वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस साल 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया जिसमें कहा गया कि उत्तराखंड में सात जलविद्युत परियोजनाओं को बनाने के लिये भारत सरकार के तीन मंत्रालय (पर्यावरण, जलशक्ति और ऊर्जा) में सहमति बन गयी है। लेकिन द वायर साइंस की एक रिपोर्ट में विश्लेषण के आधार पर यह खुलासा किया गया है कि पर्यावरण मंत्रालय ने इन सात हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को पास कराने के लिये तथ्यों को छुपाया और पूरी सूचना नहीं दी जो सरकार के इरादों के खिलाफ जा सकती थी।
असल में उत्तराखंड में 2013 में हुई केदारनाथ आपदा के बाद सरकार ने विशेषज्ञों की समिति गठित की थी जिसने कहा था कि आपदा को बिगाड़ने में जल विद्युत परियोजनाओं की निश्चित भूमिका थी। सरकार ने दिसंबर 2014 में इस जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था और कहा था कि “विकास परियोजनाओं खासतौर से हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट पर कोई फैसला… मज़बूत और स्पष्ट वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित होना चाहिये।” अब सरकार की नई स्थिति इससे काफी भिन्न है और वह कुल 2000 मेगावॉट से अधिक क्षमताओं की परियोजनाओं पर काम शुरू कर रही है। इस रिपोर्ट को विस्तार से यहां पढ़ा जा सकता है।
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