
उबलता भारत: यूपी का बांदा बना दुनिया का सबसे गर्म शहर, ऐप-आधारित परिवहन कर्मियों ने मांगी हीट राहत
भारत इस समय ‘दुनिया का हीट सेंटर’ बन गया है, जहां रियल-टाइम वैश्विक तापमान रैंकिंग के अनुसार दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 95 भारत में स्थित हैं। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश का बांदा 27 अप्रैल को देश का सबसे गर्म स्थान रहा, जहां अधिकतम तापमान 47.6°C दर्ज किया गया — जो सामान्य से 5.4 डिग्री अधिक है।
AQI.in के 24 अप्रैल शाम 5 बजे के आंकड़ों के अनुसार, मध्य भारत से लेकर इंडो-गंगा के मैदानों तक दर्जनों शहरों में तापमान 40°C के पार पहुंच गया, जबकि कई स्थान 45°C के करीब पहुंच गए।
इस भीषण गर्मी का सबसे ज्यादा असर ऐप-आधारित डिलीवरी कर्मियों पर पड़ा है। ऐप-आधारित परिवहन श्रमिकों ने ‘कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020’ के तहत अनिवार्य हीटवेव सुरक्षा की मांग की है, जिसमें भुगतान सहित ब्रेक और पानी की उपलब्धता शामिल है। इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) ने सरकार से इन उपायों को लागू करने की अपील की है और अन्य देशों में ऐसे प्रावधानों का हवाला दिया है। बढ़ती गर्मी के बीच कंपनियों को डिलीवरी कर्मियों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
जनवरी 2026 में, श्रमिक यूनियनों के विरोध के बाद ब्लिंकिट, जेप्टो और स्विगी इंस्टामार्ट को अपने ब्रांडिंग से 10 मिनट डिलीवरी के वादे हटाने पड़े थे।
सुपर एल नीनो: भारत में भीषण गर्मी और कमजोर मानसून की आशंका
इस साल ‘सुपर एल नीनो’ के असर की आशंका जताई जा रही है, जिसे भारत के लिए चिंताजनक माना जा रहा है। यह एक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से ज्यादा गर्म हो जाता है, जिससे दुनिया भर के मौसम पैटर्न बदल जाते हैं।
भारत में इसके कारण भीषण गर्मी और लंबी हीटवेव देखने को मिल सकती है। तापमान बढ़ने से हीटस्ट्रोक, डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) और सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों ने बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है।
सुपर एल नीनो मानसून को भी कमजोर कर सकता है। कम बारिश से सूखे की स्थिति बन सकती है, जिससे खेती और पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी। इससे खाद्य उत्पादन घट सकता है और महंगाई बढ़ने का खतरा है। कुल मिलाकर, इसका असर मौसम, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था तीनों पर पड़ सकता है।
हिंदूकुश हिमालय में 24 साल में सबसे कम बर्फ, जल संकट का खतरा: आईसीआईएमओडी रिपोर्ट
अंतरराष्ट्रीय केंद्र आईसीआईएमओडी की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र में बर्फ का स्तर पिछले दो दशकों से अधिक समय में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। 2026 में बर्फ की स्थिरता सामान्य से 27.8% कम दर्ज की गई, जो लगातार चौथा साल है जब क्षेत्र में औसत से कम बर्फबारी हुई है।
रिपोर्ट बताती है कि 2003 से 2026 के बीच 24 वर्षों में अधिकांश सर्दियों में बर्फ सामान्य से कम रही, जो एक स्थायी ट्रेंड बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह गिरावट गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के जल प्रवाह को प्रभावित कर सकती है। हिमपात से मिलने वाला पानी क्षेत्रीय नदी प्रवाह का बड़ा हिस्सा बनाता है, जिससे लगभग दो अरब लोगों की जल, कृषि और ऊर्जा सुरक्षा जुड़ी है।
जलवायु परिवर्तन को इस गिरावट का प्रमुख कारण बताया गया है, जिससे भविष्य में गंभीर जल संकट की आशंका बढ़ गई है।
