काट दो सारे पेड़, हमें चाहिये कंकरीट का जंगल!

Newsletter - October 16, 2019

पेड़ नहीं जंगल चाहिये: सरकारें स्वस्थ जंगल का तबाह कर पेड़ों का झुनझुना थमा देती हैं लेकिन पेड़ लगाने के मामले में भी ईमानदारी कम और लापरवाही के साथ भ्रष्टाचार का बोलबाला है.

आरे की विनाशलीला, पेड़ काटना बनी हमारी आदत

मुंबई के आरे क्षेत्र में सरकार की देखरेख में पेड़ कटे और जब तक सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया तब तक चिन्हित किये गये 2,185 में से 2,145 पेड़ काटे जा चुके थे। यानी 98% पेड़ों का सफाया। अब मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (MMRC)  कह रही है कि वह शहीद हुये इन पेड़ों के बदले आरे और पड़ोस में बने संजय गांधी नेशनल पार्क में 24,000 पेड़ लगायेगी।

लेकिन क्या पेड़ लगाना किसी जंगल की भरपाई हो सकती है। अक्सर देखा गया है कि पेड़  काट कर उसकी भरपाई के लिये दिये गये आदेश खानापूरी की तरह होते हैं। अक्सर प्रेस में फोटो खिंचाने के लिये नेता, मंत्री और अधिकारी पेड़ लगाते हैं और फिर उनका कोई ख़याल ही नहीं रखता। कई बार अधिक पेड़ लगाने के चक्कर में पौंध इतनी करीब रोप दी जाती है कि पेड़ पनप ही नहीं पाते।

असल में जंगलों को काटने के लिये ठेकेदारों, निजी कंपनियों के साथ सरकार में बैठे अधिकारियों ने हमेशा ही नये तरीके तलाशे हैं। सरकार के अपने आंकड़े कहते हैं कि 1980 से आज तक 15 लाख हेक्टेयर जंगल काटे जा चुके हैं। इनमें से 20% जंगल 2010 से लेकर अब तक काटे गये। ग्लोबल वॉच की रिपोर्ट कहती है कि भारत ने 2001 से 2018 के बीच 16 लाख हेक्टेयर हरित कवर खोया। 

विकास परियोजनाओं के नाम पर पेड़ कटना भी लगातार जारी है। इसकी एक बड़ी मिसाल उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालय में पेड़ों का अंधाधुंध कटान है जहां चारधाम यात्रा मार्ग के लिये  50 हज़ार से अधिक पेड़ तो आधिकारिक रूप से काटे गये।  इसी तरह उत्तर प्रदेश के वन अभ्यारण्य और मध्य प्रदेश समेत देश के तमाम हिस्सों में जंगलों पर मानो सरकार ने हमला बोला हुआ है।


क्लाइमेट साइंस

तबाही के बाद विदाई: इस साल मानसून देर से आया, देर से गया और तबाही मचा कर गया।

भारत: एक महीने की देरी से विदा हुआ मॉनसून

पिछले 58 साल में पहली बार भारत में मॉनसून एक महीने की देरी से अक्टूबर में आकर थमा है। इस साल 10 अक्टूबर को मॉनसून की बारिश थमी। इससे पहले 1961 में 1 अक्टूबर को मॉनसून विदा होना शुरू हुआ था। भारत जैसे देश में यह काफी अजब बात है जहां लोग 1 सितंबर से नया सीज़न शुरू मानते हैं और उसी हिसाब से फसल की तैयारी करते हैं। महत्वपूर्ण है कि इस साल औसत बरसात (Long Period Average – LPA) सामान्य से 110% अधिक हुई जबकि जून के अंत तक बरसात में 33% की कमी थी।

भारी बरसात से इस साल सैकड़ों लोगों की जानें भी गईं और देश के कई हिस्सों में तबाही हुई। गृह  मंत्रालय के मुताबिक अब तक 2100 लोग मारे गये हैं और 46 लापता हैं। बरसात से मची तबाही में 22 राज्यों के कुल 25 लाख लोग प्रभावित हुये।

