
इस साल मानसून रहेगा कमजोर, सामान्य से कम होगी वर्षा; एल नीनो की संभावना
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) का अनुमान है कि इस वर्ष देश में मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश हो सकती है। जून से सितंबर के बीच लगभग 80 सेमी वर्षा होने की संभावना है, जो 87 सेमी के दीर्घकालिक औसत से कम है। आईएमडी के महानिदेशक एम मोहोपात्रा के अनुसार, इस बार कुल वर्षा का औसत मानसून के दौरान होनेवाली दीर्घकालिक औसत वर्षा का 92 प्रतिशत तक रहने की संभावना है।
जून में एल नीनो की स्थिति बनने की संभावना भी है, जो मानसून को कमजोर कर सकती है। हालांकि, वेदर मॉडल संकेत दे रहे हैं कि मानसून के दूसरे हिस्से में पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल का प्रभाव बढ़ेगा, जिससे कुछ राहत मिल सकती है। पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल के दौरान हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से का पानी पूर्वी हिस्से की तुलना में ज्यादा गर्म हो जाता है, जिससे भारत में बारिश बढ़ने की संभावना बनती है।
देश के अधिकांश हिस्सों में कम बारिश का अनुमान है, जबकि पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीप के कुछ क्षेत्रों में सामान्य या अधिक वर्षा हो सकती है। मानसून देश की कृषि, जल आपूर्ति और बिजली उत्पादन के लिए बेहद अहम माना जाता है।
अप्रैल में तूफ़ानी हवायें, इस गर्मी में भारत में नॉर्मल से कम पीक टेम्परेचर: आईएमडी
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अपने अपडेटेड पूर्वानुमान में कहा है कि अप्रैल-जून के बीच दिन का तापमान सामान्य से कम या भारत के ज़्यादातर हिस्सों में नॉर्मल ही रहेगा। साथ ही, चेतावनी दी है कि देश के कई हिस्सों में अप्रैल में तेज़ आंधी-तूफ़ान भी आ सकते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक अप्रैल में बारिश से कटाई के लिए तैयार खड़ी फ़सलों को नुकसान हो सकता है, जिनमें से कुछ मार्च के दूसरे हिस्से में पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) से पहले ही प्रभावित हो चुकी हैं।
किसानों को अलर्ट करते हुए, एजेंसी ने मॉनसून के दूसरे हिस्से में एल नीनो बनने की 80% संभावना जताई है — जिससे बारिश कम हो सकती है। अपने पूर्वानुमान में, IMD ने कहा कि पूर्वी भारत और नॉर्थ ईस्ट के कई हिस्सों, और सेंट्रल इंडिया के पूर्वी हिस्सों, और इनसे सटे प्रायद्वीपीय इलाकों में हालांकि, ज़्यादा गर्मी पड़ सकती है।
मौसम ऑफिस ने अप्रैल में नॉर्मल से ज़्यादा बारिश का अनुमान लगाया है, जो लॉन्ग पीरियड एवरेज का 112% है; LPA, 1971-2020 की एवरेज बारिश के आधार पर 39.2 mm है। मौसम विभाग ने कहा कि जून-जुलाई-अगस्त के समय में एल नीनो के आने की 62% संभावना है और अगस्त-सितंबर-अक्टूबर में एल नीनो के बने रहने की 80% संभावना है।
एल नीनो वाले साल आम तौर पर भारत में कमज़ोर मॉनसून और कठोर गर्मियाँ लाते हैं। मॉनसून मुख्य रूप से गर्मियों में समुद्र की तुलना में ज़मीन के ज़्यादा गर्म होने से चलता है।
73% कुओं में भूजल स्तर बढ़ा, रिचार्ज में सुधार: केंद्र
देश में 2025 के मानसून के बाद 73 प्रतिशत कुओं में भूजल स्तर में वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार ने लोकसभा में बताया कि 2015-24 के औसत की तुलना में यह सुधार हुआ है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, कुल भूजल रिचार्ज 2017 के 432 अरब घन मीटर से बढ़कर 2025 में 448.52 अरब घन मीटर हो गया है। ‘सुरक्षित’ क्षेत्रों की हिस्सेदारी बढ़ी है, जबकि अति-दोहन वाले क्षेत्र घटे हैं।
कुल 13,875 कुओं में से 10,164 में जलस्तर बढ़ा, जबकि 3,662 में गिरावट दर्ज हुई। सरकार ने बताया कि जल संरक्षण अभियानों और वर्षा जल संचयन से सुधार हुआ है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में अब भी दबाव बना हुआ है।
