भारत की जैव-सांस्कृतिक विरासत को क्षति पहुंचा रहा है जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन भारत में जैव-विविधता, संस्कृति और आदिवासी ज्ञान के बीच के नाजुक संबंध को तोड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण के प्रयासों में इन तीनों को ही बचाना ज़रूरी है।

Hridayesh Joshi26 अग॰. 2026
भारत की जैव-सांस्कृतिक विरासत को क्षति पहुंचा रहा है जलवायु परिवर्तन

दृश्य श्रेय: Paridhi Choudhary


भरत सिंह चौहान उत्तराखंड के चमोली जिले के पुलना गांव रहते हैं। इसी गांव से थोड़ा आगे है यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट वैली ऑफ़ फ्लावर्स। इस राष्ट्रीय उद्यान को फ़ूलों की घाटी के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन 66 वर्षीय चौहान इस घाटी की खूबसूरती की बात नहीं करते बल्कि यहां पाये जाने वाले दुर्लभ ब्रह्म कमल (Saussurea obvallata) के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं।

यह एक पवित्र अल्पाइन (बुग्यालों में होने वाला) फूल है, जो आमतौर पर अगस्त और सितंबर में खिलता है। चौहान के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में यह फूल अपने सामान्य समय से पहले खिलने लगा है। अब यह घाटी के कुछ ही हिस्सों में बचा है और पहले की तुलना में अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में ही दिखाई देता है।

चौहान ने जुलाई की शुरुआत में कार्बनकॉपी से बात की थी। उन्होंने कहा: "यह फूल भगवान शिव और नंदा देवी को चढ़ाया जाता है। अगर यह इन पहाड़ों से लगातार गायब होता गया तो यह सिर्फ प्रकृति का नुकसान नहीं होगा, बल्कि इससे हमारी आस्था और हमारे समुदाय की भी हानि होगी।"

वैली ऑफ़ फ्लावर्स में खिलता हुआ ब्रह्म कमल (सौसुरिया ओबवल्लाटा)। फोटो- भरत सिंह चौहान

इसके कुछ हफ़्तों बाद, हमारी मुलाकात झारखंड की राजधानी रांची के बाहरी इलाके में 40 साल की पूनम टोपनो से हुई। यहां भुसूर गांव में उन्होंने भी प्रकृति में ऐसे ही बदलावों के बारे में बताया। टोपनो वे सखुआ (साल, Shorea robusta) के पेड़ में हो रहे बदलावों का जिक्र किया। सखुआ के फूल सरहुल पर्व का अहम हिस्सा हैं।   यह पर्व ओड़ांव, मुंडा, सरना और हो समुदायों के लिए वसंत और नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है।

टोपनो कहती हैं, "जब फूल खिलने का समय बदलता है तो हमें चिंता होती है, क्योंकि हमारी परंपराएं प्रकृति से गहराई से जुड़ी हैं।"

यह दो मुलाकातें भले ही लगभग 1,000 किलोमीटर की दूरी पर हुईं, लेकिन यह धीरे-धीरे हो रहे जलवायु परिवर्तन के एक ऐसे प्रभाव की ओर इशारा करती हैं जिसकी कीमत आर्थिक नुकसान के रूप में नहीं दिखाई देती। इसे गैर-आर्थिक हानि और क्षति (non-economic loss and damage) कहा जाता है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन केवल इकोसिस्टम को ही नहीं बदल रहा है। बल्कि पूरे भारत में फूलों के खिलने के मौसम, प्रजातियों के भौगोलिक विस्तार और इकोलॉजिकल चक्रों में भी बदलाव हो रहा है जिसके चलते त्योहारों, पवित्र प्राकृतिक स्थलों और आदिवासी ज्ञान प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ रहा है जो प्रकृति के साथ-साथ विकसित हुई है।

मानव संस्कृति और प्रकृति के इस आपसी संबंध को जैव-सांस्कृतिक विविधता (biocultural diversity) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि इकोसिस्टम, प्रजातियां, भाषाएं, आस्थाएं और पारंपरिक ज्ञान पीढ़ियों के दौरान साथ-साथ विकसित हुए हैं और उन्होंने एक-दूसरे को गहराई से प्रभावित किया है। लेकिन जलवायु परिवर्तन इस नाजुक संबंध के लिए खतरा बन रहा है।

इससे एक बड़ा सवाल भी उठता है: अगर संरक्षण का लक्ष्य प्रकृति की रक्षा करना है तो क्या लोगों के प्रकृति के साथ सांस्कृतिक संबंधों की रक्षा भी इसमें शामिल नहीं होनी चाहिए?

