नेपाल त्रासदी: कॉप31 से पहले फाइनेंस की कमी उजागर

Hridayesh Joshi31 अक्टू॰. 2026
नेपाल त्रासदी: कॉप31 से पहले फाइनेंस की कमी उजागर

दृश्य श्रेय: Arkatapa Basu


पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने संबोधन के दौरान कुछ ऐसे मुद्दे उठाए जो ग्लोबल साउथ, विशेषकर दक्षिण एशिया के सामने चुनौती बने हुए हैं। उन्होंने 26 अगस्त को भोटेकोशी-त्रिशूली रिवर सिस्टम में आई आपदा का जिक्र किया, जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता हैं।

बाढ़ के एक महीने बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि इस आपदा से उबरने और पुनर्निर्माण पर नेपाल की जीडीपी का 10 फीसदी -- करीब पांच अरब डॉलर -- तक खर्च हो सकता है।

इस आपदा ने एक बार फिर दिखाया है कि सीमित संसाधनों वाले देश जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के प्रति कितने संवेदनशील हैं। तुर्किये में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप31) से पहले इस आपदा ने लॉस एंड डैमेज, यानी जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान की भरपाई की ओर भी ध्यान खींचा है। 'लॉस एंड डैमेज' (हानि और क्षति) पेरिस समझौते का एक अहम हिस्सा है।

नेपाल की ओर से कई हफ्तों के दबाव के बाद आखिकार लॉस एंड डैमेज फंड (FRLD) ने 22 अक्टूबर को उसे 2.16 करोड़ डॉलर की राशि आवंटित करने का शुरुआती फैसला किया। इसमें 2 करोड़ डॉलर पुनर्निर्माण और 16 लाख डॉलर निगरानी के लिए हैं। किसी विशेष आपदा के लिए कोष का यह पहला ऐसा आवंटन है, हालांकि नेपाल की अनुमानित 4.77 अरब डॉलर की जरूरत के मुकाबले यह रकम बेहद कम है।

'फिल द फंड' अभियान के वैश्विक संयोजक और 'सतत संपदा क्लाइमेट फाउंडेशन' के संस्थापक निदेशक हरजीत सिंह ने इस राशि के आवंटन का स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने कहा कि फैसला लेने में हुई देरी से पता चलता है कि आपात स्थिति में तुरंत सहायता देने के लिए एक स्थायी व्यवस्था की जरूरत है।

उन्होंने कहा: "ऐसा नहीं होना चाहिए कि इतनी बड़ी आपदा झेलने के बाद किसी भी देश को मदद के लिए सात सप्ताह तक इंतजार करना पड़े। और कोष की पहली आपात बैठक बुलाने के लिए उसे लगातार पत्र लिखकर दबाव बनाने की जरूरत पड़े।"

सिंह ने ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग की जिसके तहत कुछ ही दिनों में सहायता पहुंचाई जा सके।

उन्होंने यह भी कहा कि कुछ विकसित देश इस फैसले को भविष्य की मिसाल बनने से रोकना चाहते थे। उनके मुताबिक, विकसित देशों ने नेपाल के लिए राशि जारी करने का समर्थन तो किया, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि इस फैसले के आधार पर भविष्य में कोष के कामकाज को लेकर कोई स्थायी व्यवस्था तय हो जाए।

विकसित देशों की यह हिचकिचाहट एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है।

जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों को केवल एक बार मिलने वाली आपातकालीन सहायता से कहीं अधिक मदद की जरूरत है। लेकिन विकसित देश आवश्यक स्तर पर वित्तीय मदद देने से लगातार बचते रहे हैं।

प्रधानमंत्री शाह के लिए यह आपदा क्लाइमेट जस्टिस का भी सवाल है।

शाह ने यूएन महासभा में  कहा, "यह संकट हमने पैदा नहीं किया, फिर भी हमें इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।" इन शब्दों के जरिए उन्होंने जलवायु परिवर्तन के मामले में कमजोर देशों के साथ हो रहे अन्याय को सामने रखा।

नेपाल अकेला देश नहीं है जो इस स्थिति से जूझ रहा है। भारत भी हिमालय में ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ (GLOF) और भूस्खलन से लेकर विनाशकारी बाढ़, लू और चक्रवात तक  का सामना कर रहा है।

ऐसे में भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया में जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील के सामने बड़ा सवाल यह है कि जब उनके पास समय रहते जलवायु जोखिमों से निपटने और तैयारी करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, तो बढ़ते नुकसान से वे कैसे निपटेंगे और इसकी कीमत कौन चुकाएगा?

