वायु प्रदूषण से क्यों बढ़ता है अस्थमा ? वैज्ञानिकों ने खोजे ऐसे जीन जो तय करते हैं खतरे की गंभीरता
वायु प्रदूषण का असर अस्थमा के सभी मरीजों पर एक जैसा नहीं पड़ता। अब एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ऐसे आनुवंशिक (जेनेटिक) बदलावों की पहचान की है, जो यह तय करते हैं कि PM2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक कण किसी व्यक्ति के फेफड़ों को कितना नुकसान पहुंचाएंगे। यह शोध भविष्य में अस्थमा के अधिक प्रभावी और व्यक्तिगत उपचार का रास्ता खोल सकता है।
अमेरिका के शोधकर्ताओं ने देशभर के करीब 1,000 अस्थमा मरीजों के जीन, वायु प्रदूषण के संपर्क और फेफड़ों की कार्यक्षमता का विश्लेषण किया। अध्ययन में सात जीनों से जुड़े 20 आनुवंशिक वैरिएंट मिले, जो शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। कुछ जीन प्रदूषण से होने वाले नुकसान से सुरक्षा देते हैं, जबकि कुछ फेफड़ों की क्षति और अस्थमा के लक्षणों को और गंभीर बना देते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में एक साधारण जेनेटिक टेस्ट से ऐसे लोगों की पहचान की जा सकेगी, जिन पर वायु प्रदूषण का खतरा सबसे अधिक है। इससे व्यक्तिगत उपचार के साथ-साथ जोखिम वाले समूहों के लिए लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियां विकसित की जा सकेंगी। हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि प्रदूषण कम करना ही अस्थमा के खतरे को घटाने का सबसे प्रभावी उपाय बना रहेगा।
दिल्ली में एआई-आधारित सिस्टम से और सटीक होगा एक्यूआई का पूर्वानुमान
दिल्ली में वायु प्रदूषण के पूर्वानुमान को अधिक सटीक बनाने के लिए आईआईटी-कानपुर की एयरावत रिसर्च फाउंडेशन (एआरएफ) एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)-आधारित डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) विकसित कर रही है। पायलट परियोजना के तहत तैयार हो रहा यह सिस्टम लगातार मिलने वाले प्रदूषण-संबंधी लाइव आंकड़ों का विश्लेषण करेगा। इससे प्रदूषण बढ़ने के शुरुआती संकेत पहले ही मिल सकेंगे और हालात बिगड़ने से पहले आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे।
मौजूदा डीएसएस पुरानी उत्सर्जन जानकारी पर आधारित है और सर्दियों के अलावा इसकी सटीकता कम हो जाती है। नया एआई सिस्टम पुराने और नए एक्यूआई आंकड़ों से लगातार सीखते हुए समय के साथ अपने पूर्वानुमानों को और अधिक सटीक बनाता जाएगा।
रोक के बावजूद दिल्ली-एनसीआर के आधे से अधिक ईंट-भट्ठों में कोयले का इस्तेमाल: रिपोर्ट
विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की रिपोर्ट 'रूल्स विदाउट रीच' में खुलासा हुआ है कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) द्वारा कोयले पर रोक के बावजूद 70% से अधिक ईंट-भट्ठे चालू रहे। रिपोर्ट के अनुसार बागपत, गाजियाबाद, बुलंदशहर, शामली, झज्जर, पानीपत और सोनीपत के 2025-26 के सर्वे में निगरानी और सख्त कार्रवाई का अभाव मिला।
अधिकांश भट्ठों ने कागजों पर जिग-जैग तकनीक अपनाई। इसमें कच्ची ईंटों को टेढ़े-मेढ़े क्रम में लगाया जाता है, जिससे गर्म हवा घुमावदार रास्ते से गुजरती है और कम ईंधन में ईंटें पकती हैं तथा प्रदूषण घटता है। हालांकि, कई भट्ठों में दरारें, खराब प्लास्टर और अधिक ईंधन खपत पाई गई। कई स्थानों पर छिपाकर कोयला भंडारित किया गया। भट्ठा मालिकों ने कहा कि उन्हें पर्याप्त तकनीकी सहायता या औपचारिक सूचना नहीं मिली। सीएसई ने वित्तीय मदद, तकनीकी मार्गदर्शन और कड़ी निगरानी की सिफारिश की है।
ट्रंप प्रशासन को झटका, अमेरिकी अदालत ने कालिख प्रदूषण पर सख्त नियम बरकरार रखे
अमेरिका की एक अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें घातक कालिख (सूट/PM2.5) प्रदूषण पर लगाए गए सख्त मानकों को समाप्त करने की मांग की गई थी। अदालत के फैसले के बाद पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में लागू किया गया स्वच्छ वायु नियम फिलहाल प्रभावी रहेगा।
2024 में लागू इस नियम के तहत हवा में सूक्ष्म कण (PM2.5) की वार्षिक सीमा 12 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से घटाकर 9 माइक्रोग्राम कर दी गई थी। यह मानक कोयला आधारित बिजलीघरों, उद्योगों और अन्य स्रोतों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह नियम उद्योगों पर आर्थिक बोझ बढ़ाएगा, लेकिन अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। पर्यावरण संगठनों ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा की दिशा में बड़ी जीत बताया।