केंद्र सरकार ने बुधवार को भारत के नए जलवायु लक्ष्य तय करते हुए 2031 से 2035 तक की अवधि के लिए अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को मंजूरी दे दी। ये लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) को भेजे जाएंगे।
सरकार ने 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक जीडीपी की उत्सर्जन इंटेंसिटी 47 प्रतिशत तक घटाने और कुल स्थापित बिजली क्षमता का 60 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य रखा है। साथ ही 3.5 से 4 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन सिंक बनाने की योजना है। ये नए लक्ष्य 2022 में घोषित पुराने लक्ष्यों से अधिक महत्वाकांक्षी हैं। भारत पहले ही 2030 के लक्ष्य से पहले लगभग 52 प्रतिशत बिजली क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर चुका है।
इस घोषणा के बाद एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 में भारत के CO₂ उत्सर्जन की वृद्धि दर दो दशक में सबसे धीमी रही। बिजली क्षेत्र में कोयले पर निर्भरता कम होने और सौर व पवन ऊर्जा बढ़ने से यह संभव हुआ। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर एनडीसी लक्ष्य अभी भी ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार देशों के प्रयास लक्ष्य से काफी पीछे हैं। 2015 के पेरिस समझौता के तहत सभी देशों को हर पांच साल में अपने जलवायु लक्ष्य अपडेट करने होते हैं।
खनन परियोजनाओं के लिए वन भूमि उपयोग को एफएसी की मंजूरी
केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने कई खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। मध्य प्रदेश में कोयला खदानों के लिए 1,000 हेक्टेयर से अधिक और 470 हेक्टेयर भूमि के उपयोग को मंजूरी दी गई है।
सिंगरौली जिले में प्रस्तावित गोंडबहेरा-उझेनी ईस्ट कोयला खदान को भी मंजूरी मिली है, जहां जमीन धंसने का खतरा बताया गया है। सरकार ने इसके लिए जरूरी सुरक्षा और सुधार उपाय लागू करने को कहा है।
असम में तेल की खोज के लिए 24 घंटे ड्रिलिंग की अनुमति दी गई है, लेकिन शोर कम रखने और जंगल में श्रमिक शिविर न लगाने की शर्त रखी गई है। वहीं अरुणाचल प्रदेश की एक जलविद्युत परियोजना पर फैसला फिलहाल टाल दिया गया है।
ईरान युद्ध: कीटनाशकों की लागत बढ़ने की आशंका
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर भारत के कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। उद्योग संगठन क्रॉपलाइफ इंडिया ने चेतावनी दी है कि कीटनाशक बनाने में लगने वाली लागत 20-25% तक बढ़ सकती है। संगठन के अनुसार, प्रमुख समुद्री मार्गों में बाधा आने से जरूरी कीटनाशकों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे खेती के अहम मौसम में कमी आ सकती है और फसल की पैदावार व गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि उत्पादन घटने से छोटे उद्योगों और रोजगार पर दबाव बढ़ेगा। साथ ही बाजार में नकली और घटिया उत्पादों के बढ़ने का खतरा भी जताया गया है।
विकासशील देशों को दी जाने वाली जलवायु सहायता में 14% की कटौती करेगा ब्रिटेन
यूनाइटेड किंगडम ने विकासशील देशों को दी जाने वाली जलवायु सहायता में लगभग 14% की कटौती करने का फैसला किया है। अब यह सहायता घटकर करीब 2 अरब पाउंड प्रति वर्ष रह जाएगी।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम सरकार के कुल विदेशी सहायता बजट में कमी के बाद उठाया गया है, जिसे राष्ट्रीय आय के 0.35% तक सीमित कर दिया गया है। इस कटौती की एक बड़ी वजह ईरान युद्ध के कारण बढ़ा खर्च दबाव बताया जा रहा है।
सरकार ने अगले तीन वर्षों में लगभग 6 अरब पाउंड जलवायु खर्च की बात कही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक राशि इससे कम हो सकती है। पहले पांच साल में 11.6 अरब पाउंड खर्च किए गए थे।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
कार्बनकॉपी हिंदी में आपका स्वागत है।
आपको यह भी पसंद आ सकता हैं
-
पेरिस समझौते के तहत नए एनडीसी जमा नहीं करने वाले देशों पर होगी चर्चा, भारत भी सूची में
-
कूनो नेशनल पार्क में 5 शावकों का जन्म, भारत में चीतों की संख्या हुई 53
-
एनजीटी ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को दी हरी झंडी, कहा पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद
-
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत ‘संतुलित तरीके’ से कृषि आयात खोलने का फैसला, किसान संगठनों में चिंता
-
क्लाइमेट एक्शन भारत की विकास रणनीति का अहम हिस्सा: आर्थिक सर्वे
