मजबूत होता एल नीनो: मानसून, कृषि पर खतरा; बढ़ सकती है महंगाई

Editorial Team6 अग॰. 2026
मजबूत होता एल नीनो: मानसून, कृषि पर खतरा; बढ़ सकती है महंगाई

भारत में इस साल मानसून के दूसरे हिस्से (अगस्त-सितंबर) को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अनुमान जताया है कि देश के कई हिस्सों में इस दौरान सामान्य से कम बारिश हो सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा एल नीनो है। मौसम विभाग के अनुसार जून में एल नीनो की स्थिति कमजोर थी, जुलाई में यह मध्यम स्तर तक पहुंच गई और साल के अंत तक इसके बहुत मजबूत होने की संभावना है।

हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि 'सुपर एल नीनो' जैसी कोई आधिकारिक श्रेणी नहीं होती। आईएमडी और विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) एल नीनो को केवल कमजोर, मध्यम, मजबूत और बहुत मजबूत श्रेणियों में बांटते हैं।

सरकार का कहना है कि भारत पर इसका असर सिर्फ एल नीनो से तय नहीं होगा। हिंद महासागर की स्थितियां और अन्य मौसमीय कारक भी बारिश को प्रभावित करते हैं।

फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि एल नीनो के मजबूत होने से भारत में बारिश कम होने, गर्मी बढ़ने और सूखे जैसी स्थितियां बनने का खतरा बढ़ जाता है। 

खेती पर बढ़ता संकट

 

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल मौसम तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा असर खेती और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है

केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने देश के 651 कृषि प्रधान जिलों का अध्ययन किया। इनमें से 310 जिलों को जलवायु परिवर्तन के लिहाज से संवेदनशील पाया गया। इनमें 109 जिले 'बहुत अधिक जोखिम' और 201 जिले 'उच्च जोखिम' की श्रेणी में हैं।

बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून, लंबे सूखे और अचानक होने वाली तेज बारिश खेती को लगातार प्रभावित कर रही है। इससे फसलों का उत्पादन घटने और किसानों की आय पर असर पड़ने की आशंका बढ़ रही है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने सभी कृषि जिलों के लिए विशेष कृषि योजनाएं तैयार की हैं। किसानों को स्थानीय मौसम के अनुसार फसलें चुनने और खेती के तरीके अपनाने की सलाह दी जा रही है।

जलवायु के अनुकूल नई किस्मों के बीज भी तेजी से विकसित किए गए हैं। पिछले एक दशक में आईसीएआर ने 2,900 नई फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें से अधिकांश सूखा, गर्मी या अन्य कठिन परिस्थितियों को बेहतर ढंग से झेल सकती हैं।

दूध भी हो सकता है महंगा

 

कमजोर मानसून का असर केवल धान, गेहूं या दालों तक सीमित नहीं रहता। इसका बड़ा असर दूध पर भी पड़ सकता है।

दूध उत्पादन काफी हद तक पशुओं के चारे पर निर्भर करता है। मक्का, ज्वार, बाजरा और अन्य हरे चारे की फसलें समय पर होने वाली बारिश पर निर्भर रहती हैं।

यदि बारिश देर से हो या बीच-बीच में लंबा सूखा पड़ जाए तो चारे की पैदावार घट जाती है। ऐसे में किसानों को बाजार से महंगा पशु आहार खरीदना पड़ता है।

भारत में करीब 80 प्रतिशत दूध छोटे किसानों द्वारा पैदा किया जाता है, जिनके पास केवल दो से पांच पशु होते हैं। बढ़ती लागत के कारण कई किसान पशुओं को कम चारा देते हैं, उन्हें बेच देते हैं या नए पशु खरीदने से बचते हैं।

इसका असर कुछ समय बाद दूध के उत्पादन पर दिखाई देता है और दूध महंगा होने लगता है।

जलवायु परिवर्तन एक और समस्या पैदा कर रहा है। बढ़ती गर्मी से पशु कम चारा खाते हैं और उनका दूध उत्पादन घट जाता है। अधिक तापमान उनके स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता को भी प्रभावित करता है। यानी चारे की कमी और गर्मी मिलकर दूध उत्पादन पर दोहरी मार डालते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब चारे को भी खाद्यान्न की तरह महत्वपूर्ण मानते हुए राष्ट्रीय स्तर पर चारा सुरक्षा मिशन शुरू करने की जरूरत है। साथ ही मौसम के पूर्वानुमान को पशुपालन योजनाओं से जोड़कर समय रहते तैयारी करनी होगी।

महंगाई के लिए नई चुनौती

 

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल किसानों तक सीमित नहीं है। यह आम लोगों की जेब पर भी असर डाल सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े झटके 2050 तक महंगाई में लगभग 1 प्रतिशत तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी कर सकते हैं।

भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का बड़ा हिस्सा खाद्य पदार्थों का है। यदि बारिश कम होने से फसलें खराब होती हैं या दूध और सब्जियों का उत्पादन घटता है तो कीमतें बढ़ जाती हैं। लेकिन ऐसी महंगाई और अधिक मांग के कारण होने वाली महंगाई में फर्क होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा आर्थिक व्यवस्था इस अंतर को पूरी तरह नहीं पहचान पाती।

इसी वजह से अब यह सुझाव दिया जा रहा है कि आरबीआई अपनी महंगाई के अनुमान में मौसम और जलवायु से जुड़े आंकड़ों को भी शामिल करे। यूरोप, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के केंद्रीय बैंक भी इस दिशा में काम शुरू कर चुके हैं।

कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि खेती, दूध उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और महंगाई का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है। यदि समय रहते मौसम के बदलते पैटर्न के अनुसार नीतियां नहीं बनाई गईं, तो इसका असर किसानों से लेकर आम उपभोक्ताओं तक सभी पर पड़ेगा।

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