पेरिस समझौते के तहत नए एनडीसी जमा नहीं करने वाले देशों पर होगी चर्चा, भारत भी सूची में

पेरिस जलवायु समझौते की निगरानी करने वाली समिति इस महीने उन 60 से अधिक देशों पर चर्चा करेगी जिन्होंने अब तक अपने नए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) जमा नहीं किए हैं। यह समयसीमा फरवरी 2025 में समाप्त हो गई थी। इन देशों में भारत भी शामिल है। पेरिस समझौते के तहत सभी देशों को हर पांच साल में अपनी संशोधित जलवायु योजना बतानी होती है कि वे वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने में कैसे योगदान देंगे।

संयुक्त राष्ट्र की पेरिस एग्रीमेंट इम्प्लीमेंटेशन एंड कंप्लायंस कमेटी (PAICC) 24 से 27 मार्च के बीच जर्मनी के बॉन शहर में बैठक करेगी। समिति देशों को सजा नहीं दे सकती, लेकिन उनसे स्पष्टीकरण मांग सकती है या सार्वजनिक रूप से उनकी देरी की जानकारी दे सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार जिन देशों ने नई योजना नहीं दी है, वे वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा हैं। भारत ने कहा था कि वह अपनी नई जलवायु योजना जल्द पेश करेगा

त्वरित पर्यावरण मंजूरी के लिए नया प्राधिकरण बनाने की तैयारी में सरकार

केंद्र सरकार पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया तेज करने के लिए नई व्यवस्था बनाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत स्टैंडिंग अथॉरिटी ऑन एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट (SAEIA) नामक नई संस्था बनाई जाएगी। यह संस्था उन परियोजनाओं का आकलन करेगी जहां राज्य स्तर की पर्यावरण आकलन संस्थाएं काम नहीं कर रही होंगी।

पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) किसी भी बड़े उद्योग, खनन या निर्माण परियोजना शुरू करने से पहले जरूरी होती है। अभी राज्यों में स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) और स्टेट लेवल एक्सपर्ट अप्रेज़ल कमेटी (SEAC) यह काम करती हैं।

इन संस्थाओं का कार्यकाल तीन साल का होता है। कई बार समय पर पुनर्गठन न होने से परियोजनाओं की मंजूरी रुक जाती है और फाइलें केंद्र के पास भेजनी पड़ती हैं। सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था से देरी कम होगी और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।

बढ़ती गर्मी से बाहर काम करना हो रहा मुश्किल: अध्ययन

मानव गतिविधियों से बढ़ रही वैश्विक गर्मी अब एक बड़ा स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है और इसका असर गरीब लोगों पर अधिक पड़ रहा है। एक नए अध्ययन में पाया गया कि दुनिया के गर्म क्षेत्रों में लोगों के सुरक्षित रूप से बाहर रहने के घंटे कम हो गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 35 प्रतिशत आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहां युवाओं के लिए भी रहने की स्थिति सीमित हो गई है, जबकि 78 प्रतिशत बुजुर्ग ऐसी जगहों पर रहते हैं जहां गर्मी के कारण जीवन कठिन हो रहा है। भारत में यह स्थिति सबसे गंभीर बताई गई है, खासकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों में। शोधकर्ताओं के अनुसार अत्यधिक गर्मी बुजुर्गों के लिए ज्यादा खतरनाक है और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण यह समस्या और बढ़ सकती है।

अमेरिका-ईरान युद्ध से भारत का बासमती निर्यात प्रभावित

अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर भारत के बासमती चावल निर्यात पर पड़ रहा है। शिपिंग बाधित होने से करीब 4 लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों पर या रास्ते में फंसा हुआ है। निर्यातकों ने सरकार से पोर्ट शुल्क माफ करने और स्थिति को ‘फोर्स मेज्योर’ घोषित करने की मांग की है। एशिया-खाड़ी मार्ग पर मालभाड़ा दरें बढ़कर 3,500 से 4,500 डॉलर प्रति कंटेनर हो गई हैं। पश्चिम एशिया भारत के बासमती निर्यात का 60-70 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है, जबकि ईरान अकेले लगभग 20 प्रतिशत खरीदता है। बढ़ती ईंधन, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत से निर्यातकों के अनुबंध और नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ रहा है।

उद्योगों के लिए कैप्टिव पावर नियमों में संशोधन

सरकार ने बिजली नियमों में संशोधन की घोषणा की है जिससे विशेष रूप से उद्योगों के लिए कैप्टिव पावर उत्पादन के नियमों को अधिक स्पष्ट बनाया जा सके। बिजली मंत्रालय ने कहा कि उपभोग की जगह के पास ही बिजली उत्पादन से ट्रांसमिशन में हानि कम होगी और बिजली प्रणाली अधिक मजबूत बनेगी।

मंत्रालय के अनुसार, ये संशोधन हितधारकों से व्यापक परामर्श के बाद किए गए हैं। बिजली (संशोधन) नियम, 2026 का उद्देश्य नियमों में अस्पष्टता दूर करना और उद्योगों के लिए कारोबार को आसान बनाना है। नए प्रावधानों में स्वामित्व की परिभाषा स्पष्ट की गई है और ग्रुप कैप्टिव परियोजनाओं के नियम सरल किए गए हैं। साथ ही सत्यापन लंबित रहने तक उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से भी राहत दी गई है। इससे उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

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