अत्यधिक गर्मी से भारत के धान उत्पादन और किसानों पर खतरा: संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट
संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, हीटवेव भारत के किसानों और धान की फसल के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में अत्यधिक गर्मी का सबसे ज्यादा असर गंगा और सिंधु नदी बेसिन के घनी आबादी वाले कृषि क्षेत्रों पर पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक गर्मी से प्रभावित क्षेत्रों में कृषि श्रम उत्पादकता 40% से नीचे गिर सकती है, जिससे भारत के धान उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अगले 20 वर्षों में हर साल अतिरिक्त हीटवेव और भारी बारिश की 40 घटनाएं : सीईईडब्ल्यू का एआई अध्ययन
क्लाइमेट थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के एआई-आधारित अध्ययन के अनुसार, अगले दो दशकों में भारत में हर साल 15 से 40 अतिरिक्त असामान्य रूप से गर्म दिन देखने को मिल सकते हैं। क्राविस (क्लाइमेट रेजिलिएंस एनालिटिक्स एंड विज़ुअलाइजेशन इंटेलिजेंस सिस्टम) नामक इस प्लेटफॉर्म के मुताबिक, देश के कई हिस्सों में हर साल 20 से 40 गर्म रातों की बढ़ोतरी हो सकती है।
एआई विश्लेषण के अनुसार, अगले 20 वर्षों में भारी बारिश की घटनाओं में भी लगातार वृद्धि होगी, जहां कई जिलों में हर साल 10 से 30 अतिरिक्त भारी बारिश के दिन दर्ज हो सकते हैं।
अध्ययन में पाया गया है कि महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में गर्म दिनों और भारी वर्षा दोनों में अधिक वृद्धि देखने को मिलेगी।
क्राविस ने इन अनुमान को 40 वर्षों के जलवायु डेटा के आधार पर तैयार किया है और यह 2030-50 तथा 2051-70 तक के पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है।
कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन और चार शावकों की मौत, वायरल संक्रमण की आशंका
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में एक बाघिन और उसके चार शावकों की 10 दिनों के भीतर मौत से वन विभाग में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों को संदेह है कि इसके पीछे कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) का प्रकोप हो सकता है।
वन विभाग के अनुसार, बाघिन और शावकों में श्वसन संबंधी समस्या और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण के लक्षण पाए गए, जो CDV से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि, अंतिम पुष्टि के लिए नमूनों को जांच के लिए भेजा गया है।
घटनाओं के बाद रिजर्व में अन्य बाघों की निगरानी बढ़ा दी गई है और प्रभावित क्षेत्र में विशेष टीमों को तैनात किया गया है।
कान्हा, जो देश के प्रमुख और घनी आबादी वाले टाइगर आवासों में से एक है, वहां इस तरह की संभावित संक्रामक बीमारी ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों ने जंगलों के आसपास आवारा कुत्तों की आवाजाही पर रोक और निगरानी सख्त करने की मांग की है।
भारत के सभी फॉरेस्ट क्षेत्रों में जमा कार्बन बढ़ने की संभावना: शोध
भारत के जंगलों में जमा कार्बन आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है, लेकिन यह बढ़ोतरी सभी क्षेत्रों में समान नहीं होगी। एक अध्ययन के अनुसार, सबसे ज्यादा बढ़ोतरी रेगिस्तानी और कम वर्षा वाले इलाकों में हो सकती है। इसके बाद ट्रांस-हिमालय, गंगा के मैदानी क्षेत्र और दक्कन क्षेत्र का स्थान है। पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में भी वृद्धि होगी, लेकिन कम।
