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कोविड से रिकवरी तो हो जाएगी, मगर रिकवरी पैकेज से रिकवरी कैसे होगी?

दुनिया भर में, कोविड महामारी के बाद जनता की सेहत और पर्यावरण को बचाने के इरादे से दिए कुल 11.8 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक पैकिज का अधिकांश हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में निवेश किया जायेगा जो लम्बे समय में पर्यावरण के लिए बेहद बुरे साबित होंगे। और तब, स्थिति को संभालना मुश्किल होगा।

कोविड की मार से उबरने के लिए तमाम देशों की सरकारें आर्थिक रिकवरी पैकेज घोषित कर चुकी हैं। इरादा सभी का है अपने देश को इस मुश्किल दौर से बाहर निकालना। लेकिन कोविड के असर से डूबती अर्थव्यवस्थाओं को उबारने वाले ये रिकवरी पैकेज दुनिया को एक नयी आपदा में धकेलते नज़र आते हैं। विविड इकोनोमिक्स की इस ताज़ा रिपोर्ट से तो ये ही समझ आता है।

ग्रीन स्टिम्युलस इंडेक्स नाम की इस रिपोर्ट की मानें तो दुनिया भर में कोविड महामारी के बाद जनता की सेहत और पर्यावरण को बचाने के इरादे से दिए कुल 11.8 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक पैकिज का अधिकांश हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में निवेश किया गया है या किया जायेगा जो लम्बे समय में पर्यावरण के लिए बेहद बुरे साबित होंगे। और तब, स्थिति को संभालना और भी मुश्किल हो चुका होगा।

हैरत की बात ये है अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्र संघ, और अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी जैसी तमाम संस्थाएं सभी देशों को ऐसे निवेशों के परिणामों के बारे में जागरूक करती आयी हैं। लेकिन इसके बावजूद भी अगर देशों की प्राथमिकतायें ऐसी हों तो ये पैकेज आपदा को अवसर बनाने की जगह आपदा को विपदा बनाने की तैयारी करते दिखते हैं।

विविड इकोनोमिक्स ने पहले विश्व की 17 अर्थव्यवस्थाओं के कोविड रिकवरी पैकिजों को उनके द्वारा जीवाश्म ईंधन, अक्षय ऊर्जा, और प्रदूषण फ़ैलाने वाले उद्योगों को दिए जाने वाले सहयोग और प्राथमिकताओं के आधार पर समझा। उसके बाद इन देशों की एक रैंकिंग तैयार की गयी जिसे ग्रीन स्टिम्युलस इंडेक्स का नाम दिया गया।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत इस इंडेक्स में नेगेटिव स्कोर ले कर, चीन और रूस जैसे देशों के साथ खड़ा है। भारत के साथ जो सोलह और देश हैं, वो हैं, चीन, इंडोनेशिया, अमरीका, रूस, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, जापान, स्पेन, कोरिया, जर्मनी, यूके, फ़्रांस, और युरोपियन यूनियन।

विविड एक्नौमिक्स के वरिष्ठ अर्थशास्त्री, मटो सलाज़ार कहते हैं, “कोविड की शक्ल में पूरी दुनिया अपनी तरह का ऐसा कुछ पहली बार अनुभव कर रही है। यह बड़ी नाज़ुक स्थिति है। मानव गतिविधियों ने पहले ही पर्यावरण और प्रकृति को नुकसान पहुँचाया हुआ है। और अब इन आर्थिक पैकिजों की प्राथमिकताओं को देख लगता है जलवायु संकट के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है।”

सलाज़ार आगे बताते हैं, “घोषित प्रोत्साहन पैकेज सीधे उन क्षेत्रों में खरबों डॉलर पंप करेंगे जिनका प्रकृति पर बड़ा और स्थायी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। असलियत यह है कि ग्रीन स्टिमुलस नौकरियों को बचाने और स्थायी विकास सुनिश्चित करने की एक कुंजी है। इस कुंजी का सही प्रयोग होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार 2020 में 300 मिलियन से अधिक नौकरियों के नष्ट होने की आशंका है। ऊर्जा दक्षता या नवीकरणीय क्षेत्रों में निवेश किए गए प्रति डॉलर जीवाश्म ईंधन क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक नौकरियां पैदा होती हैं।”

बात भारत की करें को जो कुछ एहम बातें सामने आती हैं, वो हैं:

  • भारत ने COVID के जवाब में 266 बिलियन अमेरिकी डॉलर का राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज पारित किया है।
  • भारत का प्रारंभिक पैकेज स्वास्थ्य सेवा और कल्याण के लिए समर्थन पर केंद्रित है, लेकिन आगे के फैसलों में व्यवसायों के लिए पर्याप्त समर्थन और कृषि क्षेत्र के लिए लक्षित समर्थन शामिल है।
  • भारत का नकारात्मक सूचकांक स्कोर खराब अंतर्निहित पर्यावरण प्रदर्शन और विशिष्ट हानिकारक उपायों से प्रेरित है जिसमें कोयले के लिए महत्वपूर्ण समर्थन शामिल है। हालाँकि, सरकार ने पर्यावरण के अनुकूल उपायों की कुछ घोषणाएँ की हैं।
  • भारत की राज्य की खानों से बाजार में कोयला लाने में मदद करने के लिए कोयला बुनियादी ढांचे के लिए भारत का US $ 6.6 मिलियन का वित्तपोषण।
  • आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र लाभ प्रदान करते हुए ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए डिज़ाइन किए गए वनीकरण कार्यक्रम की दिशा में यूएस $ 780 मिलियन। यह धनराशि क्षतिपूरक वनीकरण प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) कोष के माध्यम से प्रदान की जाती है।
  • भारत अपने व्यापारिक भागीदारों से तेल भंडार की एक रणनीतिक राशि हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए विविड एक्नौमिक्स के वरिष्ठ अर्थशास्त्री, मटो सलाज़ार कहते हैं, “कोविड की शक्ल में पूरी दुनिया अपनी तरह का ऐसा कुछ पहली बार अनुभव कर रही है। यह बड़ी नाज़ुक स्थिति है। मानव गतिविधियों ने पहले ही पर्यावरण और प्रकृति को नुकसान पहुँचाया हुआ है। और अब इन आर्थिक पैकिजों की प्राथमिकताओं को देख लगता है जलवायु संकट के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है।”