तटीय इलाकों में नमी वाली गर्मी बढ़ने से सेहत पर असर
हीटवेव की संख्या और ताकत बढ़ रही है, जिससे दक्षिण-पश्चिमी तट पर नमी के साथ गर्मी अधिक हो रही है। नमी वाली हवा पसीने को शरीर को ठंडा नहीं होने दे रही है। ट्रॉपिकल तटों पर, खासकर मानसून से पहले, यह खतरनाक लेवल के करीब पहुंच रहा है, जैसा कि स्टडीज़ से पता चलता है — इंसान का शरीर खुद को ठंडा करने के लिए संघर्ष कर रहा है, और एडजस्टमेंट की लिमिट को छू रहा है।
मोंगाबे इंडिया के मुताबिक भारत के तटों पर गर्मी का तनाव 1981 से काफी बढ़ गया है, जिसकी वजह तापमान और नमी में मिली-जुली बढ़ोतरी है, जैसा कि इंडिया मेटियोरोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) के वैज्ञानिकों की एक नई लंबे समय की स्टडी से पता चलता है।
1981 से 2020 तक के डेटा का एनालिसिस करते हुए, IMD पुणे के वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि वेट-बल्ब तापमान — नमी के साथ तापमान का एक माप — सभी मौसमों में बढ़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के नमी वाले तटों पर खतरों को काफी हद तक कम आंका गया है। मछुआरों का कहना है कि उनके काम के दिन कम हो रहे हैं, क्योंकि गर्मी के कारण वह अधिक मेहनत नहीं कर पाते। गर्म होते समुद्र संकट को बढ़ा रहे हैं, जिसके लिए तुरंत फोरकास्टिंग और अडैप्टेशन की ज़रूरत है।
भारत ने 2028 में प्रस्तावित कॉप33 जलवायु शिखर सम्मेलन की मेजबानी का अपना प्रस्ताव वापस ले लिया है। यह जानकारी आधिकारिक सूत्रों ने दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2023 में दुबई में आयोजित कॉप28 सम्मेलन में भारत की उम्मीदवारी की घोषणा की थी, जिसे कई देशों का समर्थन भी मिला था। पर्यावरण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की कि यह निर्णय हाल ही में औपचारिक रूप से लिया गया। हालांकि, मंत्रालय की ओर से अब तक कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार ने 2 अप्रैल को एशिया-प्रशांत समूह को पत्र लिखकर अपनी उम्मीदवारी वापस ली। इसके पीछे 2028 में अन्य बड़े आयोजनों की योजना और संभावित दबाव से बचने को कारण माना जा रहा है।
पूर्वप्रभावी पर्यावरण मंजूरी से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व किया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने नियमों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को पूर्वप्रभावी रूप से पर्यावरण मंजूरी देने की नीति से जुड़े मामलों पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने 49 याचिकाओं पर छह दिन सुनवाई के बाद पक्षों से लिखित नोट मांगे हैं। केंद्र सरकार ने कहा है कि यह नीति सभी परियोजनाओं को राहत नहीं देती और सख्त शर्तों के साथ लागू होती है। वहीं, याचिकाकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे नियमों के उल्लंघन को बढ़ावा मिलेगा।
मामला 2025 के एक फैसले से जुड़ा है, जिसमें पहले ऐसी मंजूरी पर रोक लगी थी, लेकिन बाद में संशोधित आदेश में शर्तों के साथ अनुमति दे दी गई।
सुनवाई के दौरान अदालत में यह भी मुद्दा उठा कि क्या जुर्माना भरकर नियमों के उल्लंघन को वैध बनाया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने इसे पर्यावरण कानूनों की भावना के खिलाफ बताया और सख्त अनुपालन की मांग की। वहीं, केंद्र ने दलील दी कि पुराने प्रोजेक्ट्स को बंद करने से भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है और इसलिए संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।
अदालत का अंतिम फैसला इस मुद्दे पर आगे की नीति तय करने में अहम माना जा रहा है।
भारतीय शहरों में रात में चल रही लू, हीट एक्शन प्लान बदलने की जरूरत