 

बढ़ता जलवायु संकट और नुकसान

विकासशील देशों में जलवायु संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। 

पिछले एक दशक में दक्षिण एशिया दुनिया के उन उपक्षेत्रों में शामिल हो गया है जहां जलवायु परिवर्तन का दबाव सबसे ज्यादा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो दशकों में दक्षिण एशिया के 75 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी जलवायु आपदा से प्रभावित हुए हैं।

नेपाल की हालिया आपदा हिमालय में हुई गंभीर प्राकृतिक घटनाओं की लंबी कड़ी का हिस्सा है। इस कड़ी में 2013 में केदारनाथ, 2021 में चमोली, 2023 में सिक्किम और 2025 में धराली में हुई बाढ़ और भूस्खलन  जैसी घटनाएं शामिल हैं।

चक्रवात और समुद्र का बढ़ता जलस्तर तटीय शहरों के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। वहीं अत्यधिक बारिश के कारण शहरी इलाकों में बड़े पैमाने पर बाढ़ आ रही है। इन आपदाओं से केवल जान-माल का नुकसान ही नहीं होता, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचती है और विकास की रफ्तार प्रभावित होती है।

एशियाई विकास बैंक (ADB) के 2014 के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि अगर दुनिया में जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और उससे होने वाले उत्सर्जन का मौजूदा ट्रेंड जारी रहता है, तो भारत समेत दक्षिण एशिया की छह अर्थव्यवस्थाओं की संयुक्त सालाना जीडीपी को 2050 तक औसतन 1.8 फीसदी का नुकसान हो सकता है। 2100 तक यह नुकसान बढ़कर 8.8 फीसदी हो सकता है।

बार-बार आने वाली आपदाओं से सरकारों के खजाने पर भी दबाव बढ़ता है। विकास योजनाओं पर खर्च होने वाली रकम को राहत और पुनर्निर्माण पर लगाना पड़ता है।

 

लॉस एंड डैमेज फंड: वादे और हकीकत

कई वर्षों की बातचीत और चर्चा के बाद मिस्र के शर्म अल-शेख में कॉप27 के दौरान 'फंड फॉर रिस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज' (FRLD) की स्थापना की गई थी। अगले साल दुबई में हुए जलवायु सम्मेलन में इसे शुरू किया गया।

इस फंड का उद्देश्य है उन विकासशील देशों को आर्थिक मदद करना, जिनके पास जलवायु परिवर्तन के नुकसान से उबरने के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

जबकि जलवायु अनुकूलन (अडॉप्टेशन) का मकसद भविष्य में आने वाले खतरों को कम करना है, लॉस एंड डैमेज के तहत उस नुकसान से निपटने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है जो पहले ही हो चुका है या जिसे पर्याप्त प्रयासों के बावजूद टाला नहीं जा सकता।

इसमें घरों और बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण, आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं को बचाना और लोगों की आजीविका फिर से शुरू करने में मदद करना शामिल है।

बाकू में आयोजित कॉप29 में विकसित देशों ने 2035 तक विकासशील देशों में क्लाइमेट एक्शन के लिए हर साल कम से कम 300 अरब डॉलर जुटाने पर सहमति जताई थी। लेकिन फाइनेंस की इस व्यापक प्रतिबद्धता और लॉस एंड डैमेज के लिए उपलब्ध सीमित धन के बीच बड़ा अंतर है।

मार्च 2026 तक इस कोष को केवल 82.2 करोड़ डॉलर देने का वादा मिला था। कोष की पहली वित्तीय सहायता योजना के तहत शुरुआत में 25 करोड़ डॉलर उपलब्ध थे। बाद में इसे बढ़ाकर 34.2 करोड़ डॉलर कर दिया गया। इसके मुकाबले विकासशील देशों ने 2.8 अरब डॉलर की मांग की थी --  यानी सहायता की मांग उपलब्ध रकम से करीब आठ गुना ज्यादा थी।

नेपाल का मामला इस कमी को और स्पष्ट करता है। कोष की ओर से नेपाल को मिली शुरुआती मदद उसकी अनुमानित जरूरत -- करीब पांच अरब डॉलर -- के 0.5 फीसदी से भी कम हैं।

अफ्रीकी देशों समेत ग्लोबल साउथ के कई देशों ने भी इस कोष के पास उपलब्ध सीमित संसाधनों का मुद्दा उठाया है।

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में विजिटिंग सीनियर फेलो और जलवायु वित्त विशेषज्ञ लाबन्या प्रकाश जेना ने कहा, "लॉस एंड डैमेज फंड को अब तक केवल करीब 80 करोड़ डॉलर का वादा मिला है, जबकि जलवायु अनुकूलन के लिए वित्तीय सहायता के रूप में करीब 80 अरब डॉलर उपलब्ध हैं।"

