खाड़ी युद्ध से ऊर्जा कीमतों में 4 साल में सबसे अधिक वृद्धि का खतरा, यूएई के ओपीईसी से बाहर होने से झटका

विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि ईरान पर अमेरिका-इज़राइल युद्ध के चलते ऊर्जा कीमतों में चार साल की सबसे बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है, खासकर तब जबकि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)  के ओपीईसी और ओपीईसी+ से बाहर होने से तेल निर्यातक समूहों को बड़ा झटका लगा है।

बैंक के अनुमान के मुताबिक 2026 में ऊर्जा कीमतों में 24% तक उछाल आ सकता है, जबकि कुल कमोडिटी कीमतों में 16% की वृद्धि होने की संभावना है। इसका कारण ईंधन और उर्वरक की बढ़ती कीमतें और कई औद्योगिक व कीमती धातुओं के रिकॉर्ड स्तर हैं।

हीटवेव के बीच रिकॉर्ड बिजली मांग, भारत ने बढ़ाया कोयला और गैस उत्पादन

हीटवेव के दौरान सप्ताहांत में भारत में बिजली की अधिकतम मांग 256.1 गीगावाट तक पहुंच गई, जिसके चलते देश ने कोयला और गैस उत्पादन बढ़ाया। ग्रिड इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने करीब 9.6 गीगावाट गैस-आधारित क्षमता संचालित की और कोयला-आधारित उत्पादन को बढ़ाकर लगभग 187 गीगावाट तक पहुंचाया।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दशक में सौर ऊर्जा क्षमता में तेज वृद्धि और हाल के वर्षों में कोयला-आधारित बिजली उत्पादन के विस्तार ने दिन के समय ऐसी मांग को पूरा करने में मदद की है। हालांकि शाम के समय, जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती, दबाव बढ़ जाता है।

गैस आपूर्ति पर युद्ध के असर के कारण रात की मांग पूरी करना चुनौतीपूर्ण हो गया है, जिससे भारत को कोयले पर अधिक निर्भर होना पड़ रहा है। साथ ही, देश जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने और ऊर्जा भंडारण क्षमता को तेज करने पर भी जोर दे रहा है।

ईरान युद्ध खत्म होने के आसार नहीं, तेल कीमतों में 7% उछाल

ईरान युद्ध के बीच तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखा गया है। खबर है कि अमेरिका संभावित सैन्य कार्रवाई की योजना बना रहा है, जिससे बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड (अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल का प्रमुख मानक) की कीमत एक समय 7% बढ़कर 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि बाद में यह घटकर करीब 114 डॉलर रह गई।

विशेषज्ञों के अनुसार, शांति वार्ता ठप होने और होर्मुज जलडमरूमध्य (जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है) के बाधित होने से कीमतें बढ़ रही हैं। तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ रहे हैं। साथ ही ‘फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट’ (भविष्य में तय कीमत पर खरीद-बिक्री के समझौते) की समय-सीमा खत्म होने से भी कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया।

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