क्लाइमेट चेंज: अब लू के थपेड़े होंगे और विकराल  

आपको याद होगा कि बाढ़ के प्रकोप से पहले बिहार में इस साल हीटवेव यानी लू की वजह से करीब 200 लोगों की जान ले ली थी और सैकड़ों लोगों को अस्पताल में भरती होना पड़ा। दुनिया के कई हिस्सों में प्रचंड लू का असर दिखा। अब एक नये शोध में पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के साथ लू की घटनायें ही नहीं बढ़ेंगी बल्कि इनका प्रभाव क्षेत्र भी फैलता जायेगा। इस प्रभाव क्षेत्र में औसतन 50% की बढ़ोतरी हो सकती है। अब इन्वायरमेंटल रिसर्च लैटर में छपे इस शोध के प्रमुख लेखक ब्रेड लियॉन का कहना है, “बड़ी हीटवेव का मतलब है कि अब अधिक बिजली की मांग और ग्रिड में पीक डिमांड बढ़ने का दबाव रहेगा क्योंकि लोग एसी जैसी सुविधाओं का अधिक इस्तेमाल करेंगे।”

 UK में गायब हो सकते हैं एक-चौथाई स्तनधारी: रिपोर्ट   

स्टेट ऑफ नेचुरल वर्ल्ड की रिपोर्ट के यूनाइटेड किंगडम में एक-चौथाई स्तनधारी विलुप्त होने के कगार पर हैं। जिन 7000 प्रजातियों का इस शोध में अध्ययन किया गया उनमें से 41% प्रजातियों की संख्या 1970 से लगातार कम हो रही है। शोध कहता है कि हर 7 में एक प्रजाति पर संकट मंडरा रहा है।

इसी शोध से यह भी पता चला है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से देश के वन्य जीवन और इकोलॉजी पर  “व्यापक बदलाव” हुये हैं। चिड़ियों, तितलियों, कीट-पतंगों और ड्रेगन फ्लाई की कई प्रजातियां अब हर दस साल  में 20 किमी उत्तर की ओर जाती दिख रही हैं।

CO2 इमीशन से घट रही उत्पादकता, जीडीपी में 2% की कमी    

क्लाइमेट चेंज के कारण कई आर्थिक क्षेत्रों में लाखों करोड़ का नुकसान हो रहा है क्योंकि अत्यधिक गर्मी से मज़दूरों की उत्पादकता घट रही है। तापमान बढ़ने और हीटवेव के पीछे ग्लोबल वॉर्मिंग का असर है जो कि कार्बन इमीशन (उत्सर्जन)से लगातार बढ़ रही है। एक नये शोध के मुताबिक हर एक लाख करोड़ टन CO2 इमीशन से दुनिया में जीडीपी के 0.5% के बराबर श्रमिक उत्पादकता का नुकसान होता है। पिछले साल पूरी दुनिया में 4000 करोड़ टन CO2 उत्सर्जन हुआ। शोध कहता है कि अब तक खनन, कृषि और निर्माण क्षेत्र में कुल मिलाकर 2% जीडीपी का नुकसान हो चुका है।


क्लाइमेट नीति

पानी बचाओ, प्रदूषण रोको: जो काम उद्योगों को खुद ज़िम्मेदारी से करना चाहिये उसके लिये अदालत को आदेश देने पड़ रहे हैं।

NGT: “उद्योग पानी का पुन: इस्तेमाल करें, हिसाब किताब रखें”

पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिये नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने फूड प्रोसेसिंग प्लांट्स और बूचड़खानों समेत तमाम उद्योगों से कहा है कि वह पानी-खर्च का हिसाब-किताब रखें। अदालत ने उद्योगों से कहा है कि इस्तेमाल के बाद गंदे पानी को ज़मीन में या नदियों में छोड़ने के बजाय  रिसाइकिल किया जाये। पर्यावरण नियमों की अनदेखी के लिये अलीगढ़ की एक फूड प्रोसेसिंग यूनिट के खिलाफ याचिका सुनने के बाद अदालत ने यह आदेश दिये हैं।

