भारत में भीषण गर्मी की आशंका, आगे और बढ़ेंगी हीटवेव: आईएमडी

भारत में मार्च महीने में हल्की बारिश और तेज़ हवाओं से कुछ जगह गर्मी से थोड़ी राहत भले ही मिली हो, लेकिन इसके बाद मई तक देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है। मौसम विज्ञान विभाग ने यह जानकारी दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मौसम विभाग ने कहा कि मार्च से मई 2026 के बीच पूर्वी और पूर्व-मध्य भारत के अधिकांश हिस्सों, दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कई क्षेत्रों तथा उत्तर-पश्चिम और पश्चिम-मध्य भारत के कुछ हिस्सों में हीटवेव वाले  दिनों के सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

हालांकि देश के बाकी हिस्सों में हीटवेव के दिनों की संख्या सामान्य रहने की संभावना जताई गई है। मार्च 2026 के दौरान गुजरात और आंध्र प्रदेश के कुछ अलग-थलग क्षेत्रों में सामान्य से अधिक हीटवेव दिनों की संभावना है, जबकि बाकी क्षेत्रों में स्थिति सामान्य रह सकती है।

मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार मार्च-अप्रैल-मई (MAM) के दौरान बढ़ती हीटवेव परिस्थितियां सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल संसाधनों, बिजली की मांग और आवश्यक सेवाओं पर गंभीर असर डाल सकती हैं। खासकर बुजुर्गों, बच्चों, खुले में काम करने वाले श्रमिकों और पहले से बीमार लोगों पर इसका अधिक खतरा रहेगा।

उच्च तापमान के कारण हीट-संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है और बुनियादी ढांचे तथा संसाधन प्रबंधन प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए आईएमडी ने राज्यों और जिला प्रशासन को समय रहते तैयारी सुनिश्चित करने की सलाह दी है, जिसमें कूलिंग शेल्टर की व्यवस्था, पर्याप्त पेयजल आपूर्ति और स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली को मजबूत करना शामिल है।

पिछले 10 वर्षों में तेज हुई जलवायु संकट की रफ्तार: अध्ययन

वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन के अनुसार पिछले दस वर्षों में वैश्विक तापमान वृद्धि की गति तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों ने 98 प्रतिशत सांख्यिकीय भरोसे के साथ निष्कर्ष निकाला है कि ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार पहले की तुलना में अधिक तेज हो गई है।

शोध के अनुसार प्राकृतिक घटनाएं जैसे एल नीनो, ज्वालामुखीय विस्फोट और सौर गतिविधियों में बदलाव भी तापमान वृद्धि के रुझान को तेज करने में योगदान दे रहे हैं। पॉट्सडैम इंस्टिट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (PIK) के मुताबिक 2015 के बाद से वैश्विक तापमान वृद्धि की दर लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक आंकी गई है, जबकि 1970 से 2015 के बीच यह दर लगभग 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक से कम थी।

यह दर 1880 में तापमान रिकॉर्डिंग शुरू होने के बाद से किसी भी दशक की तुलना में अधिक है।

इससे पहले कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) ने भी बताया था कि 2023 से 2025 के बीच वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा, जो पहली बार लगातार तीन वर्षों तक इस सीमा को पार करने की घटना है।

वहीं जलवायु विश्लेषण संस्था बर्कले अर्थ ने चेतावनी दी है कि 2023 से 2025 के बीच तापमान में हुई तेज बढ़ोतरी 1970 से 2019 के दौरान दिखे लगभग रैखिक (linear) तापमान रुझान से काफी अलग है। अध्ययन के अनुसार यदि पिछले 10 वर्षों की इसी गति से तापमान बढ़ता रहा, तो पेरिस जलवायु समझौते द्वारा निर्धारित 1.5 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक तापमान सीमा 2030 तक पार हो सकती है।

चेतावनियों को किया नजरअंदाज, इसलिए हुई तबाही: एनडीएमए रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

उत्तराखंड के चमोली में 2021 की हिमस्खलन त्रासदी और केरल के वायनाड में 2024 के भूस्खलन सहित कई बड़ी आपदाएं टाली जा सकती थीं, लेकिन खामियों भरे परियोजना आकलन और कमजोर योजना के कारण ऐसा नहीं हो सका। यह निष्कर्ष राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की एक नई रिपोर्ट में सामने आया है।

