संसद में पेश किए गए 2024-25 के आर्थिक सर्वे में भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार, वी अनंत नजवरन ने चेतावनी दी है कि विकसित राष्ट्रों से वित्तीय सहायता की कमी के कारण विकासशील देश अपने जलवायु लक्ष्यों को संशोधित करने के लिए बाध्य हो सकते हैं। उन्होंने कॉप29 से मिले क्लाइमेट फाइनेंस पैकेज को नाकाफी बताते हुए, विकसित देशों की आलोचना की।
आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि विकसित देशों से समर्थन की कमी के बीच, विकाशसील देशों को क्लाइमेट एक्शन के लिए घरेलू संसाधनों का रुख करना होगा। इसलिए, विकास कार्यों के लिए संसाधन प्रभावित हो सकते हैं, और सस्टेनेबल डेवलपमेंट के उद्देश्यों की ओर प्रगति धीमी हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऐसे स्थिति में भारत को क्लाइमेट रेसिलिएंस को प्राथमिकता देनी चाहिए। सर्वे में रीजनल स्तर पर अडॉप्टेशन के प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। साथ ही बैटरी स्टोरेज रिसर्च, क्लाइमेट-रेसिलिएंट खेती और कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकी में निवेश के महत्व पर भी बल दिया गया है।
इस वर्ष सभी देशों को 2031-2035 की अवधि के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) प्रस्तुत करने हैं। आर्थिक सर्वे में सरकार ने कहा है कि ‘फंडिंग की कमी के चलते जलवायु लक्ष्यों की पुनरावृत्ति हो सकती है’।
कॉप29 में निर्धारित 300 बिलियन डॉलर के वार्षिक क्लाइमेट फाइनेंस लक्ष्य का ज़िक्र करते हुए सर्वे में कहा गया है कि यह 2030 तक 5.1-6.8 ट्रिलियन डॉलर की अनुमानित आवश्यकता से काफी कम है। सर्वे में कहा गया कि यह दर्शाता है कि उत्सर्जन में कटौती और विकासशील क्षेत्रों में संवेदनशील आबादी पर जलवायु परिवर्तन प्रभावों को कम करने के लिए, संपन्न, विकसित देश अपनी न्यायसंगत जिम्मेदारी को पूरा करने के इच्छुक नहीं हैं।
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