गौरतलब है कि जंगल ‘कार्बन सिंक’ होते हैं, यानी वे हवा से कार्बन डाइऑक्साइड हटाकर उसे तनों, पत्तियों और जड़ों में जमा करते हैं। अध्ययन में पाया गया कि साल 2100 तक यह भंडारण 35% से 97% तक बढ़ सकता है। लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि ज्यादा गर्मी, सूखा और आग जैसे खतरे भी बढ़ेंगे।
दो भारतीय संरक्षणविदों को मिला ‘ग्रीन ऑस्कर’ सम्मान
भारत की दो संरक्षणविदों – बरखा सुब्बा और परवीन शेख – को 2026 का प्रतिष्ठित व्हिटली अवॉर्ड प्रदान किया गया है। यह सम्मान वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए दिया जाता है।
बरखा सुब्बा को दार्जिलिंग क्षेत्र में दुर्लभ हिमालयन सैलामैंडर के आवास संरक्षण के लिए सम्मानित किया गया, जहां वे इसके प्रजनन स्थलों की रक्षा और पुनर्स्थापन पर काम कर रही हैं। वहीं, परवीन शेख को चंबल नदी में संकटग्रस्त भारतीय स्किमर पक्षी के घोंसलों की सामुदायिक भागीदारी से सुरक्षा के प्रयासों के लिए यह पुरस्कार मिला।
व्हिटली अवॉर्ड, जिसे ‘ग्रीन ऑस्कर’ भी कहा जाता है, वैश्विक दक्षिण के जमीनी स्तर पर काम करने वाले संरक्षणकर्ताओं को सम्मानित करता है। यह सम्मान न केवल अंतरराष्ट्रीय पहचान देता है, बल्कि जैव विविधता संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान करता है।
राज्यों ने की वन संरक्षण कानून में घासभूमि को शामिल करने की मांग
देश के कई राज्यों ने केंद्र सरकार से वन संरक्षण कानून में बदलाव की मांग की है। इन राज्यों में कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं। उनका कहना है कि घासभूमि (जहां पेड़ों की बजाय घास होती है) को भी संरक्षण मिलना चाहिए। अभी ‘क्षतिपूरक वनीकरण’ का नियम है, जिसमें जंगल कटने पर कहीं और पेड़ लगाए जाते हैं। लेकिन कई बार इसी कारण से घासभूमि में पेड़ लगा दिए जाते हैं, जिससे वहां का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।
राज्यों का कहना है कि कानून में संशोधन कर घासभूमि बहाली को भी इसमें शामिल किया जाए। अभी कई घासभूमि इलाकों को सरकारी रिकॉर्ड में गलत तरीके से बंजर जमीन दिखाया जाता है, जिससे उनका महत्व कम आंका जाता है।
कोलंबिया सम्मेलन में जीवाश्म ईंधन ट्रांज़िशन पर हुई चर्चा
कोलंबिया के सैंटा मार्टा शहर में 60 से ज्यादा देशों ने जीवाश्म ईंधन छोड़ने पर चर्चा की। 18 देशों ने एक कानूनी समझौते की मांग की, जिससे इन ईंधनों का उपयोग कम किया जा सके। सम्मेलन में यह साफ हुआ कि अब सवाल ‘क्यों छोड़ें’ नहीं, बल्कि ‘कैसे छोड़ें’ है।
सबसे बड़ी समस्या पैसे की है। कई गरीब देशों के पास स्वच्छ ऊर्जा (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) अपनाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। वे कर्ज में डूबे हैं और मजबूरी में तेल-गैस प्रोजेक्ट बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि इस बदलाव के लिए वैश्विक सहयोग, फंड और कर्ज राहत जरूरी है। हालांकि कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ, लेकिन आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति बनी।
दिल्ली के सेंट्रल रिज में ‘थीम पार्क’ योजना पर विवाद
दिल्ली के सेंट्रल रिज क्षेत्र में ‘थीम-आधारित स्पेशल फॉरेस्ट’ विकसित करने की योजना के तहत वन विभाग द्वारा जारी टेंडर पर विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने गंभीर आपत्ति जताई है। टेंडर में दीमकों छुटकारा पाने के लिए प्रतिबंधित कीटनाशक लिंडेन के उपयोग का उल्लेख किया गया है, जो विवाद का बड़ा कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि दीमक जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करते हैं।