दुनिया के 30 बड़े शहरों में कार्बन उच्चतम स्तर पर

लंदन, न्यूयॉर्क, सिडनी और वेनिस समेत दुनिया के 30 बड़े शहरों में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है यानी अब इन शहरों के उत्सर्जन नहीं बढ़ रहे। यह बात पिछले दिनों C-40 विश्व मेयर सम्मेलन से ठीक पहले सामने आई। वैज्ञानिकों ने पहले ही कहा कि धरती के तापमान को 1.5°C तक सीमित रखने के लिये दुनिया के उत्सर्जन साल 2020 के बाद नहीं बढ़ने चाहिये।  इस लिहाज़ से यह एक अच्छी ख़बर है कि बड़े शहरों में कार्बन बढ़ना रुक गया है।  

C-40: दिल्ली के ली प्रदूषण से लड़ने की शपथ, कोलकाता को मिला सम्मान

डेनमार्क में आयोजित C-40 सम्मेलन, भारत में राजनीतिक कारणों से सुर्खियों में रहा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को केंद्र सरकार ने सम्मेलन में जाने की अनुमति नहीं दी। हालांकि केजरीवाल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये सम्मेलन को संबोधित किया और C-40 क्लीन एयर घोषणापत्र के तहत वायु प्रदूषण से लड़ने का प्रण लिया। इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले 94 में से केवल 38 देशों ने ही घोषणापत्र पर दस्तखत किये। कोलकाता ने ग्रीन मोबिलिटी के लिये C-40  अवॉर्ड जीता।

जलवायु परिवर्तन: दुनिया के बड़े बैंकों का रवैया ढुलमुल

भले ही दुनिया में सस्टेनेबल फाइनेंस पर बहस शुरु हो गई हो लेकिन इसे लेकर लक्ष्य हासिल करने के मामले में दुनिया के बड़े बैंकों का रिकॉर्ड बहुत ख़राब है। वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट द्वारा जारी नई रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के सबसे बड़े 50 बैंकों में से ज़्यादातर ने इस दिशा में कोई संकल्प नहीं दिखाया है और अभी भी वह कोयले, तेल और गैस जैसी कंपनियों को ही वित्तीय मदद कर रहे हैं।


वायु प्रदुषण

धुंध बढ़ेगी: जाड़ों की आहट के साथ प्रदूषण बढ़ना शुरु हो गया है। खांसने और आपातकालीन कदमों के लिये तैयार रहिये।

दिल्ली में प्रदूषण स्तर फिर बढ़ा, आपातकालीन उपाय लागू करने का ऐलान

अक्टूबर का दूसरा हफ्ता खत्म होते होते दिल्ली और आसपास के इलाकों की एयर क्वॉलिटी “बहुत ख़राब” की श्रेणी में पहुंच गई। हरियाणा, पंजाब और आसपास के इलाकों में फसल की खुंटी जलाना प्रमुख वजह रहा। इसे देखते हुये दिल्ली-एनसीआर के इलाके में आपातकालीन उपाय का ऐलान किया गया है जिसे ग्रेडेड एक्शन प्लान (GRAP) भी कहा जाता है। इसके तहत 15 अक्टूबर से डीज़ल जेनरेटर पर पाबंदी लगा दी गई है। फसल संबंधी आग में 9 दिनों के भीतर 6 गुना बढ़ोतरी हुई। GRAP के तहत ईंट के भट्ठों को बन्द करने के अलावा, सड़क पर पानी छिड़कने और सफाई के लिये झाड़ू के बजाय मशीन का इस्तेमाल और केवल गैस से चलने वाले बिजलीघरों को ही अनुमति दी जाती है।

दिल्ली में सड़क पर कारों की संख्या कम करने के लिये ऑड-ईवन योजना की घोषणा पहले ही की जा चुकी है जो 4 नवंबर से लागू होगी। 