भारत के शहरों में हीटवेव का खतरा अब सिर्फ दिन की गर्मी तक सीमित नहीं रहा है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि रात का तापमान और लगातार दिन-रात चलने वाली हीटवेव तेजी से बढ़ रही हैं। अभी के हीट एक्शन प्लान मुख्य रूप से दिन की गर्मी पर केंद्रित हैं, जिससे यह नया खतरा नजरअंदाज हो रहा है 2012 से 2022 के बीच अत्यधिक गर्मी वाली रातों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रात में तापमान ज्यादा रहने से शरीर को राहत नहीं मिलती और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं। अध्ययन में वाराणसी में सबसे तीव्र रात की हीटवेव दर्ज की गई। विशेषज्ञों ने कूल रूफ, हरियाली और बेहतर वेंटिलेशन जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी है।
भूजल के अत्यधिक दोहन पर संसदीय समिति ने जताई चिंता
भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और वैश्विक भूजल उपयोग में इसकी हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है। लोकसभा में पेश एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में 245 अरब घन मीटर भूजल का दोहन होता है, जो पेयजल और सिंचाई की जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करता है।
समिति ने अत्यधिक दोहन पर चिंता जताते हुए कहा कि कई राज्यों और 267 जिलों में जल निकासी स्तर बहुत अधिक है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में दोहन 100 प्रतिशत से ऊपर है। सरकार ने कहा कि कुछ सुधार दिखे हैं, लेकिन दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए कड़े कदम जरूरी हैं।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के सात वर्ष बाद भी देश में साफ हवा का लक्ष्य दूर बना हुआ है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (क्रिया) के 1 अप्रैल, 2025 से 31 मार्च, 2026 तक 96 शहरों के पीएम10 आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि बहुत कम शहर तय मानकों तक पहुंचे। उत्तर भारत में स्थिति सबसे खराब रही — गाजियाबाद में पीएम10 औसत 215 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ, जो राष्ट्रीय मानक 60 से तीन गुना अधिक है, जबकि दिल्ली (201) और नोएडा (195) भी गंभीर स्तर पर रहे।
हालांकि 2017-18 के मुकाबले 79 शहरों में सुधार हुआ, 27 शहरों में 40% से अधिक कमी आई, जिसमें उत्तर प्रदेश के नौ शहर शामिल हैं। देहरादून में 75% गिरावट दर्ज हुई, जबकि विशाखापट्टनम में 73% वृद्धि हुई। मार्च 2026 में पीएम2.5 के मामले में केवल तीन शहर ही डब्ल्यूएचओ मानकों पर खरे उतरे, गुरुग्राम सबसे प्रदूषित रहा।
विशेषज्ञों ने सख्त और वैज्ञानिक कदमों की जरूरत बताई है।
बैटरी रीसाइक्लिंग इकाइयों के पास ज़हर बनी मिट्टी, कई राज्यों में मिला सीसे का खतरनाक स्तर
भारत के कई हिस्सों में बैटरी रीसाइक्लिंग इकाइयों के आसपास की मिट्टी में सीसा (लेड) का खतरनाक स्तर पाया गया है, जो लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। पर्यावरण अनुसंधान संस्था टॉक्सिक्स लिंक की ओर से किए गए अध्ययन ‘सॉइल्ड विथ लेड: फ्रॉम बैटरी रीसाइक्लिंग‘ में यह खुलासा हुआ है।
अध्ययन के तहत दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों की मिट्टी से 23 नमूने लिए गए। इनमें से कई स्थान रिहायशी क्षेत्रों और स्कूलों के पास भी थे। सभी नमूनों में 100 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) से लेकर 43,800 पीपीएम तक सीसे का स्तर पाया गया, जो व्यापक प्रदूषण की ओर इशारा करता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 52 प्रतिशत नमूनों में सीसे की मात्रा 5,000 पीपीएम की सीमा से अधिक थी। सीसे की इतनी मात्रा जिस स्थान पर हो उसे खतरनाक प्रदूषित स्थल माना जाता है। वहीं 31 प्रतिशत नमूने औद्योगिक क्षेत्रों के तय मानकों से भी ऊपर पाए गए।