हालांकि वन विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि लिंडेन का उल्लेख टेंडर में गलती से हुआ है, और इसकी जगह सीमित मात्रा में क्लोरपाइरीफॉस के नियंत्रित उपयोग किया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञ इसे भी खतरनाक मान रहे हैं।
पर्यावरण के जानकारों ने स्पेशल फॉरेस्ट की योजना पर भी चेतावनी दी है और कहा है कि थीम-आधारित वनरोपण से सेंट्रल रिज की इकोलॉजी को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा कीटनाशकों के उपयोग से पशु-पक्षियों और मानव जीवन को भी खतरा हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि सेंट्रल रिज एक प्राकृतिक वन है, इसलिए कृत्रिम वनरोपण की जगह इसे प्राकृतिक रूप से बहाल किया जाना चाहिए।
मथुरा-वृंदावन में यमुना प्रदूषण पर एनजीटी सख्त, केंद्र और यूपी सरकार को नोटिस
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मथुरा और वृंदावन में यमुना नदी के बढ़ते प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।याचिका में दावा किया गया है कि नदी का पानी ‘बेहद खराब’ श्रेणी D में पहुंच चुका है, जो न तो स्नान के लिए उपयुक्त है और न ही पीने के लिए।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि बिना उपचारित (ट्रीटेड) सीवेज सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है और बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) पर अवैध निर्माण बिना रोक-टोक जारी है। ट्रिब्यूनल ने संबंधित प्राधिकरणों से सीवेज ट्रीटमेंट और अतिक्रमण हटाने को लेकर अपने पहले के आदेशों के अनुपालन पर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।
गर्भावस्था में वायु प्रदूषण का असर, बच्चों के बोलना सीखने में होती देरी: शोध
एक नए शोध में पाया गया है कि गर्भावस्था के शुरुआती चरण में अधिक वायु प्रदूषण के संपर्क में आने वाले शिशु, कम प्रदूषण के संपर्क वाले बच्चों की तुलना में बोलना सीखने में ज्यादा समय लेते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, गर्भावस्था की पहली तिमाही में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म व अति-सूक्ष्म कणों (पार्टिकुलेट मैटर) के संपर्क से 18 महीने की उम्र तक बच्चों के भाषाई विकास में देरी देखी गई।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि समय से पहले जन्मे (प्रीमैच्योर) बच्चों पर इसका असर और गंभीर होता है। इनमें न केवल बोलने की क्षमता में देरी होती है, बल्कि मोटर स्किल्स (शारीरिक गतिविधियों से जुड़ी क्षमताएं) भी प्रभावित होती हैं।
वार ऑन वॉन्ट के कैंपेन प्रमुख टायरोन स्कॉट ने कहा, “यह शोध एक चेतावनी है कि वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन की शुरुआत से ही न्याय और समानता का सवाल है।”
शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह लंदन में गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों के भाषाई व मोटर विकास पर प्रदूषण के प्रभाव का पहला अध्ययन है, लेकिन इसके निष्कर्ष वैश्विक स्तर पर लागू होते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रदूषण फैलाने वाले कई उद्योग अब विकसित देशों से हटकर विकासशील देशों में चले गए हैं, जिससे कम और मध्यम आय वाले देशों में रहने वाले लोगों पर इसका अधिक असर पड़ रहा है। वहीं, समृद्ध देशों में भी गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदाय इस बोझ को असमान रूप से झेल रहे हैं।
मुंबई और सिकंदराबाद के लैंडफिल दुनिया के बड़े मीथेन उत्सर्जक, वैश्विक अध्ययन में खुलासा