जैव-सांस्कृतिक विविधता

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के पूर्व प्रोफेसर डॉ. रमन सुकुमार का नाम भारत के प्रमुख संरक्षण जीवविज्ञानियों में लिया जाता है। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन समुदायों को उन परंपराओं पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है, जो सदियों से प्रकृति के साथ विकसित हुई हैं।

डॉ. सुकुमार ने कहा: "प्राचीन समाज प्रकृति के साथ रहते हुए और उस पर निर्भर रहते हुए विकसित हुए। जब जलवायु परिवर्तन इन पारिस्थितिकी तंत्रों को बदलता है तो लोगों को खुद को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालना पड़ता है, पलायन करना पड़ता है या कुछ सांस्कृतिक प्रथाओं को छोड़ना पड़ता है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि जिन प्रजातियों पर वे निर्भर हैं, वे गायब हो जाएं या अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में चली जाएं।"      

उन्होंने पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों के सबसे ऊंचे इलाकों में कई हजार वर्षों से रह रहे टोडा समुदाय का उदाहरण दिया। यह पशुपालक समुदाय अपने अनुष्ठानों में कई पवित्र पौधों का इस्तेमाल करते हैं। जलवायु परिवर्तन से ऐसे पौधे विलुप्त हो सकते हैं और उनके पवित्र प्राकृतिक स्थलों का स्वरूप भी बदल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके खत्म होने से पहले भारत को इस जीवित विरासत के दस्तावेजीकरण, निगरानी और संरक्षण के नए तरीके खोजने होंगे।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की लीड ऑथर और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) में क्लाइमेट रेजिलिएंस, फाइनेंस एंड लॉस एंड डैमेज की निदेशक रितु भारद्वाज कहती हैं कि दुनिया भर के समुदायों से ऐसे प्रमाण सामने आ रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक जीवनशैली को एक साथ प्रभावित कर रहा है।

उन्होंने कहा: "हिमालय में बुरांश (Rhododendron) का समय से पहले खिलना, मध्य भारत में महुआ के जीवन चक्र (फ्लॉवरिंग साइकिल) में बदलाव और सुंदरबन में शहद संग्रह में कमी जैसे बदलाव दर्शाते हैं कि किस तरह इकोलॉजिकल चेंज से सांस्कृतिक हानि हो रही है। ये पर्यावरणीय प्रभाव एक दूसरे से अलग नहीं हैं। यह संयुक्त रूप से जैव विविधता, आजीविका, पारंपरिक ज्ञान और विरासत को हो रहे नुकसान का द्योतक हैं, जिन्हें स्थनीय समुदायों ने पीढ़ियों से संजोया है।"

प्रकृति का स्वरूप बदल रहा है जलवायु परिवर्तन 

अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान दुनिया भर में पौधों की प्रजातियों के जीवन चक्र को बदल रहे हैं। पुष्पन (फ्लॉवरिंग), परागण (पॉलिनेशन) और फलन (फ्रूटिंग) के समय में बदलाव हो रहा है। यह फीनोलॉजी, यानि पौधों के जीवन-चक्र के अहम स्तर हैं। कई प्रजातियों में कुछ दशकों पहले की तुलना में फ्लॉवरिंग पहले हो रही है। इन बदलावों से लंबे समय से चले आ रहे पारिस्थितिक संबंध प्रभावित हो रहे हैं।

एक अध्ययन में 1794 से 2024 के बीच एकत्र किए गए उष्णकटिबंधीय पौधों के 8,000 से अधिक नमूनों की जांच की गई। इसमें पाया गया कि फूल खिलने का समय हर दशक में औसतन दो दिन आगे (पहले) हो गया है। यह संकेत है कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय इकोसिस्टम्स की सीजनल लय को महत्वपूर्ण रूप से बदल रहा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन बदलावों के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। अगर फूल अपने परागण करने वाले कीड़ों के निकलने या पहुंचने से पहले खिल जाएं तो परागण की प्रक्रिया विफल हो सकती है। इससे बीजों का उत्पादन घट सकता है और लंबे समय में पौधों के अस्तित्व पर खतरा हो सकता है। इन बदलावों का असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है और उन कीड़ों, पक्षियों तथा स्तनधारियों को भी प्रभावित कर सकता है जो भोजन और आवास के लिए इन पौधों पर निर्भर हैं।