चौंकाने वाली बात यह रही कि अधिकृत (फॉर्मल) रीसाइक्लिंग इकाइयों के आसपास औसतन ज्यादा सीसा पाया गया, जबकि अनधिकृत इकाइयों में भी प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रहा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सीसा एक अत्यंत विषैला धातु है, जो हवा, पानी और मिट्टी के जरिए मानव शरीर में पहुंचकर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।
यमुना में प्रदूषण बढ़ा, कोलिफॉर्म और बीओडी स्तर चिंताजनक
दिल्ली में यमुना नदी का प्रदूषण मार्च में और बढ़ गया है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की रिपोर्ट के अनुसार, फीकल कोलिफॉर्म और बीओडी स्तर में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। असगरपुर में कोलिफॉर्म स्तर 4 लाख एमपीएन/100 मिली तक पहुंच गया, जो तय सीमा से कई गुना अधिक है। अन्य स्थानों पर भी फरवरी के मुकाबले बढ़ोतरी देखी गई।
बीओडी स्तर 2 से 60 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच रहा, जबकि मानक 3 मिलीग्राम प्रति लीटर है। अधिक बीओडी से पानी में ऑक्सीजन की कमी होती है, जिससे जलीय जीवन प्रभावित होता है। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि बड़ी मात्रा में अनट्रीटेड सीवेज नदी में जा रहा है।
यमुना प्रदूषण: गुरुग्राम के नालों में बंद होगा सीवेज प्रवाह
हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम में यमुना में प्रदूषण कम करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अधिकारियों के अनुसार, शहर के लेग-1, लेग-2 और लेग-3 स्टॉर्म वॉटर ड्रेनों में हो रहे अवैध सीवेज डिस्चार्ज को जून के अंत तक चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाएगा। अनुमान है कि फिलहाल करीब 150 मिलियन लीटर अनट्रीटेड सीवेज प्रतिदिन इन नालों में जा रहा है, जिसे अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) की ओर मोड़ा जाएगा। हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा कि भूमि उपयोग परिवर्तन की मंजूरी के दौरान परियोजनाओं में सीईटीपी लगाना भी जरूरी किया जा सकता है।
नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में भारत तीसरे स्थान पर
भारत स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में चीन और अमेरिका के बाद दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने ब्राजील को पीछे छोड़ दिया है। देश की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 250.52 गीगावाट हो गई है। वित्त वर्ष 2025-26 में 55.3 गीगावाट की नई गैर-जीवाश्म क्षमता जोड़ी गई।
जुलाई 2025 में पहली बार कुल बिजली मांग को पूरा करने में 51.5 प्रतिशत हिस्सेदारी नवीकरणीय ऊर्जा की रही। वहीं, कुल बिजली उत्पादन में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 29.2 प्रतिशत रही। भारत ने 2025 में ही 50 प्रतिशत स्थापित क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर ली, जो कि 2030 का लक्ष्य था।
सरकार 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य हासिल करने पर काम कर रही है।
2026 में दूसरा सबसे बड़ा सोलर बाजार बनेगा भारत
भारत 2026 में वार्षिक इंस्टॉलेशन के आधार पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा बाजार बनने की ओर बढ़ रहा है। नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन के अनुसार, देश ने 14 महीनों में 50 गीगावाट सौर क्षमता जोड़कर 150 गीगावाट का आंकड़ा छू लिया है। पहले 50 गीगावाट तक पहुंचने में 11 साल लगे थे, जबकि 100 गीगावाट क्षमता तीन साल में हासिल हुई। मौजूदा गति से भारत हर साल करीब 50 गीगावाट सौर क्षमता जोड़ रहा है।
इस रफ्तार से 2030 तक 300 गीगावाट सौर क्षमता हासिल कर 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य पूरा करने की संभावना है।
