नेट-जीरो हासिल करने का वादा करने वाले देश करते हैं कोयले का सबसे अधिक उपयोग: रिपोर्ट

आईईए की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयले की जगह साफ ऊर्जा विकल्पों के बड़े पैमाने पर वित्तपोषण और विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सुरक्षित, किफायती और न्यायपूर्ण बदलाव सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता है।

Editorial Team17 नव॰. 2022
रिपोर्ट कहती है कि कोयले का मौजूदा प्रयोग ही धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर ले जाएगा।

रिपोर्ट कहती है कि कोयले का मौजूदा प्रयोग ही धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर ले जाएगा।


अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की एक रिपोर्ट के अनुसार नेट-जीरो उत्सर्जन की प्रतिज्ञा करने वाले लगभग 75 देश विश्व के 95% कोयले का प्रयोग करते हैं।  लेकिन पिछले एक दशक में कोयले की मांग घटने की बजाय अपने रिकॉर्ड स्तर पर स्थिर बनी हुई है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि इसे कम करने के लिए कुछ नहीं किया गया तो कोयले का मौजूदा प्रयोग ही धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर ले जाएगा।

आईईए के कार्यकारी निदेशक फतह बिरोल  के मुताबिक, “कोयला न केवल कार्बन उत्सर्जन का बल्कि दुनिया भर में बिजली उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत है। इससे पता चलता है कि यह जलवायु के लिए कितना हानिकारक है और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए तेजी से इसके प्रयोग को कम करना कितना मुश्किल है” ।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल बढ़ने की रफ्तार पहले की तुलना में धीमी हुई है, विशेष रूप से दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में। यह एक ट्रांजिशन फ्यूल के तौर पर गैस की उपयोगिता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। आईईए के अनॉउंस्ड प्लेजेस सिनेरियो (एपीएस) में, उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में 2030 के दशक तक प्राकृतिक गैस की मांग पहले से ही कम होने लगी है।

(नोट: अनॉउंस्ड प्लेजेस सिनेरियो (एपीएस) 2021 में लाया गया था जिसका उद्देश्य यह दिखाना है कि घोषित महत्वाकांक्षाएं और लक्ष्य किस हद तक 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने के लिए आवश्यक कटौती के अनुरूप हैं।)

रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोयले के प्रयोग को कम करने के लिए कोई एक तरीका कारगर नहीं है। भारत के अलावा इंडोनेशिया, मंगोलिया, चीन, वियतनाम,  और दक्षिण अफ्रीका ऐसे देश हैं जहां कोयले पर निर्भरता अधिक है और ऊर्जा संक्रमण सबसे चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, आज दुनिया भर में लगभग 9,000 कोयला बिजली संयंत्र हैं, जिनकी कुल क्षमता 2,185 गीगावाट है। इनकी आयु क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग है: अमेरिका में औसतन 40 वर्ष से अधिक और एशिया के विकासशील देशों में 15 वर्ष से कम। कोयले का उपयोग करने वाली औद्योगिक इकाईयों की आयु भी इसी प्रकार लंबी है। इस दशक में निवेश पर जो फैसले लिए जाने हैं, वह आने वाले दशकों में भारी उद्योगों में कोयले के उपयोग को काफी हद तक परिभाषित करेंगे।

रिपोर्ट ने पाया है कि यदि मौजूदा कोयला संयंत्रों (निर्माणाधीन संयंत्रों को छोड़कर) को उनके सामान्य जीवनकाल के दौरान उनकी पूरी क्षमता पर संचालित किया जाता है तो अब तक संचालित सभी कोयला संयंत्रों की ऐतिहासिक उत्सर्जन से अधिक उत्सर्जन होगा। 

बिरोल ने कहा, “जहां एक ओर कई सरकारों की नीतियों में स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार की दिशा में उत्साहजनक गति दिखती है, वहीं एक बड़ी अनसुलझी समस्या यह है कि दुनिया भर में भारी मात्रा में मौजूदा कोयला संपत्ति का क्या किया जाए।”  

रिपोर्ट ने रास्ता दिखाया है कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास का ध्यान रखते हुए, अंतरराष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में वैश्विक कोयला उत्सर्जन में तेजी से कटौती कैसे की जा सकती है। इसमें सामाजिक प्रभावों और रोजगार पर होनेवाले असर पर भी चर्चा की गई है। 

वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र के भविष्य का हर वह मार्ग जिसपर हमें जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों से बचना है, उसपर कोयले से होनेवाले उत्सर्जन में शुरुआती और महत्वपूर्ण कमी अनिवार्य है। रिपोर्ट में तीन मॉडल दिए गए हैं और तीनों में इस दशक के भीतर कोयले की मांग में गिरावट का अनुमान है। आईईए के एपीएस माना गया है कि सरकारों द्वारा घोषित सभी नेट-जीरो लक्ष्य समय से पूरे हो जाएंगे। एपीएस में, वैश्विक कोयले की मांग सदी के मध्य तक 70% गिर जाएगी है, वहीं तेल और गैस की मांग में लगभग 40% की गिरावट होगी।

नेट-जीरो उत्सर्जन की स्थिति में वैश्विक कोयले का उपयोग 2050 तक 90% तक गिर जाएगा, और वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र  विकसित अर्थव्यवस्थाओं में 2035 तक और सभी देशों में 2040 तक पूरी तरह से डी-कार्बनाइज हो जाएगा।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कोयले से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए जरूरी है कि नए बिजली संयंत्र स्थापित न किए जाएं।  पिछले एक दशक में बहुत कम नई परियोजनाओं को मंजूरी मिली। लेकिन मौजूदा ऊर्जा संकट को देखते हुए यह खतरा बढ़ गया है कि नए कोयला बिजली संयंत्रों को मंजूरी देने की तत्परता बढ़ेगी। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि 2010 से कोयले से संबंधित परियोजनाओं की मदद करने वाले 100 वित्तीय संस्थानों में से लगभग आधे ऐसे हैं जिन्होंने इस तरह के वित्तपोषण को रोकने का कोई वादा नहीं किया है, और दूसरे 20% ऐसे हैं जिनकी प्रतिज्ञाएं अपेक्षाकृत कमजोर हैं।

इसके अलावा, सरकार कोयला-संचालित परिसंपत्तियों के मालिकों को ट्रांजिशन करने के लिए प्रोत्साहन दे सकती है। स्वच्छ बिजली उत्पादन में बेहतर कमाई के विकल्प ही अपने आप में कोयले से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे।  रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयले का अंधाधुंध उपयोग बंद करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, सार्वजनिक वित्तीय सहायता और ऊर्जा संक्रमण को लोगों के हितों पर केंद्रित करना आवश्यक है। ऊर्जा संक्रमण से स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में लाखों नौकरियां पैदा होंगी, हालांकि जरूरी नहीं कि यह उन्हीं जगहों पर हों जहां कोयला बंद होने से नौकरियां जाएंगी। साथ ही कई मामलों में अलग कौशल की जरूरत हो सकती है। कोयला क्षेत्र में बेरोजगार होने वाले सभी लोगों को दूसरा रोजगार दे पाना संभव नहीं होगा, रिपोर्ट ने सुझाव दिया है कि खनिज खनन उन कंपनियों और समुदायों को नए औद्योगिक अवसर और आय के स्रोत प्रदान कर सकता है जो अब तक कोयले पर निर्भर हैं।

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