भारत के अलग-अलग हिस्सों से भी ऐसे प्रभावों के प्रमाण मिल रहे हैं। अध्ययनों में हिमालयी बुरांश में फूल आने के समय में बदलाव से लेकर आम के उत्पादन तक जलवायु संबंधी प्रभाव दर्ज किए गए हैं। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में हुए शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि मानसून ज़ोन में उगने वाले हिमालयी देवदार के जंगल भविष्य में घट सकते हैं। इसकी वजह सर्दियों और वसंत के दौरान बढ़ता तापमान हो सकता है।

गोपेश्वर (उत्तराखंड) स्थित हर्बल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. सी पी कुनियाल ने दशकों तक हिमालयी औषधीय और अल्पाइन पौधों का अध्ययन किया है। उन्होंने कहा: "उत्तराखंड में हमने देखा है कि सर्दियों में बारिश देर से होने पर बुरांश के फूल खिलने से ठीक पहले उसकी कलियां खराब हो सकती हैं। ऐसा होने पर सिर्फ पौधे को ही नुकसान नहीं होता। बुरांश के फूलों से पारंपरिक पेय बनाने वाले लोगों की सीज़नल आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी खत्म हो जाता है।"

हिमालय के अलावा पश्चिमी घाट, सुंदरबन और भारत के शुष्क क्षेत्रों के इकोसिस्टम्स में भी ऐसे जैविक बदलाव दर्ज किए गए हैं। ये पारिस्थितिक बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत के कई समुदायों के अनुष्ठान, आजीविका और पहचान स्थनीय जैव-विविधता के साथ विकसित हुए हैं।

स्थानीय प्रजातियों की विलुप्ति के साथ बदलती है संस्कृति

संरक्षण पर मुख्यधारा के विमर्श के तहत जैव-सांस्कृतिक विविधता पर बातचीत सबसे पहले 1990 के दशक में शुरू हुई। 1988 की बेले घोषणा (Belém Declaration) में इसे औपचारिक मान्यता मिली। घोषणा में सांस्कृतिक और जैव विविधता के बीच 'अटूट संबंध' को रेखांकित किया गया था।

घोषणा में चेतावनी दी गई थी कि जब इकोसिस्टम खत्म होते हैं तो उनके साथ विकसित हुई आदिवासी संस्कृतियां और ज्ञान प्रणालियां भी खत्म हो जाती हैं। कई समुदायों के लिए पौधे और जानवर केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं। वे पवित्र जीव, धार्मिक अनुष्ठानों की वस्तुएं, पारंपरिक औषधियां, मौसमी कैलेंडर और लोककथाओं व त्योहारों का अभिन्न हिस्सा हैं।

झारखंड के साल वन में पूनम टोपनो। वह कहती हैं कि हाल के वर्षों में सखुआ (साल) के पेड़ का फूल प्रभावित हुआ है। फोटो: हृदयेश जोशी

ब्रह्म कमल के अलावा रोडोडेंड्रॉन (बुरांश) और लाल चंदन (Pterocarpus santalinus) भी ऐसी अनेक प्रजातियों में शामिल हैं जिनका सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है। बुरांश हिमालय की अर्थव्यवस्था और संस्कृति से गहराई से जुड़ा है। इसका इस्तेमाल भोजन, पेय, पारंपरिक चिकित्सा और कुटीर उद्योग में होता है। यह नेपाल का राष्ट्रीय फूल भी है, जबकि ब्रह्म कमल उत्तराखंड का राजकीय पुष्प है। लेकिन आज रोडोडेंड्रॉन और ब्रह्म कमल दोनों पर जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट प्रभाव दिखाई दे रहा है।

गौरतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्रों पर दबाव केवल जलवायु परिवर्तन के कारण ही नहीं है। जलवायु परिवर्तन उन खतरों को और बढ़ा देता है जो पहले से ही इकोसिस्टम के लिए हानिकारक हैं -- जैसे हैबिटाट का नुकसान, बाहरी प्रजातियों का आक्रमण और जरूरत से ज्यादा दोहन।