'पावर शिफ्ट अफ्रीका' में क्लाइमेट अडॉप्टेशन एंड रेजिलिएंस फेलो मैरी क्यानी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान की भरपाई के लिए विकसित देशों को अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

उन्होंने कहा, "नेपाल जैसे देश वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बहुत कम योगदान देते हैं, लेकिन जलवायु संकट का बहुत बड़ा बोझ उन्हें असमान रूप से उठाना पड़ रहा है। वैश्विक उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक रूप से अधिक जिम्मेदार विकसित देशों को लॉस एंड डैमेज फंड में अपना योगदान बढ़ाना चाहिए। उनकी प्रतिबद्धता केवल कागजों पर किए गए वादों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह वास्तविक वित्तीय सहायता के रूप में कमजोर देशों तक पहुंचनी चाहिए।"

 

भारत: कौन करेगा नुकसान की भरपाई?

भारत जलवायु परिवर्तन के असर के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। लेकिन क्लाइमेट फाइनेंस, खासकर लॉस एंड डैमेज के लिए आर्थिक सहायता हासिल करने के मामले में भारत की स्थिति जटिल है।

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और यहां ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक रिपोर्ट के मुताबिक, शहरों के विस्तार, उद्योगों के विकास और लोगों के जीवन स्तर में सुधार के साथ 2035 तक वैश्विक ऊर्जा खपत में होने वाली बढ़ोतरी में भारत की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होगी।

हालांकि, आर्थिक विकास के साथ हिमालय से लेकर समुद्री तटों तक जलवायु संबंधी खतरे भी बढ़ रहे हैं।

विश्व बैंक की पिछले साल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को 2050 तक जलवायु परिवर्तन के असर झेलने में सक्षम शहरी  इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए 2.4 लाख करोड़ डॉलर की जरूरत होगी।

वहीं, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के एक अनुमान के अनुसार, केवल बाढ़ से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भारत को हर साल 7 अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी।

जलवायु वार्ताओं में भारत की स्थिति उसके कार्बन उत्सर्जन के आंकड़ों के कारण भी जटिल हो जाती है। भारत दुनिया में हर साल सबसे ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जित करने वाले देशों में शामिल है, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में उसकी स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है।

भारत ने 2024 में 319 करोड़ टन CO₂ का उत्सर्जन किया, जो वैश्विक उत्सर्जन का 8.27 फीसदी था। वहीं, देश में प्रति व्यक्ति सालाना उत्सर्जन 2.2 टन था। 1750 से अब तक दुनिया के कुल CO₂ उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी 3.57 फीसदी रही है, जबकि दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी करीब 18 फीसदी है।

ऐसे में सवाल उठता है कि भारत अपने उत्सर्जन के आंकड़ों और ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में अपनी भूमिका के बीच संतुलन बनाते हुए जलवायु संबंधी नुकसान के लिए वित्तीय सहायता की मांग कैसे कर सकता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अपनी मांग केवल ऐतिहासिक जिम्मेदारी के आधार पर नहीं, बल्कि देश के सामने मौजूद जलवायु जोखिमों के बड़े पैमाने और उनसे निपटने के लिए जरूरी संसाधनों के आधार पर भी रखनी चाहिए।

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र इसका एक उदाहरण है।

आईआईटी रुड़की के सहायक प्रोफेसर सौरभ विजय के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिंदू कुश, काराकोरम और हिमालय के इलाकों में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। उनकी टीम ने सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग तकनीक की मदद से इस पूरे क्षेत्र में करीब 32,000 ग्लेशियर झीलों का नक्शा तैयार किया है।

उन्होंने  कार्बनकॉपी को बताया: "ग्लेशियरों की बर्फ तेजी से कम हो रही है, जबकि ग्लेशियल झीलों का आकार और उनकी संख्या, दोनों बढ़ रहे हैं।"

उनके शोध में पाया गया कि एशिया के 'थर्ड पोल' क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों का कुल क्षेत्रफल 2016-17 से 2022-24 के बीच करीब 5.5 फीसदी बढ़ा। कुछ इलाकों में यह बढ़ोतरी 20 फीसदी से भी अधिक दर्ज की गई।

थर्ड पोल एशिया का एक ऊंचाई वाला क्षेत्र है, जहां ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया में बर्फ का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है।

विजय ने कहा कि ग्लेशियल झीलों के फैलने से पहाड़ी घाटियों में ग्लेशियर से जुड़ी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। इससे भारत, नेपाल, पाकिस्तान और भूटान जैसे देश प्रभावित हो सकते हैं।

