ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर निवेश वाली कोयला खदान को फास्ट ट्रैक हरी झंडी दी जा रही है। यह खदान अडानी ग्रुप को दी गई कार्माइकल माइन से दोगुना बड़ी है और इसमें दुनिया की एक बड़ी माइनिंग कंपनी ग्लेनकोर प्लेक कोल ने पैसा लगाया है। कोयले से होने वाले हानिकारक इमीशन और उसके क्लाइमेट पर प्रभाव को लेकर विरोध के बावजूद क्वींसलैंड सरकार ने इसे मंज़ूरी का समर्थन किया है। सरकार का कहना है कि यह एक “महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम ” हो जो कोरोना महामारी के आर्थिक झटके से निकलने में मदद करेगा।
हालांकि दूसरी आंकड़े बताते हैं कि पिछले 16 साल में पहली बार ग्लोबल एनर्जी मिक्स में कोल पावर का हिस्सा गिरकर 27% रह गया है। जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में खपत का घटना इसकी एक बड़ी वजह है।
लावारिस तेल कुंए बने पर्यावरण के लिये मुसीबत
अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) की नई रिपोर्ट कहती है कि लावारिस छोड़ दिये गये 32 लाख तेल और गैस के कुंओं से साल 2018 में 28 किलोवॉट मीथेन का रिसाव हुआ। यह रिसाव 160 लाख बैरल कच्चे तेल से होने वाले कार्बन उत्सर्जन के बराबर ख़तरनाक है। इन कुओं से भू-जल भी प्रदूषित हो रहा है लेकिन यह सिर्फ अमेरिकी तेल/गैस कुंओं की बात नहीं है। दुनिया भर में ऐसे 2.9 करोड़ तेल कुंए हैं जिनमें से ज़्यादातर चीन, रूस और सऊदी अरब में है।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
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