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अर्थव्यवस्था को होगा क़रीब 15 लाख करोड़ का नुकसान, क्योंकि मज़दूर होगा धूप से परेशान!

बात गर्मी सहने की हो तो वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, 35 डिग्री के वेट बल्ब तापमान को आमतौर पर मानव अस्तित्व के लिए गर्मी सहने की सीमा के रूप में देखा जाता है। इस तापमान पर एक स्वस्थ मनुष्य लगभग पांच घंटे तक छाया में आराम कर सकता है।

आगे बढ़ने से पहले आपको वेट बल्ब थर्मामीटर और उसके तापमान के बारे में बता दें। क्योंकि इस थर्मामीटर के बल्ब पर एक गीला कपड़ा लगा होता है इसलिए इसे वेट बल्ब थर्मामीटर कहते हैं। वेट बल्ब थर्मामीटर से मिला तापमान वो तापमान है जिस पर हवा को लगातार दबाव में पानी के वाष्पीकरण द्वारा ठंडा किया जा सकता है। इसी वजह से इसकी रीडिंग सामान्य थर्मामीटर से कम होती है।   

अब बात भारत की करें तो फ़िलहाल हमारे देश में सबसे खराब गर्मी की लहरों के दौरान भी वेट बल्ब तापमान शायद ही कभी 32 डिग्री से अधिक गया है। लेकिन जलवायु संबंधी ताज़ा विश्लेषण संकेत दे रहे हैं कि 2030 तक भारत में गर्मी की लहरों के दौरान ता वेट बल्ब तापमान 34 डिग्री के आँकड़े को पार करने लगेगा।

दरअसल अमेरिका की मैनेजमेंट कंसल्टेंसी फर्म मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआइ) की ‘विल इंडिया गेट टू हॉट टू वर्क’ नाम की एक ताज़ा केस स्टडी की मानें तो 2030 तक जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय जीडीपी में करीब 14.75 लाख करोड़ का खतरा पैदा हो गया है। रिपोर्ट यह अनुमान लगाती है कि बढ़ती गर्मी और उमस के कारण धूप में मेहनत मज़दूरी में कमी आएगी और इसके चलते अगले दस सालों के अंत तक अर्थव्यवस्था का लगभग 2.5 से 4.5 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन से भारतीय अर्थव्यवस्था को, वर्ष 2030 तक, क़रीब 200 अरब डॉलर (करीब 14.75 लाख करोड़ रुपये) के आसपास का नुकसान हो सकता है।

और हैरान करने वाली बात ये है कि यह नुकसान होगा गर्मी की वजह से। खुले वातावरण में जब काम करना मुश्किल होगा तो ज़ाहिर है काम करने वाले श्रमिकों का आउटपुट घटेगा और इसी वजह से इकोनॉमी को 2.5-4.5 प्रतिशत के नुकसान का अनुमान है। वर्तमान की तुलना में 2030 तक दिन के दौरान खुले में काम होने में 15 फ़ीसद की गिरावट देखी जा सकती है। 2017 के आंकड़ों को आधार बनाते हुए एमजीआइ का कहना है कि भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में खुले वातावरण में किये किए जाने वाले कामों का हिस्सा करीब पचास फ़ीसद है। और खुले आसमान के नीचे, धूप में काम करने वाले श्रमिकों का हिस्सा देश की कुल श्रमशक्ति का क़रीब तीन-चौथाई है।

आगे बढ़ें से पहले यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में सक्षम होने के कारण ही मनुष्य पृथ्वी पर राज कर पा रहा है। वैसे तो प्रकृति ने हमारे शरीर को अच्छे से गर्मी को झेलने के लिए डिज़ाइन किया है लेकिन जलवायु परिवर्तन अब हमारे शरीर को चुनौती देता दिख रहा है क्योंकि गर्म मौसम वैसे भी हमारी शारीरिक क्षमताओं को सीमित करता है और अब बढ़ते तापमान से ये सीमाएँ और कस रही हैं

और इस सबसे बचने का एक ही उपाय है और वो है ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना। कोविड की वजह से लगे लॉक डाउन में ऐसा लग रहा था कि उत्सर्जन में ख़ासी कमी आ गयी है, लेकिन विश्व मौसम विज्ञान संस्थान के आँकड़े बताते हैं कि लॉक डाउन में सिर्फ़ प्रदूषण में कमी आयी लेकिन ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में फ़िलहाल कोई कमी नहीं देखी जा रही।

खैर, भारत फ़िलहाल तेज़ी से बदलते वातावरण का सामना कर रहा है। जल की कमी और वायु प्रदूषण की चुनौतियां सबके सामने हैं। लेकिन अगर कुछ है जिसकी फ़िलहाल उपेक्षा होती दिखती है तो वो है अत्यधिक गर्मी के स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव। बात यहाँ से आगे की करें तो हालांकि, एक देश के तौर पर हम COVID-19 महामारी के प्रबंधन में व्यस्त हैं, लेकिन हम बढ़ते जलवायु जोखिम को अपनी नज़रों से नहीं हटने दे सकते। फ़िलहाल अगर हम आर्थिक और पर्यावरणीय लचीलेपन को कोविड के असर से उबरने की नीतियों का आधार बनाते हैं तो हम न सिर्फ़ कुछ आर्थिक सफलता हासिल कर सकते हैं, बल्कि हम जलवायु परिवर्तन के खतरों को भी कम करने में जीत हासिल कर सकते हैं।

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