ऐसी आपदाओं में जानमाल की हानि के अलावा सड़कों, पुलों, पनबिजली परियोजनाओं और अन्य जरूरी बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंच सकता है।

भारत ने इन खतरों से निपटने के लिए कुछ कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

राष्ट्रीय हिमनद झील विस्फोट बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम (NFRMP) के तहत उत्तराखंड के चमोली जिले में वसुंधरा ताल पर ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ (GLOF) का पता लगाने के लिए राज्य की पहली पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है। यह झील समुद्र तल से 4,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

ऐसी निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणालियों के लिए लगातार निवेश की जरूरत होती है। इसमें खतरनाक झीलों की पहचान करना, उनमें होने वाले बदलावों पर नजर रखना और समय रहते लोगों तक चेतावनी पहुंचाना शामिल है।

विजय ने कहा, "पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलने से इन खतरों को कम करने और ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है।"

जेना के मुताबिक, भारत को जलवायु संबंधी वित्तीय सहायता की मांग करते समय अपने उत्सर्जन के इतिहास और जलवायु संबंधी संवेदनशीलता, दोनों को सामने रखना चाहिए।

उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को अपने मौजूदा कुल उत्सर्जन के आंकड़े पर ही जोर देने के बजाय ऐतिहासिक उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत को लू, चक्रवात और बाढ़ जैसी गंभीर आपदाओं से निपटने के लिए तुरंत मिलने वाले अनुदान की मांग करनी चाहिए। इसके साथ ही आधुनिक पूर्व चेतावनी तकनीक और जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान का सही आकलन करने के मजबूत तरीकों तक पहुंच भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

लॉस एंड डैमेज के लिए वित्तीय सहायता को लेकर चल रही बहस आखिरकार एक बड़े सवाल पर आकर टिकती है: इसकी कीमत कौन और कितनी चुकाएगा?

कार्बनकॉपी की इस रिपोर्ट में बताया गया था कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता की कमी के बीच भारत अपने जलवायु वित्तपोषण की जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू संसाधन और पूंजी जुटाने के दूसरे विकल्प कैसे तलाश सकता है। लेकिन केवल घरेलू संसाधनों के भरोसे जलवायु आपदाओं से होने वाले बढ़ते नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती।

ब्राजील के बेलेम में आयोजित कॉप30 के दौरान ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) ने इसका एक तरीका सुझाया था।

CEEW के एक अध्ययन के मुताबिक, अगर जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार अर्थव्यवस्थाएं अपनी जीडीपी का 0.08 फीसदी हिस्सा FRLD में दें, तो इस कोष के लिए हर साल करीब 60 अरब डॉलर जुटाए जा सकते हैं। CEEW का कहना था कि इस न्यूनतम योगदान व्यवस्था से वैश्विक स्तर पर वित्तीय प्रतिबद्धता बढ़कर जरूरत की कुल रकम का 15 फीसदी हो सकती है। फिलहाल यह हिस्सा केवल 0.2 फीसदी है।

हालांकि, इसके बावजूद यह रकम विकासशील देशों की ओर से मांगे जा रहे सालाना 400 अरब डॉलर से कम होगी।

कॉप31 में यह देखना अहम होगा कि क्या इस तरह के प्रस्तावों को ठोस प्रतिबद्धताओं में बदला जा सकता है और जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहायता जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों तक पहुंचाई जा सकती है या नहीं।

नेपाल के लिए यह मुद्दा बेहद अहम है। बाढ़ के बाद देश को राहत और पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर की जरूरत है।

नेपाल के कृषि, वन एवं पर्यावरण मंत्री के सलाहकार अभिषेक श्रेष्ठ ने कहा कि यह आपदा अंतरराष्ट्रीय जलवायु व्यवस्था की नाकामी का उदाहरण है। उन्होंने इसे "सामूहिक निष्क्रियता की कीमत का एक निर्णायक प्रमाण" बताते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्था न तो जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बंद करा पाई है और न ही विकासशील देशों को समय पर पर्याप्त आर्थिक सहायता दे सकी है। लॉस एंड डैमेज फंड में भी जरूरत के मुताबिक पैसा नहीं जुटाया गया है।

श्रेष्ठ ने हिमालयी और मैदानी इलाकों में जलवायु आपदाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने नेपाल, भारत और चीन से साझा खतरों की पहचान करने, इंटीग्रेटेड पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने और आपदा प्रबंधन की योजनाओं में तालमेल बिठाने की अपील की।

उन्होंने कहा कि इस काम में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी मदद करनी चाहिए। श्रेष्ठ के मुताबिक, "जलवायु अनुकूलन का काम अलग-अलग रहकर नहीं किया जा सकता।"

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