डॉ. कुनियाल ने बताया: "मासी (Nardostachys jatamansi), चोरू (Angelica glauca), हथाजड़ी (Dactylorhiza hatagirea), बन ककड़ी (Podophyllum hexandrum) और अतीस (Aconitum heterophyllum) की कई प्राकृतिक आबादियां अपने हैबिटैट में तेजी से घट रही हैं। बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां इसका एक कारण हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा दोहन, अवैध संग्रह, जंगल की आग और अत्यधिक चराई भी इनके पतन को तेज कर रहे हैं।"

लाल चंदन (Red Sanders) की कहानी भी बताती है कि केवल जलवायु परिवर्तन के कारण ही जैव-विविधता संकट में नहीं है। पूर्वी घाट के दक्षिणी हिस्से में पाई जाने वाली यह स्थानिक प्रजाति हिंदू धार्मिक परंपराओं में पूजनीय है। आयुर्वेद और सिद्ध जैसी सदियों पुरानी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी इसका महत्व है। इसके सांस्कृतिक और औषधीय महत्व के बावजूद इसे अब  इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त (endangered) प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

वैज्ञानिक इस संकट के पीछे बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के साथ दशकों से जारी अवैध कटाई और अत्यधिक दोहन को भी जिम्मेदार मानते हैं। इससे पता चलता है कि मानवीय गतिविधियां जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और बढ़ा सकती हैं, खासकर उन प्रजातियों पर जिनका सांस्कृतिक महत्व है।

क्या संस्कृति संरक्षण का हिस्सा हो सकती है?

भारत सरकार ने माना है कि जैव-विविधता की हानि एक चुनौती है, यह बात सरकार के नीतिगत दस्तावेज़ों में परिलक्षित होती है। संसद में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने कहा है कि भारत की राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और एक्शन प्लान (2024–2030) का लक्ष्य जैव-विविधता पर मंडरा रहे खतरों को कम करना है। इसके तहत पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली और प्रजातियों के संरक्षण पर जोर दिया गया है। साथ ही, पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं में सुधार और वन्यजीव गलियारों का निर्माण किया जाएगा। वन्यजीव गलियारों से हैबिटाट के विखंडन को कम करने में मदद मिलेगी।   

कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी को सौंपी गई सातवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट में भी भारत सरकार ने दोहराया है कि जैव-विविधता का संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली देश की क्लाइमेट रेसिलिएंस और टिकाऊ विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) के प्रयासों का केंद्र है।

मंत्रालय ने रिपोर्ट में कहा है कि "भारत जैव-विविधता के संरक्षण, इसके सस्टेनेबल उपयोग और जैविक संसाधनों के उपयोग से मिलने वाले लाभों के उचित और समान बंटवारे के लिए प्रतिबद्ध है।"

सरकार की नीतिगत पहलों में जैव-विविधता संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता माना गया है। लेकिन वैज्ञानिकों और कम्युनिटी लीडर्स का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जैव-विविधता की हानि के सांस्कृतिक प्रभावों -- खासकर परंपराओं, पवित्र प्रजातियों और आदिवासी ज्ञान के क्षरण -- पर अभी उतना ध्यान नहीं दिया गया है।

भारद्वाज कहती हैं कि जैव-विविधता को केवल प्रजातियों की संख्या या हैबिटाट के नुकसान के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

उनका कहना है, "जैव-विविधता और संस्कृति सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। समुदायों ने अलग-अलग बीज प्रजातियों का चयन और उन्हें पीढ़ियों तक साझा करके उनका संरक्षण किया है। जंगल इसलिए भी बचे क्योंकि उन्हें पवित्र प्राकृतिक स्थलों के रूप में संरक्षित किया गया और वहां पारंपरिक नियम लागू रहे। जब जलवायु परिवर्तन या दूसरे जोखिम इस संबंध के एक हिस्से को कमजोर करते हैं तो दूसरा हिस्सा भी खतरे में पड़ जाता है।" 