प्लास्टिक जलाने पर सज़ा, दिल्ली और हरियाणा सरकार को ढिलाई पर फटकार

प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण के लिये बनी EPCA ने दिल्ली और हरियाणा सरकार को चेतावनी दी है। यह चेतावनी इसलिये दी गई है क्योंकि ये सरकारें प्लास्टिक जलाने वालों को रोकने में नाकाम रहीं। इसके अलावा निर्माण कार्य से होने वाले प्रदूषण और सड़क पर उड़ने वाली धूल से निपटने के पर्याप्त उपाय नहीं किये गये।  EPCA प्रमुख भूरे लाल ने दिल्ली के मुंडका और टिकरी कलां के साथ हरियाणा के बहादुरपुर का दौरा किया और नियम तोड़ने वालों पर 1 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।

पिछले साल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्लास्टिक जलाने पर रोक लगा दी थी और दिल्ली सरकार पर टिकरी कलां में प्लास्टिक बर्निंग रोकने पर नाकाम रहने के लिये  के लिये 25 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था।

आई खुंटी जलाने के पूर्वानुमान की तकनीक,  किसानों ने मांगा मुआवज़ा

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने एक आधुनिक एयर क्वॉलिटी वॉर्निंग सिस्टम शुरू किया है जिससे हर साल उन जगहों का पता चल पायेगा जहां किसी विशेष दिन खुंटी जलाये जाने की संभावना है। वैज्ञानिकों ने 15 साल के डाटा के आधार पर यह सिस्टम तैयार किया है और इससे अधिकारियों को खुंटी जलाने की घटना रोकने और नियम तोड़ने वालों को दंडित करने में सहूलियत होगी।

उधर हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसानों खुंटी जलाना जारी रखा है और सरकार से कहा है कि दो फसलों के बीच कम वक़्त होने और मुआवज़ा न  मिलने की स्थिति में उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। किसान कहते हैं कि धान की फसल समेटने और गेहूं की फसल रोपाई बीच केवल 3 हफ्ते का फासला होता है। 

ईंट भट्टा मालिक कोर्ट को अपना पक्ष समझाने में नाकाम रहे, देना होगा जुर्माना

पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट ने ईंटा भट्ठा मालिकों की अपील ठुकरा दी है जिसमें उन्होंने जुर्माने में माफी या ढील की गुहार की थी। इन भट्ठा मालिकों पर अपने ईंट भट्ठों को नये मानकों के हिसाब से अपग्रेड न करने के लिये यह दंड लगाया गया था। इन भट्ठों पर उत्पादन क्षमता के हिसाब से 20 से 25 बज़ार रुपये प्रतिदिन का दंड लगाया गया है। कोर्ट ने यह जुर्माना इस साल 22 जनवरी को NGT द्वारा दिये गये आदेश के तहत लगाया है।


रिन्यूएबिल

Photo - खींचतान जारी: आंध्र सरकार का आरोप है कि उसे साफ ऊर्जा में अग्रणी होने की सज़ा मिल रही है।

आंध्र सरकार की केंद्र को चिट्ठी, “साफ ऊर्जा में अव्वल होने की सज़ा”?

आंध्र प्रदेश सरकार के बिजली मंत्री ने केंद्र को चिट्ठी लिखकर कहा है कि उनके राज्य को सबसे अधिक साफ ऊर्जा उत्पादन की सज़ा मिल रही है। इस वक़्त कई पावर वितरण कंपनियों का नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में भुगतान को लेकर विवाद चल रहा है। आंध्र प्रदेश के बिजली मंत्री बी श्रीनिवास ने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह को चिट्ठी लिखकर कहा है कि राज्य के कुल बिजली उत्पादन में साफ ऊर्जा (25%) सबसे अधिक है। श्रीनिवास का तर्क है कि जिन राज्यों ने साफ ऊर्जा में देरी से पहल की वह आज कम रेट से भुगतान कर रहे हैं और आंध्र प्रदेश को अग्रणी होने की सज़ा मिल रही है। राज्य ने केंद्र से वित्तीय मदद की मांग की है।

“आंध्र प्रदेश 4.84 रु प्रति यूनिट की दर से बिजली कंपनियों को भुगतान कर रहा है जबकि देर से शुरुआत करने वाले राज्य केवल 2.4 रु प्रति यूनिट दे रहे हैं।” बी श्रीनिवास ने अपनी चिट्ठी में लिखा है।

क्या भारत पायेगा साफ ऊर्जा का तय लक्ष्य?