सौर ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज से भारत को मिल सकती है 90% बिजली: रिपोर्ट
एक नई रिपोर्ट के अनुसार, सौर ऊर्जा और सस्ती बैटरी स्टोरेज के जरिए भारत अपनी 90 प्रतिशत बिजली की जरूरत कम लागत में पूरी कर सकता है। अध्ययन में कहा गया है कि यह मौजूदा बिजली दरों से भी सस्ता हो सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में भारत अपनी अधिकांश बिजली जरूरत सोलर और बैटरी से पूरी कर सकता था। इसकी औसत लागत करीब 5.06 रुपए प्रति यूनिट आंकी गई है। यह मॉडल दिन और रात दोनों समय बिजली आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है, खासकर उन राज्यों में जहां धूप ज्यादा होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता घटेगी।
कल्पक्कम परमाणु रिएक्टर ने हासिल की क्रिटिकलिटी
तमिलनाडु के कल्पक्कम में भारत के 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने सफलतापूर्वक क्रिटिकलिटी हासिल कर ली है। इसके साथ ही देश ने अपनी तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा योजना के दूसरे चरण में प्रवेश किया है। इस रिएक्टर में परमाणु विखंडन की नियंत्रित श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू हुई है, जिससे ऊर्जा उत्पादन संभव होगा। यह तकनीक जितना ईंधन खर्च करती है, उससे अधिक ईंधन उत्पन्न करती है।
रिएक्टर के 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक व्यावसायिक संचालन में आने की उम्मीद है। यह उपलब्धि भारत के थोरियम भंडार के उपयोग और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
दिल्ली सरकार ने ईवी नीति का मसौदा जारी किया, सब्सिडी में बदलाव
दिल्ली सरकार ने नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति 2026 का मसौदा जारी किया है, जिसमें कुछ कैटेगरी के वाहनों की खरीद पर दिए जाने वाले प्रोत्साहनों में बदलाव किया गया है। दोपहिया वाहनों के लिए टेपरिंग, यानी घटती हुई सब्सिडी का प्रावधान है। पहले वर्ष में बैटरी क्षमता के आधार पर अधिकतम 30,000 रुपए तक की सब्सिडी मिलेगी, जो अगले वर्षों में घटेगी।
पुराने बीएस-IV या उससे पुराने पेट्रोल-दोपहिया वाहनों को स्क्रैप कराने पर 10,000 रुपए का अतिरिक्त लाभ मिलेगा। इससे पहले वर्ष में इलेक्ट्रिक स्कूटर की कीमत काफी कम हो सकती है।
चारपहिया वाहनों पर सीधे सब्सिडी नहीं दी गई है। हालांकि पुराने पेट्रोल या डीजल कार को स्क्रैप कर नई ईवी खरीदने पर 1 लाख रुपए का इंसेंटिव मिलेगा। यह लाभ सीमित खरीदारों के लिए होगा। ईवी पर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में छूट जारी रहेगी। साथ ही, मजबूत हाइब्रिड वाहनों पर 50 प्रतिशत टैक्स छूट का प्रस्ताव भी रखा गया है।
खाड़ी युद्ध के बाद ईंधन की कीमतों में उछाल से यूरोप में EVs में दिलचस्पी बढ़ी
खाड़ी में युद्ध शुरू होने के बाद से पूरे यूरोप में इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) में दिलचस्पी बढ़ी है, क्योंकि पेट्रोल की बढ़ती कीमत के मुकाबले प्लग से मिलने वाली सस्ती बिजली फायदेमंद है।
फरवरी में जंग शुरू होने के बाद से UK, जर्मनी, फ्रांस और स्पेन के ऑनलाइन मार्केटप्लेस ने EVs के बारे में पूछताछ में भारी बढ़ोतरी की सूचना दी है।
रॉयटर्स के मुताबिक मिडिल ईस्ट संघर्ष ने EVs की ओर लोगों को बढ़ावा दिया है। युद्ध से यूरोप में पुरानी EV की बिक्री भी बढ़ी है। फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा है कि फॉक्सवैगन, BMW और रेनॉल्ट सहित “पश्चिमी कार बनाने वाली कंपनियाँ” उनमें से हैं जो” रेंज-एक्सटेंडेड EVs पर विचार कर रही हैं जिनमें “एक छोटा इंजन होता है जो बैटरी को चार्ज करने के लिए सिर्फ़ जनरेटर का काम करता है”। उधर इस युद्ध के बाद नए ऊर्जा वाहन (NEV) में “रुचि फिर से बढ़ने” के कारण मार्च में चीन से इसके निर्यात में एक साल पहले की तुलना में 140% की वृद्धि हुई।