एक वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि 2025 में मुंबई और सिकंदराबाद दुनिया के सबसे बड़े मीथेन उत्सर्जन करने वाले लैंडफिल साइट्स में शामिल हैं। सैटेलाइट डेटा के आधार पर किए गए इस अध्ययन में दुनियाभर के 707 कचरा स्थलों से निकलने वाले 2,994 मीथेन प्लूम्स का विश्लेषण किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में तेलंगाना के सिकंदराबाद और महाराष्ट्र के मुंबई स्थित लैंडफिल दुनिया के शीर्ष 25 सबसे बड़े मीथेन उत्सर्जक स्थलों में शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने 18 देशों में ऐसे 25 ‘सुपर-एमिटिंग’ लैंडफिल चिन्हित किए हैं, जिनसे होने वाला उत्सर्जन इतना अधिक है कि इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।
ये लैंडफिल साइट्स ब्राजील, चिली, सऊदी अरब, अमेरिका समेत कई देशों में फैली हुई हैं।
मीथेन एक ग्रीनहाउस गैस है, जो अल्पावधि में कार्बन डाइऑक्साइड से 80 गुना अधिक प्रभावी रूप से गर्मी बढ़ाती है। रिपोर्ट के अनुसार, एक लैंडफिल से प्रति घंटे 5 टन मीथेन उत्सर्जन लगभग 10 लाख एसयूवी के बराबर ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव डाल सकता है।
हैदराबाद का जवाहर नगर लैंडफिल और मुंबई का कांजुरमार्ग लैंडफिल इस सूची में क्रमशः चौथे और बारहवें स्थान पर हैं, जो वैश्विक ताप वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
ध्वनि प्रदूषण पर सख्त गुजरात हाईकोर्ट, अहमदाबाद म्युनिसिपल कमिश्नर और गृह सचिव तलब
गुजरात हाईकोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण पर अपने निर्देशों के पालन न होने को लेकर अहमदाबाद नगर निगम आयुक्त, राज्य के गृह सचिव और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष से जवाब मांगा है।
रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने शीर्ष अधिकारियों से पूछा कि ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण के लिए दिए गए निर्देशों को अब तक लागू क्यों नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि यह ‘बेहद पीड़ादायक’ है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 साल पहले जारी दिशा-निर्देशों के बावजूद गुजरात आज भी ध्वनि प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित प्राधिकरणों ने शीर्ष अदालत के निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 18 जून को तय की गई है।
भारत ने 25 अप्रैल को 256 गीगावॉट (GW) की रिकॉर्ड बिजली मांग को सौर ऊर्जा की सहयता से पूरा किया। यह एक दिन में अब तक का सबसे अधिक बिजली उपयोग था। इस दौरान सौर ऊर्जा का बड़ा योगदान रहा। दोपहर 3:38 बजे जब मांग सबसे ज्यादा थी, तब सौर ऊर्जा ने 57 GW यानी करीब 22% बिजली दी। दोपहर 12,30 बजे सौर उत्पादन 81 GW तक पहुंच गया, जो कुल बिजली उत्पादन का लगभग एक-तिहाई था। विशेषज्ञों का कहना है कि सौर ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल से बिजली आपूर्ति मजबूत हुई है, खासकर गर्मियों में जब एसी और कूलर के कारण मांग तेजी से बढ़ती है। इससे कोयले पर निर्भरता भी धीरे-धीरे कम हो सकती है।
स्वच्छ ऊर्जा बढ़ी, फिर भी कोयला हावी
एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2025 में स्वच्छ ऊर्जा (सौर, पवन, जल और बायोएनर्जी) से बिजली उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई। यह बढ़ोतरी 98 टेरावॉट-घंटे (TWh) रही, जो 2022 के पिछले रिकॉर्ड से दोगुनी है। सौर और पवन ऊर्जा में सबसे ज्यादा बढ़त दर्ज की गई। सौर ऊर्जा 37% और पवन ऊर्जा 28% बढ़ी। इसके कारण कोयले से बनने वाली बिजली में थोड़ी कमी भी आई।