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) ने कहा है कि भारत ने 2022 तक जो 175 GW साफ ऊर्जा का दावा किया है उसे पाना मुमकिन नहीं होगा। एजेंसी के मुताबिक भारत तय लक्ष्य से 42% पीछे छूट सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में न्यूयॉर्क सम्मेलन के दौरान तय लक्ष्य को 450 GW तक बढ़ाने का ऐलान किया। क्रिसिल ने ढुलमुल नीति और रिकॉर्ड कम दरों के साथ रेग्युलेशन से जुड़ी चुनौतियों का हवाला दिया जबकि सरकार ने इस अनुमान को खारिज़ करते हुये कहा है कि क्रिसिल ने साफ ऊर्जा के लिये सरकार के उठाये कदमों की सही गणना नहीं की है। सरकार के मुताबिक सितम्बर 2019 तक 82 GW साफ ऊर्जा के संयंत्र लगाये जा चुके हैं और 2021 की शुरुआत तक साफ ऊर्जा की यह क्षमता 121 GW तक पहुंच जायेगी।

UK: साफ ऊर्जा क्षमता पहली बार जीवाश्म ईंधन से आगे

पिछली तिमाही में यूनाइटेड किंगडम या इंग्लैंड में सौर, पवन और बायोमास स्रोतों से बिजली उत्पादन तेल, कोयले और गैस (जीवाश्म ईंधन) से मिलने वाली बिजली से अधिक रहा। सितंबर के महीने में साफ ऊर्जा उत्पादन 40% अधिक हुआ। यूके ने इस साल जो ऑफशोर विंडफार्म बनाये हैं उसी का असर है कि यहां साफ ऊर्जा (कुल बिजली का 39%) जीवाश्म ईंधन उत्पादन से आगे निकल गई। कार्बन ब्रीफ के ताज़ा विश्लेषण से पता चलता है कि यूके में कोयला पावर प्लांट्स से मिलने वाली 1% से भी कम रही।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

नये नियम: बैटरी वाहन क्षेत्र में नये नियम बनाये गये हैं लेकिन सवाल है कि ईवी की बिक्री कैसे बढ़े? Photo: Ather Energy

नीतिगत बदलाव: बैटरी वाहनों से जुड़े नियमों में भी होगा फेरबदल

ऊर्जा (बिजली) मंत्रालय नियमों में जो बदलाव कर रहा है उसका असर बैटरी वाहन क्षेत्र में भी दिखेगा। हाइवे पर भारी बैटरी वाहनों के लिये हर 100 किलोमीटर पर फास्ट बैटरी चार्जिंग स्टेशन बनेंगे। शहरों में चार्जिंग स्टेशन का जाल फैलाने के लिये हर  3 किमी X 3 किमी के दायरे में  एक चार्जिंग स्टेशन होगा। कारों के लिये हाइवे पर हर 25 किमी पर चार्जिंग स्टेशन बनाने की योजना है। बैटरी वाहनों को टोल टैक्स में छूट मिल सकती है।

केंद्र सरकार लीथियम-आयन बैटरियों की रिसायक्लिंग नीति पर भी विचार कर रही है जिसमें ज्यादातर इलैक्ट्रिक वाहनों की बैटरी होंगी। भारत में लीथियम-आयन बैटरियों का बाज़ार 35% की रफ्तार से बढ़ने की संभावना है। 2018 में यह 2.9 गीगावॉट क्षमता का था जो 2030 तक बढ़कर 2030 गीगावॉट का हो जायेगा।