बैटरी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए 32,000 करोड़ रुपए की योजना
भारत सरकार घरेलू बैटरी निर्माण बढ़ाने के लिए 3.8 अरब डॉलर (करीब 32,000 करोड़ रुपए) का प्रोत्साहन पैकेज तैयार कर रही है। इस योजना के तहत बैटरियों के लिए ‘एप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स’ (एएलएमएम) लागू की जाएगी, जैसा सोलर सेक्टर में है। इसका उद्देश्य गुणवत्ता सुनिश्चित करना और आयात, खासकर चीन पर निर्भरता कम करना है।
सरकार ईवी और ऊर्जा भंडारण क्षमता बढ़ाने के साथ देश में गीगाफैक्ट्रियां स्थापित करने के लिए वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करना चाहती है। अधिकारियों के अनुसार, यह कदम सप्लाई चेन मजबूत करेगा और भारत को बैटरी निर्यात का प्रमुख केंद्र बना सकता है।
आईईए प्रमुख: मौजूदा तेल और गैस संकट 1973, 1979, 2022 के कुल संकट से भी बदतर
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के फातिह बिरोल ने फ्रांस के सबसे पुराने और प्रमुख समाचार पत्र ले फिगारो को बताया कि मौजूदा एनर्जी संकट ‘1973, 1979 और 2022 के कुल संकट’ से भी बदतर है, रॉयटर्स के मुताबिक बिरोल ने कहा: ‘दुनिया ने कभी भी एनर्जी सप्लाई में इतनी बड़ी रुकावट का अनुभव नहीं किया है’।
द गार्डियन ने भी इस इंटरव्यू को कवर किया और लिखा है कि बिरोल ने कहा कि विकासशील देशों को तेल और गैस की ऊंची कीमतों, खाने की चीजों की ऊंची कीमतों और महंगाई में तेजी से सबसे ज्यादा नुकसान होगा, जबकि यूरोपीय देशों पर भी इसका असर पड़ेगा।
फाइनेंशियल टाइम्स के एनर्जी सोर्स न्यूज़लेटर ने बिरोल के छह अनुमानों की रिपोर्ट दी कि एनर्जी संकट भविष्य को कैसे आकार देगा। आउटलेट के अनुसार, इनमें न्यूक्लियर पावर में तेजी, कोयले के इस्तेमाल में बढ़ोतरी और यूरोप में रिन्यूएबल पावर इंस्टॉलेशन में बढ़ोतरी शामिल है।
कोयला गैसीकरण मिशन: 6 साल बाद भी नहीं शुरू हो सका उत्पादन
भारत का कोयला गैसीकरण मिशन शुरू होने के छह साल बाद भी अपेक्षित प्रगति नहीं दिखा पाया है। 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अभी तक व्यावसायिक उत्पादन शुरू नहीं हो सका है। सरकार ने 2026-27 के बजट में इस मिशन के लिए 3,525 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जो पिछले वर्ष से कई गुना अधिक है। हालांकि 2025-26 के बजट का अधिकांश हिस्सा खर्च ही नहीं हुआ।
पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण ऊर्जा संकट बढ़ने के बीच यह मिशन फिर चर्चा में है। इसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना है। भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। चीन जहां बड़े पैमाने पर कोयला गैसीकरण कर रहा है, वहीं भारत की प्रगति धीमी रही है। कई परियोजनाएं मंजूरी और क्रियान्वयन में देरी से जूझ रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद मिशन को तेज करने की जरूरत है।
एलपीजी निर्भरता घटाने के लिए ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करेगा भारत
भारत सरकार ईंधन संकट से बचने के लिए एलपीजी पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रही है। सरकार मध्यम और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है। इसके तहत पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर, पवन और ग्रीन हाइड्रोजन को प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार आयात स्रोतों में विविधता भी ला रही है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने 2026 के लिए अमेरिका से करीब 2.2 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी आयात के समझौते किए हैं। यह देश की कुल एलपीजी आयात जरूरत का लगभग 10 प्रतिशत पूरा करेगा।