फिर भी कोयला अब भी भारत की बिजली का मुख्य स्रोत बना हुआ है और 71% बिजली इसी से बनती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सौर ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज भविष्य में 24 घंटे स्वच्छ बिजली देने में मदद कर सकते हैं, लेकिन अभी कोयले की भूमिका बड़ी बनी हुई है।
चीनी सोलर निर्यात में रिकॉर्ड उछाल
चीन ने मार्च 2026 में सोलर पैनल का रिकॉर्ड 68 गीगावॉट निर्यात किया, जो फरवरी के मुकाबले दोगुना है। यह अब तक का सबसे बड़ा मासिक निर्यात है। इस बढ़ोतरी के पीछे वैश्विक ऊर्जा संकट और चीन में टैक्स नियमों में बदलाव को कारण माना गया है। 1 अप्रैल से निर्यात पर लागत बढ़ने वाली थी, इसलिए पहले ही ज्यादा खरीद हुई।
एशिया और अफ्रीका में सोलर की मांग सबसे ज्यादा बढ़ी। भारत, मलेशिया और लाओस में तेजी से आयात बढ़ा, जबकि अफ्रीका में नाइजीरिया, केन्या और इथियोपिया ने पहली बार एक महीने में 1 गीगावाट से ज्यादा सोलर उपकरण खरीदे। विशेषज्ञों का कहना है कि महंगी ऊर्जा के बीच देश तेजी से सौर ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं।
पवन ऊर्जा में चीन-भारत की बढ़त
दुनिया में 2025 में पवन ऊर्जा की क्षमता में तेज बढ़ोतरी हुई। कुल क्षमता बढ़कर 1,299 गीगावॉट हो गई। इसमें चीन और भारत की बड़ी भूमिका रही। चीन ने अकेले 120 गीगावाट नई क्षमता जोड़ी, जो दुनिया के कुल नए जोड़ के बराबर है। वहीं भारत ने 6.3 गीगावाट नई पवन क्षमता जोड़ी, जो पिछले साल से 85% ज्यादा है। एशिया में दुनिया की 80% नई पवन परियोजनाएं शुरू हुईं। भारत सरकार ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा का लक्ष्य रखा है, जिसमें 100 गीगावाट पवन ऊर्जा से आने की योजना है। रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में भारत में पवन ऊर्जा तेजी से बढ़ेगी, खासकर तटीय राज्यों में।
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है, जिससे भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की मांग बढ़ रही है। महंगे पेट्रोल-डीजल के कारण पारंपरिक इंजन (आईसीई) और ईवी के खर्च के बीच का अंतर कम हो रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर दोपहिया और तिपहिया वाहनों में दिख रहा है, जहां ईवी का खर्च काफी कम है।
भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए सरकार भी ईवी को बढ़ावा दे रही है ताकि बाहरी संकट का असर कम हो विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल महंगा बना रहा, तो ईवी का इस्तेमाल सरकारी योजनाओं से भी तेजी से बढ़ सकता है।
सोडियम बैटरियां बनी नया विकल्प
लिथियम बैटरी के मुकाबले अब सोडियम बैटरियां तेजी से उभर रही हैं, जो सस्ती और अधिक सुरक्षित मानी जा रही हैं। चीन की कंपनी सीएटीेल ने सोडियम-आयन बैटरियों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने की योजना बनाई है, जिसकी बिक्री 2026 से शुरू होगी।
सोडियम बैटरियों में ऊर्जा घनत्व (एक ही जगह में स्टोर होने वाली ऊर्जा) लिथियम से करीब 30% कम होता है, लेकिन ये ज्यादा सस्ती और आग लगने के जोखिम में कम होती हैं। ठंडे मौसम में भी ये अच्छी तरह काम करती हैं, जहां लिथियम बैटरियां कमजोर पड़ जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये बैटरियां सस्ती कारों, डिलीवरी वाहनों और बिजली भंडारण के लिए बेहतर विकल्प बन सकती हैं।
ईवी ट्रांज़िशन के बीच जापानी कंपनियों का हाइब्रिड तकनीक पर जोर