भारद्वाज कहती हैं कि दुनिया में भारत इस आपसी संबंध का एक मजबूत उदाहरण है। 

"भारत दुनिया के कुल भू-भाग का केवल 2.4 प्रतिशत है, लेकिन यहां दुनिया की लगभग 7-8 प्रतिशत प्रजातियां पाई जाती हैं। दुनिया के 34 बायोडाइवर्सिटी हॉटस्पॉट्स में से चार भारत में हैं।"

भारद्वाज के मुताबिक भारत की जैव-विविधता केवल औपचारिक संरक्षित क्षेत्रों की वजह से नहीं बची है। समुदायों ने पवित्र उपवनों और सांस्कृतिक संस्थाओं के जरिए भी प्रकृति की रक्षा की है। महाराष्ट्र के देवराई, केरल के कावु, झारखंड के सरना स्थल और मेघालय के लॉ क्यंतांग इसके उदाहरण हैं।

उन्होंने कहा: "ये परंपराएं दर्शाती हैं कि जैव-विविधता का संरक्षण उन सांस्कृतिक मूल्यों और संस्थाओं का संरक्षण भी है जिन्होंने पीढ़ियों से इसकी रक्षा की है।"

भारत की संशोधित नेशनल बायोडाइवर्सिटी स्ट्रेटेजी एंड एक्शन प्लान (2024–2030) में भी माना गया है कि जैव-विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों को शामिल करना और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करना जरूरी है। इसमें पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली को क्लाइमेट रेसिलिएंस से भी जोड़ा गया है।

एटिस (एकोनिटम हेटरोफिलम) हिमालय के अल्पाइन और उप-अल्पाइन क्षेत्रों का मूल पुष्प है। फोटो: सीपी कुनियाल

ज्ञान की रक्षा, प्रकृति की रक्षा

दस भारतीय राज्यों में आदिवासी समुदायों के साथ काम करने वाले फिया फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक जॉनसन टोपनो कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के अलावा सबसे बड़ा खतरा पीढ़ियों के बीच ज्ञान के हस्तांतरण का कमजोर होना है।

"जलवायु परिवर्तन आदिवासी समुदायों को प्रभावित कर रहा है, जबकि वे पीढ़ियों से प्रकृति के साथ रहते आए हैं और उनका कार्बन फुटप्रिंट भी बहुत कम है। साथ ही बुजुर्गों और युवा पीढ़ी के बीच ज्ञान की कड़ी कमजोर हो रही है। हमारे पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का बड़ा हिस्सा केवल मौखिक परंपरा के रूप में मौजूद है। अगर यह ज्ञान आगे नहीं पहुंचा तो प्रकृति के साथ रहने की सदियों की समझ लुप्त हो सकती है," उन्होंने कहा। 

डॉ. सुकुमार का भी मानना है कि आदिवासी ज्ञान को कमतर आंकना आधुनिक संरक्षण की सबसे बड़ी गलतियों में से एक है।

उन्होंने कहा: "हम वैज्ञानिक अक्सर आदिवासी ज्ञान को यह मानकर खारिज करते रहे हैं कि स्थानीय समुदाय कम जानते हैं क्योंकि वे आदिवासी हैं या अशिक्षित हैं। वास्तव में उनके पास प्रकृति और यहां तक कि क्लाइमेट रेसिलिएंस के बारे में भी असाधारण ज्ञान है। आज आईपीसीसी और  इंटर-गवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफार्म ऑन बायोडाइवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) जैसे मंच भी यह मान रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (अडॉप्टेशन) के लिए यह ज्ञान जरूरी है।"

भारत की सबसे महत्वपूर्ण जैव-विविधता पहलों में से एक पीपुल्स बायोडाइवर्सिटी रजिस्टर तैयार करना है। इनमें स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के साथ उनसे जुड़े पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को भी दर्ज किया जाता है। इस अवधारणा को जाने-माने पारिस्थितिकी विज्ञानी प्रोफेसर माधव गाडगिल ने आगे बढ़ाया था। बाद में इसे भारत के जैव-विविधता अधिनियम, 2002 में शामिल किया गया। इससे जैव-विविधता और पारंपरिक ज्ञान का सामुदायिक दस्तावेजीकरण देश के संरक्षण ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

