बाढ़ के बाद नेपाल की हाइड्रोपावर रणनीति पर सवाल, सौर-पवन ऊर्जा बढ़ाने की मांग
अगस्त में आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल की हाइड्रोपावर पर निर्भरता के जोखिम को उजागर कर दिया है। देश की करीब पूरी बिजली जलविद्युत से आती है और वह भारत व बांग्लादेश को बिजली निर्यात कर हर साल करीब 20 करोड़ डॉलर कमाता है। लेकिन बाढ़ ने त्रिशूली नदी बेसिन के 12 हाइड्रोपावर संयंत्रों को गंभीर नुकसान पहुंचाया और देश की 10 फीसदी से अधिक बिजली उत्पादन क्षमता ठप हो गई।
विशेषज्ञों ने बदलते क्लाइमेट रिस्क के बीच संयंत्रों की डिजाइन, स्थान का चयन, अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम और आपातकालीन निकासी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई है। कुछ विशेषज्ञों ने सौर और पवन ऊर्जा में निवेश बढ़ाकर ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की भी मांग की है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि हाइड्रोपावर नेपाल को क्षेत्रीय स्तर पर बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देता है। अधिकारियों के अनुसार, भविष्य में अधिक लचीली और क्लाइमेट-रिस्क आधारित हाइड्रोपावर नीति जरूरी होगी।
भारत के लिए यूरेनियम से थोरियम आधारित परमाणु ईंधन की ओर बढ़ना जरूरी: अनिल काकोडकर
परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोडकर ने कहा है भारत को दीर्घकालीन ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए यूरेनियम से थोरियम आधारित परमाणु ईंधन की ओर संक्रमण को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके मुताबिक, दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ने के साथ आने वाले वर्षों में यूरेनियम की आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत के पास थोरियम के बड़े भंडार हैं, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने के लिए पहले पर्याप्त यूरेनियम-233 (U-233) तैयार करना होगा। काकोडकर के अनुसार, मौजूदा PHWR परमाणु रिएक्टरों में थोरियम आधारित ईंधन के इस्तेमाल से इस दिशा में तेजी लाई जा सकती है। भारत का 2047 तक 100 GWe परमाणु क्षमता का लक्ष्य भी इस संक्रमण के लिए अवसर पैदा करता है। हालांकि, बड़े पैमाने पर थोरियम ऊर्जा का उपयोग अभी कई दशकों दूर है। विशेषज्ञ के मुताबिक, यह भारत की दीर्घकालीन ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
नवीकरणीय क्षमता को ग्रिड से जोड़ना बड़ी चुनौती: सरकार
भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादन की नई क्षमता 18 से 24 महीने में स्थापित की जा सकती है, लेकिन इसे ग्रिड से जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में तीन से पांच साल लग सकते हैं। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने कहा कि यह अंतर स्वच्छ ऊर्जा ट्रांज़िशन के सामने बड़ी चुनौती है।
पत्रकारों से बातचीत के दौरान सारंगी ने बताया कि नवीकरणीय बिजली की अनियमितता से निपटने के लिए बैटरी एनर्जी स्टोरेज, मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और ग्रिड प्रबंधन में एआई व डिजिटल तकनीक जरूरी होगी। भारत को 2031 तक करीब 239 गीगावॉट-ऑवर बैटरी स्टोरेज की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि रिन्यूएबल क्षेत्र के अगले चरण के लिए घरेलू और विदेशी निवेश दोनों जरूरी होंगे। अब तक इस क्षेत्र में करीब 18 लाख करोड़ रुपए का निवेश हो चुका है।
मिस्र में सोलर पैनलों के नीचे खेती का प्रयोग, पानी की बचत पर जोर
मिस्र में एग्रीवोल्टिक्स तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है, जिसमें फसलों के ऊपर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और उसी जमीन पर खेती व बिजली उत्पादन दोनों किया जाता है। दक्षिण सिनाई के नुवेइबा स्थित हबीबा फार्म में चल रहे पायलट प्रोजेक्ट में ऊंचाई पर लगे पैनल फसलों को आंशिक छाया देते हैं और सौर ऊर्जा पैदा करते हैं।
अधिकारियों के अनुसार, छाया से मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण 20 से 30 फीसदी तक कम हो सकता है। इससे रेगिस्तानी इलाकों में पानी की बचत के साथ फसलों को अत्यधिक गर्मी से राहत मिल सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार बहुत ज्यादा छाया से फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है और परिणाम फसल व पैनल की डिजाइन पर निर्भर करते हैं। मिस्र अब अल मोगरा में बड़ा प्रोजेक्ट लगाने की तैयारी कर रहा है।