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर ट्रांज़िशन के बीच जापानी कंपनियां हाइब्रिड तकनीक पर जोर दे रही हैं। चार्जिंग स्टेशनों की कमी और बिजली आपूर्ति की दिक्कतों के कारण भारत में पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना अभी चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में हाइब्रिड वाहन बेहतर विकल्प बनकर उभर रहे हैं।
मारुति सुजुकी और टोयोटा जैसी कंपनियों की हाइब्रिड गाड़ियों की मांग तेजी से बढ़ी है। ग्रैंड विटारा और हाई-राइडर जैसे मॉडल कई मामलों में इलेक्ट्रिक कारों से ज्यादा बिक रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हाइब्रिड तकनीक भारत में ईवी बदलाव का अहम पुल साबित हो सकती है।
खाड़ी युद्ध से ऊर्जा कीमतों में 4 साल में सबसे अधिक वृद्धि का खतरा, यूएई के ओपीईसी से बाहर होने से झटका
विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि ईरान पर अमेरिका-इज़राइल युद्ध के चलते ऊर्जा कीमतों में चार साल की सबसे बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है, खासकर तब जबकि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के ओपीईसी और ओपीईसी+ से बाहर होने से तेल निर्यातक समूहों को बड़ा झटका लगा है।
बैंक के अनुमान के मुताबिक 2026 में ऊर्जा कीमतों में 24% तक उछाल आ सकता है, जबकि कुल कमोडिटी कीमतों में 16% की वृद्धि होने की संभावना है। इसका कारण ईंधन और उर्वरक की बढ़ती कीमतें और कई औद्योगिक व कीमती धातुओं के रिकॉर्ड स्तर हैं।
हीटवेव के बीच रिकॉर्ड बिजली मांग, भारत ने बढ़ाया कोयला और गैस उत्पादन
हीटवेव के दौरान सप्ताहांत में भारत में बिजली की अधिकतम मांग 256.1 गीगावाट तक पहुंच गई, जिसके चलते देश ने कोयला और गैस उत्पादन बढ़ाया। ग्रिड इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने करीब 9.6 गीगावाट गैस-आधारित क्षमता संचालित की और कोयला-आधारित उत्पादन को बढ़ाकर लगभग 187 गीगावाट तक पहुंचाया।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दशक में सौर ऊर्जा क्षमता में तेज वृद्धि और हाल के वर्षों में कोयला-आधारित बिजली उत्पादन के विस्तार ने दिन के समय ऐसी मांग को पूरा करने में मदद की है। हालांकि शाम के समय, जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती, दबाव बढ़ जाता है।
गैस आपूर्ति पर युद्ध के असर के कारण रात की मांग पूरी करना चुनौतीपूर्ण हो गया है, जिससे भारत को कोयले पर अधिक निर्भर होना पड़ रहा है। साथ ही, देश जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने और ऊर्जा भंडारण क्षमता को तेज करने पर भी जोर दे रहा है।
ईरान युद्ध खत्म होने के आसार नहीं, तेल कीमतों में 7% उछाल
ईरान युद्ध के बीच तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखा गया है। खबर है कि अमेरिका संभावित सैन्य कार्रवाई की योजना बना रहा है, जिससे बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड (अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल का प्रमुख मानक) की कीमत एक समय 7% बढ़कर 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि बाद में यह घटकर करीब 114 डॉलर रह गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, शांति वार्ता ठप होने और होर्मुज जलडमरूमध्य (जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है) के बाधित होने से कीमतें बढ़ रही हैं। तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ रहे हैं। साथ ही ‘फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट’ (भविष्य में तय कीमत पर खरीद-बिक्री के समझौते) की समय-सीमा खत्म होने से भी कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया।






