्यधिक गर्मी के जोखिम वाले शहरों की संख्या सबसे अधिक है। दुनिया के 205 बड़े शहरों के विश्लेषण में इराक का अल बसरा सबसे अधिक जोखिम वाला शहर पाया गया, जबकि गुजरात का अहमदाबाद दूसरे स्थान पर है।
अध्ययन के अनुसार, दुनिया के सबसे अधिक जोखिम वाले 50 शहरों में भारत के 14 शहर शामिल हैं। इनमें जयपुर, नागपुर, पुणे, चेन्नई, मदुरै, बेंगलुरु, कानपुर और लखनऊ प्रमुख हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि केवल ऊंचा तापमान ही जोखिम तय नहीं करता, बल्कि आबादी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, बुजुर्गों की संख्या, आर्थिक क्षमता, एयर कंडीशनिंग जैसी शीतलन सुविधाओं की उपलब्धता और हरित क्षेत्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार, एशिया और अफ्रीका के कई शहरों में अत्यधिक गर्मी के साथ कमजोर बुनियादी ढांचा और सीमित संसाधन मिलकर लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। अध्ययन में ऊर्जा-गहन एयर कंडीशनिंग पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय पेड़ों की संख्या बढ़ाने, बेहतर शहरी नियोजन, प्राकृतिक वेंटिलेशन, पंखों और कम ऊर्जा खपत वाली शीतलन तकनीकों को प्राथमिकता देने की सिफारिश की गई है।
उत्तराखंड में 12 साल बाद दिखी दुर्लभ विशाल उड़न गिलहरी, वन विभाग ने सुरक्षित जंगल में छोड़ा
उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर वन प्रभाग में करीब 12 वर्ष बाद दुर्लभ भारतीय विशाल उड़न गिलहरी (Indian Giant Flying Squirrel) देखी गई है। यह निशाचर जीव कोसी रेंज के टेड़ा गांव में एक घर में भटककर पहुंच गया था, जिसके बाद वन विभाग की टीम ने उसे सुरक्षित रेस्क्यू कर स्वास्थ्य परीक्षण किया और फिर उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया। वन अधिकारियों के अनुसार, इस प्रजाति का लंबे अंतराल के बाद दिखाई देना उत्तराखंड के जंगलों में जैव विविधता के लिहाज से सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। भारतीय विशाल उड़न गिलहरी पेड़ों के बीच त्वचा की झिल्ली की मदद से लंबी दूरी तक ग्लाइड करती है और मुख्यतः घने वनों में रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है, हालांकि इनके आवासों का संरक्षण भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।