आगे और देशों के पैकिजों की बात करें तो पड़ोसी मुल्क चीन का रिकवरी पैकिज भी ख़ासा आलोचनीय है और अच्छे बुरे का मिश्रण है जहाँ कुल मिलाकर पैकिज पर्यावरण के लिए बुरा ही साबित होता दिखता है। चीन ने राजकोषीय प्रोत्साहन में कुल यूएस $ 592 बिलियन पारित किया है। स्वास्थ्य देखभाल और कल्याणकारी उपायों के साथ, प्रोत्साहन पैकेज में चीन के बड़े और पर्यावरणीय रूप से गहन औद्योगिक क्षेत्र के लिए पर्याप्त समर्थन शामिल है। साथ ही, इस पैकिज में कोयला परमिट स्वीकृतियों की गति बढाने की बात है, जो कि 2020 तक कोयले को राष्ट्रीय ऊर्जा खपत के 58 प्रतिशत तक सीमित रखने की सरकार की प्रतिबद्धता के विपरीत है।

अब बात विश्वशक्ति अमेरिका की करें तो वहां भी हालात बुरे ही हैं। अमरीका ने 2.98 ट्रिलियन डॉलर का कुल पैकिज पास किया है। उसका नकारात्मक स्कोर काफी हद तक अपर्याप्त अंतर्निहित पर्यावरण प्रदर्शन, पर्यावरण मानकों के व्यापक प्रसार और बड़े बिना शर्त एयरलाइन खैरात के कारण है। वहां एकमात्र सकारात्मक घोषणा अनुसंधान और विकास के लिए सब्सिडी है।

पर्यावरण अनुकूल आर्थिक पैकिजों की करें तो यूरोपीय यूनियन, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम उम्मीद जगाते हैं। यूरोपीय यूनियन का पैकिज सबसे लुभावना और पर्यावरण अनुकूल है। 830 बिलियन डॉलर के इस पैकिज का 30 प्रतिशत सीधे तौर पर पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों के लिए आवंटित है। सबसे अच्छी बात है कि रिकवरी के लिए सस्द्य देशों को दी जाने वाली राशि इस शर्त के साथ दी जाएगी कि उनके द्वारा उस राशि से पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुंचाई जाएगी। जर्मनी की बात करें तो उन्होंने अपने रिकवरी पैकिज में अभी 45बिलियन डॉलर का इज़ाफ़ा किया और उसे नाम दिया भविष्य का पैकिज।  ये हालाँकि उनके कुल पैकिज का एक छोटा हिस्सा है, लेकिन इसे पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों के लिए रखा गया है।

अब तक अमेरिका, रूस, मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका ने कोई पर्यावरणीय रूप से सकारात्मक पैकेज नहीं दिया है। जबकि चीन और इंडोनेशिया में विशाल कार्बन-गहन क्षेत्रों के लिए समर्थन उनके सकारात्मक उपायों से आगे निकल जाता है। वहीँ यूरोपियन यूनियन, दक्षिण कोरिया, फ्रांस, जर्मनी और यूके ऐसे देशों में से हैं जिन्होंने कई पर्यावरण अनुकूल उपायों के साथ जवाब दिया है। ब्रसेल्स रिकवरी पैकेज संभवतः आज तक का सबसे पर्यावरण के अनुकूल प्रोत्साहन पैकेज है।

पूरे इंडेक्स पर मटो सलाज़ार अपनी बात समेटते हुए कहते हैं, “घोषित प्रोत्साहन पैकेज सीधे उन क्षेत्रों में खरबों या डॉलर को पंप करेंगे जिनका प्रकृति पर बड़ा और स्थायी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। असलियत यह है कि ग्रीन स्टिमुलस नौकरियों को बचाने और स्थायी विकास सुनिश्चित करने की एक कुंजी है। इस कुंजी का सही प्रयोग होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार 2020 में 300 मिलियन से अधिक नौकरियों के नष्ट होने की आशंका है। ऊर्जा दक्षता या नवीकरणीय क्षेत्रों में निवेश किए गए प्रति डॉलर जीवाश्म ईंधन क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक नौकरियां पैदा होती हैं।” अब देखना यह है कि इन प्राथमिकताओं के साथ पूरी दुनिया कैसे इन्सान की सेहत, जलवायु परिवर्तन से उसकी सुरक्षा, और आर्थिक विकास में तालमेल बना पाती है।

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