उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में मंगलवार दोपहर करीब 1.40 बजे बादल फटने से भयावह बाढ़ आ गई, जिसने पूरे इलाके में तबाही मचा दी।
खीर गंगा नदी के कैचमेंट क्षेत्र में बादल फटने की इस घटना से पानी का तेज बहाव एक ओर धराली और दूसरी ओर सुक्की गांव की तरफ बहा। गंगोत्री मार्ग पर स्थित यह पर्यटन स्थल देखते ही देखते मलबे, पानी और पत्थरों के सैलाब में दब गया।
अब तक कम से कम चार लोगों की मौत की पुष्टि हुई है और 60 से अधिक लोग लापता हैं, जबकि 130 को सुरक्षित निकाला गया है।
धराली गंगोत्री यात्रा का प्रमुख पड़ाव है और यहां कई होटल, रेस्टोरेंट और होमस्टे हैं। बाढ़ में लगभग आधा गांव बह गया, जबकि चश्मदीदों ने बताया कि 20-25 होटल और होमस्टे पूरी तरह नष्ट हो गए।
भारतीय सेना के 11 जवान हर्षिल क्षेत्र के निचले हिस्से में स्थित एक शिविर से लापता बताए जा रहे हैं, लेकिन सेना ने अपने जवानों की तलाश और नागरिकों के बचाव के लिए राहत कार्य जारी रखे हैं।
इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) की टीमें मौके पर राहत कार्यों में लगी हैं।
लगातार बारिश और 163 सड़कें बंद होने की वजह से बचाव कार्यों में देरी हो रही है। हेलिकॉप्टरों को भी मौसम खराब होने के कारण उड़ान नहीं भरने दी गई है, हालांकि एयरफोर्स के चिनूक, चेतक और एएलएच हेलिकॉप्टर चंडीगढ़ और सरसावा में तैयार हैं।
जिले में गंगा तटवर्ती इलाकों में अलर्ट जारी कर लोगों से ऊंचे स्थानों पर जाने की अपील की गई है।
उत्तरकाशी में बढ़ती आपदाएं
यह घटना उत्तरकाशी में इस तरह की पहली त्रासदी नहीं है। 1978 में भगीरथी नदी पर झील के टूटने से आई बाढ़, 1991 का विनाशकारी भूकंप, 2003 में वरुणावत पहाड़ की भूस्खलन से होटल ध्वस्त होना, 2012-13 में अस्सी गंगा और भगीरथी में आई बाढ़ और 2019 में अराकोट में बादल फटने की घटना – सब इस पहाड़ी जिले की नाजुक इकोसिस्टम और बार-बार होने वाली चरम मौसम की घटनाओं की चेतावनी हैं।
2023 में सिलक्यारा सुरंग हादसे में 41 मज़दूर 17 दिनों तक फंसे रहे थे और 2025 में ओडाटा और सिलाई बेंड में भारी वर्षा के चलते हुई मौतें भी अभी हाल की घटनाएं हैं।
नीतिगत आवश्यकता
उत्तरकाशी में बादल फटने की घटनाएं हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम हैं।
भारत मौसम विभाग के अनुसार, 100 मिमी प्रति घंटा या उससे अधिक वर्षा के साथ तेज हवाएं और बिजली गिरने की घटना को ‘बादल फटना’ कहा जाता है।
आईआईटी-जम्मू और एनआईएच-रुड़की के शोध के मुताबिक, उत्तराखंड में प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर बादल फटने की घटनाएं अन्य हिमालयी क्षेत्रों की तुलना में अधिक होती हैं।
इन घटनाओं की तीव्रता और प्रभाव भी हाल के वर्षों में बढ़े हैं। शोधकर्ता लंबे समय से राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर नीति और योजना की मांग कर रहे हैं ताकि बादल फटने जैसी आपदाओं का प्रभाव कम किया जा सके।
मौसम विभाग ने चेताया
मौसम विभाग ने नैनीताल, चंपावत, उधम सिंह नगर, बागेश्वर, पौड़ी, टिहरी, हरिद्वार और देहरादून सहित सात जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया है।
जो एक संकेत है कि अगले 24 घंटे में भी राहत नहीं मिलेगी।
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