डॉ. सुकुमार के मुताबिक भारत में सामुदायिक नेतृत्व में संरक्षण की बुनियाद पहले से मौजूद है, लेकिन स्थानीय लोगों के साथ वास्तविक साझेदारी को मजबूत करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा: "पीपुल्स बायोडाइवर्सिटी रजिस्टर स्थानीय जैव-विविधता के दस्तावेजीकरण के सबसे अच्छे तरीकों में से एक हैं, क्योंकि सामुदायिक ज्ञान को उन्हीं के द्वारा दर्ज किया जा सकता है। उनकी ज्ञान प्रणालियों को मान्यता और सम्मान मिलना चाहिए। अगर हम स्थानीय समुदायों को सिर्फ यह बताते रहें कि उन्हें क्या करना है तो संरक्षण सफल नहीं हो सकता। हमें उनकी बात सुननी होगी और बराबर के साझेदार के रूप में उनके साथ काम करना होगा।"

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती के सामने भारत ने सामुदायिक ज्ञान के संरक्षण की पूरी क्षमता का इस्तेमाल अभी नहीं किया है।

भारद्वाज कहती हैं कि "भारत की स्थिति काफी अनोखी है और मुझे नहीं लगता कि इसका पर्याप्त इस्तेमाल किया गया है।"

"जैव-विविधता अधिनियम, 2002 के तहत जैव-विविधता प्रबंधन समितियां पीपुल्स बायोडाइवर्सिटी रजिस्टर तैयार करती हैं। इनमें स्थानीय जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान को दर्ज किया जाता है। अब तक 2.6 लाख से अधिक रजिस्टर तैयार किए जा चुके हैं। वहीं वन अधिकार अधिनियम, 2006 ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों पर कानूनी अधिकार देता है। इन दोनों को मिलाकर हमारे पास ज्ञान का आधार और शासन का ऐसा ढांचा है जिसे कई देश हासिल करना चाहेंगे," उन्होंने कहा। 

लेकिन "समस्या यह है कि इनमें से कोई भी जलवायु परिवर्तन को ध्यान में नहीं रखता। रजिस्टर यह दर्ज करते हैं कि क्या मौजूद है, लेकिन यह नहीं बताते कि क्या बदल रहा है। इन्हें राज्यों के क्लाइमेट एक्शन प्लान से नहीं जोड़ा गया है और न ही इनके साथ अडॉप्टेशन फाइनेंस (अनुकूलन के लिए मिलने वाले वित्त)  का प्रावधान है। यदि कोई पंचायत यह दर्ज करने के साथ कि किसी गांव में महुआ उगता है, यह भी दर्ज करे कि उसके फूल खिलने का समय में तीन सप्ताह का अंतर देखा गया है, तो यह रजिस्टर जैव-सांस्कृतिक हानि की शुरुआती चेतावनी प्रणाली भी बन सकते हैं। साथ ही, वे जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए महत्वपूर्ण स्थानीय प्रमाण भी उपलब्ध करा सकते हैं।"

भारद्वाज के अनुसार, जैव-सांस्कृतिक विविधता की रक्षा के लिए सांस्कृतिक नुकसान को मापने के बेहतर तरीके विकसित करने होंगे। आदिवासी समुदायों के ज्ञान का इस्तेमाल करने से पहले उनकी स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति (free, prior and informed consent) सुनिश्चित करनी होगी। इसके अलावा संस्थागत जिम्मेदारी स्पष्ट करना और पर्याप्त वित्तीय सहायता देना भी जरूरी है, ताकि सांस्कृतिक विरासत "बिना बजट और किसी की जवाबदेही के सिर्फ एक पैराग्राफ" बनकर न रह जाए।

टोपनो का भी मानना है कि भारत को गांव के स्तर पर सांस्कृतिक हानि का दस्तावेजीकरण करने के बेहतर तरीके विकसित करने होंगे।

उन्होंने कहा: "जब सखुआ के पेड़ में फूल कम होते हैं तो समुदाय इसे महसूस करते हैं, क्योंकि सरहुल जैसे त्योहार उससे गहराई से जुड़े हैं। लेकिन इन बदलावों को शायद ही कभी मापा या दर्ज किया जाता है। ग्राम सभाओं को ऐसे स्थानीय बदलाव दर्ज करने चाहिए। इस सूक्ष्म स्तर के प्रमाण से समुदायों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि आज क्या बदल रहा है और कल बेहतर संरक्षण तथा जलवायु नीतियां बनाने में भी मदद मिल सकती है।"

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