कार्बन मुक्त हवाई उड़ान के लिये NASA कर रही है प्रयोग

कार्बन मुक्त उड़ान के लिये अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA एक ऑल इलैक्ट्रिक प्लेन – X-57 मैक्सवेल – पर प्रयोग कर रही है। इसका मकसद ज़ीरो इमीशन एविएशन की ओर कदम बढ़ाना है। अभी दुनिया में कुल ग्रीन हाउस गैस का 2.4% हवाई उड़ानों की वजह से होता है। माना जा रहा है कि इस विमान की पहली उड़ान साल 2020 तक हो पायेगी और सामान्य एयरक्राफ्ट के मुकाबले इसकी दक्षता (efficiency) 500% अधिक होगी।


जीवाश्म ईंधन

ईमीशन नहीं रुका तो सब बेकार: सिर्फ कोयला हटा देना काफी नहीं है। बड़ी मात्रा में गैस का इस्तेमाल भी भारी उत्सर्जन कर सकता है। फोटो - Yale

भारत: नये गैस ग्रिड के लिये 6000 करोड़ डॉलर

सरकार एनर्जी डिमांड और साफ ऊर्जा के लक्ष्य के बीच फंसी दिखती है। इसीलिये जहां एक ओर ऊर्जा मंत्री ने कहा है कि कोयले पर हो रही बहस का स्वरूप बदलने की ज़रूरत है ताकि ध्यान इमीशन को करने पर लगाया जा सके तो दूसरी ओर भारत के पेट्रोलियम मंत्री ने ऐलान किया कि 2024 तक राज्यों में गैस सप्लाई का जाल बिछाने के लिये $ 6000 करोड़ खर्च किये जायेंगे। इस मिशन का नाम है – ऊर्जा गंगा प्रोजेक्ट। इसके तहत बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में प्रतिदिन 1.6 करोड़ स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस सप्लाई होगी। इस कदम का मकसद गैस के मुकाबले अधिक कार्बन छोड़ने वाले कोयले की खपत को घटाना है।

जर्मनी: हवाई यात्रा पर बढ़ेगा टैक्स, कोल प्लांट्स को प्रस्तावित मुआवज़े में कटौती

जर्मन कैबिनेट छोटी और लंबी दूरी की उड़ानों पर टैक्स बढ़ा सकती है। इस कदम का मकसद उन लोगों की संख्या कम करना है जो  अंधाधुंध हवाई सफर करते हैं जबकि उनके पास कम कार्बन छोड़ने वाले यात्रा साधन उपलब्ध हैं। यूरोप में इन दिनों हवाई उड़ानों के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं।

जर्मनी 2023 तक 5 GW तक के कोल प्लांट बंद करने वाली कंपनियों को प्रस्तावित मुआवजे में भी कटौती कर सकता है। पहले प्रति GW 1200-1500 करोड़ यूरो का मुआवज़ा दिये जाने की बात थी लेकिन अब जर्मन सरकार सभी प्लांट्स के लिये कुल 1000 करोड़ के मुआवज़े तक सीमित कर सकती है।  कई बड़ी कंपनियों द्वारा इस कदम का विरोध होना तय है।

अमेरिका में बड़ी तेल कंपनी ने किया उत्सर्जन में कमी का वादा

अमेरिका की बड़ी तेल और गैस कंपनी शेवरॉन ने वादा किया है कि वह साल 2023 तक तेल निकालने से हो रहे ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 5-10% की कटौती करेगी। ज़मीन से गैस निकालने के मिशन में कंपनी अपनी दक्षता को बढ़ायेगी और इमीशन तीव्रता में 2-5% की कमी करेगी। शेवरॉन अमेरिका में बड़ी तेल और गैस कंपनियों के समूह का हिस्सा है जिसे बिग ऑइल के नाम से जाना जाता है और दुनिया के कुल तेल और गैस कारोबार के एक तिहाई के लिये ज़िम्मेदार है।