रिपोर्ट के अनुसार 2021 के चमोली हिमस्खलन में 77 लोगों की मौत हुई और 127 लोग लापता हुए, जबकि 2024 के वायनाड भूस्खलन में 225 लोगों की मौत और 138 लोग लापता बताए गए। एनडीएमए का कहना है कि इन घटनाओं ने परियोजनाओं के मूल्यांकन और जोखिम आकलन की मौजूदा पद्धतियों की गंभीर कमजोरियों को उजागर किया है।

चमोली आपदा ने हिमालयी क्षेत्रों के आकलन के लिए इस्तेमाल हो रही पद्धतियों की सीमाएं दिखाईं, जबकि वायनाड की घटना ने दीर्घकालिक जोखिम प्रबंधन और समुदाय की तैयारियों में बड़े अंतर को सामने रखा।

रिपोर्ट में 10 ऐसी आपदाओं का उल्लेख किया गया है जिन्हें रोका जा सकता था। इनमें सिलक्यारा टनल के निर्माण से जुड़ी समस्याएं भी शामिल हैं, जहां 2023 में सुरंग धंसने से पहले कई चेतावनी संकेत मिले थे, लेकिन उन्हें पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया।

अरावली में मृदा कटाव हो रहा तेज़: 7 साल में 13% मिट्टी का नुकसान, शहरीकरण बना बड़ा कारण

भारत की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली रेन्ज में पिछले सात वर्षों के दौरान मिट्टी के कटाव में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। एक नए अध्ययन के अनुसार 2017 से 2024 के बीच अरावली क्षेत्र में मिट्टी के नुकसान में 13.8% की बढ़ोतरी हुई है। इसके पीछे तेजी से बढ़ता शहरीकरण, खनन गतिविधियां और बढ़ती वर्षा को मुख्य कारण बताया गया है।

अध्ययन में पाया गया कि तेज ढलान वाले क्षेत्र, कटाव के प्रति संवेदनशील मिट्टी और खनन क्षेत्र मिट्टी के क्षरण के बड़े हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि हाल के वर्षों में वृक्षारोपण बढ़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर हो रहे भूमि परिवर्तन की भरपाई स्थानीय संरक्षण प्रयास नहीं कर पा रहे हैं।

अरावली पर्वतमाला को लंबे समय से दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों को पश्चिम में फैले राजस्थान के रेगिस्तान से बचाने वाली प्राकृतिक ढाल माना जाता है।

सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार 1967-68 से अब तक अरावली की 31 पहाड़ियां पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं, जो इस पर्वत श्रृंखला पर बढ़ते दबाव की गंभीर चेतावनी है।

अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड की लत से हड्डियां कमज़ोर होने का ख़तरा 

फ्लेवर दही, फ्रोजन पिज्जा, ब्रेकफास्ट सीरियल और इंस्टेंट ओट्स जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आज लोगों की रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बनते जा रहे हैं, लेकिन नया अध्ययन चेतावनी देता है कि इनका ज्यादा सेवन हड्डियों के लिए खतरनाक हो सकता है।

एक बड़े अध्ययन में 1.6 लाख से अधिक लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।  इस स्टडी के नतीजे ब्रिटिश जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन में प्रकाशि हुए हैं। शोध में पाया गया कि जो लोग अधिक मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, उनमें हड्डियों का खनिज घनत्व (बोन मिनरल डेंसिटी) कम पाया गया और कूल्हे की हड्डी टूटने का खतरा लगभग 10.5% तक बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार रोजाना लगभग 3.7 सर्विंग से अधिक ऐसे खाद्य पदार्थ खाने से जोखिम बढ़ जाता है। इन खाद्य पदार्थों में नमक, चीनी और अस्वस्थ वसा की मात्रा अधिक होती है, जबकि पोषण कम होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन जारी रहा, तो आने वाले समय में कम उम्र में हड्डियों की कमजोरी और फ्रैक्चर के मामले तेजी से बढ़ सकते हैं।

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