नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) की शुरुआत 2019 में 131 ऐसे शहरों में वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए की गई थी जो प्रदूषण पर विश्व स्वस्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों को पूरा नहीं करते। हालांकि, शुरुआत से ही इसे अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, जहां 23 शहरों के प्रदूषण स्तरों में महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया, वहीं 30 शहरों में वायु गुणवत्ता खराब होने की सूचना मिली। मसलन, वाराणसी में पीएम10 के स्तर में 68% की गिरावट आई, जबकि ओडिशा के अंगुल में पांच वर्षों में पीएम10 के स्तर में 78% की आश्चर्यजनक वृद्धि देखी गई। यह आंकड़े क्षेत्रीय असमानताओं को रेखांकित करते हैं।
एनसीएपी के तहत 10,595 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, लेकिन इसकी 65.3% धनराशि का ही उपयोग किया गया। राज्यों ने संसाधनों को दूसरी परियोजनाओं में लगा दिया। दिल्ली ने अपने आवंटित 42.69 करोड़ रुपए में से केवल 32% खर्च किया, जिसके कारण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अनुदान रोक दिया। हालांकि पराली जलाने के प्रबंधन और बायोमास प्रोसेसिंग संयंत्र जैसे कुछ प्रयास किए गए हैं, लेकिन फिर भी प्रवर्तन में खामियां बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि 2025-26 में कार्यक्रम के तहत निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करना है, तो फंड के कुशल उपयोग और लगातार मॉनिटरिंग की जरूरत है।
थर्मल प्लांट करते हैं 16 गुना अधिक प्रदूषण, एनजीटी का केंद्र को नोटिस
नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली के मौजूदा वायु प्रदूषण संकट पर केंद्र से जवाब मांगा है।
एनजीटी ने यह कार्रवाई एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर की, जिसमें सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के एक अध्ययन के हवाले से बताया गया था कि एनसीआर में थर्मल पावर प्लांट पराली जलाने की तुलना में 16 गुना अधिक सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) उत्सर्जित करते हैं।
कार्बनकॉपी में भी हम आपको इस अध्ययन के बारे में बता चुके हैं।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि पराली जलाने से प्रति वर्ष लगभग 17.8 किलोटन SO₂ उत्सर्जन होता है, वहीं कोयले से चलने वाले थर्मल प्लांट 281 किलोटन से अधिक SO₂ उत्सर्जन करते हैं।
पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन पर चेतावनी देते हुए, एनजीटी ने कई सरकारी निकायों को इस मामले में शामिल किया है।
धूम्रपान न करने वालों में तेजी से देखा जा रहा है फेफड़ों का कैंसर
तमिलनाडु में हर साल फेफड़ों के कैंसर के 3,500-4,000 नए मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें चेन्नई अव्वल है। चिंता की बात यह है कि धूम्रपान न करने वालों और महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है, जो संभावित रूप से वायु प्रदूषण से जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि धूम्रपान के साथ-साथ, प्रदूषण, औद्योगिक रासायन और एस्बेस्टस इस वृद्धि के प्रमुख कारण हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि तंबाकू कानूनों को सख्ती से लागू करने के अलावा, प्रदूषण नियंत्रण और एस्बेस्टस विनियमन भी कड़ाई से किया जाना चाहिए। इस बढ़ते स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए वाहनों से होनेवाले उत्सर्जन को नियंत्रित करना और सार्वजनिक जागरूकता सुनिश्चित करना जरूरी है।
भारत में हर साल डेढ़ लाख मौतों का जिम्मेदार वायु प्रदूषण
द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 2009 से 2019 तक हुई मौतों में से हर साल लगभग डेढ़ लाख मौतों का संबंध संभावित रूप से पीएम2.5 प्रदूषण के दीर्घकालिक जोखिम से है।
अशोका यूनिवर्सिटी, हरियाणा और सेंटर फॉर क्रॉनिक डिजीज कंट्रोल, नई दिल्ली के शोधकर्ताओं सहित अन्य वैज्ञानिकों ने कहा कि भारत की पूरी 1.4 अरब आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहां पीएम2.5 का सालाना औसत स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाए गए 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक है।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि भारत की लगभग 82 प्रतिशत आबादी, पीएम2.5 स्तर वाले क्षेत्रों में रहती है, जो भारतीय राष्ट्रीय परिवेश वायु गुणवत्ता मानकों (40 माइक्रोन प्रति घन मीटर) द्वारा अनुशंसित से अधिक है।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
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